अंतरराष्ट्रीय डेस्क 16 दिसंबर 2025
सऊदी अरब की तपती सड़कों, कंस्ट्रक्शन साइट्स, दुकानों और बाज़ारों में दशकों से एक शब्द बार-बार सुनाई देता रहा है— ‘रफ़ीक़’। यह शब्द सुनते ही भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और दक्षिण एशिया से आए लाखों प्रवासी मज़दूरों की ज़िंदगी की परतें खुलने लगती हैं। हर साल हज़ारों लोग बेहतर रोज़गार और ज़्यादा कमाई की उम्मीद में अपने घर-परिवार से दूर खाड़ी देशों का रुख करते हैं। सऊदी अरब उन सपनों की सबसे बड़ी मंज़िलों में से एक है, जहाँ ऊँची तनख़्वाह के बदले लंबी जुदाई, कठिन मेहनत और सांस्कृतिक दूरी उनकी रोज़मर्रा की सच्चाई बन जाती है।
इसी प्रवासी जीवन के बीच एक सवाल बार-बार उठता रहा है— सऊदी अरब में भारतीयों और पाकिस्तानियों को ‘रफ़ीक़’ क्यों कहा जाता है? सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Quora पर उठे इसी सवाल ने इस शब्द के इतिहास, अर्थ और सामाजिक असर को फिर से चर्चा में ला दिया है। अरबी भाषा में ‘रफ़ीक़’ का सीधा अर्थ होता है— दोस्त, साथी या सहयात्री। पर ज़िंदगी की तरह शब्दों के मायने भी हमेशा सीधे और सरल नहीं रहते।
जब ‘दोस्त’ एक तंज बन गया
जेद्दाह में 1980 के दशक में पले-बढ़े बाबर मुगल बताते हैं कि उस दौर में ‘रफ़ीक़’ शब्द सड़कों पर आम था, लेकिन उसका लहजा हमेशा दोस्ताना नहीं होता था। कई बार यह शब्द दक्षिण एशियाई मज़दूरों के लिए एक स्लैंग या उपेक्षापूर्ण संबोधन बन चुका था। खासकर 1980 और 1990 के शुरुआती वर्षों में, जब खाड़ी देशों में मज़दूरों और स्थानीय आबादी के बीच सामाजिक दूरी ज़्यादा थी, तब यह शब्द कई लोगों को अपमानजनक लगता था। शब्द वही था, लेकिन बोलने का अंदाज़ और नज़र का भाव उसे चोट पहुंचाने वाला बना देता था।
संस्कृति का फर्क और भाषा की शालीनता
हालाँकि, हर कहानी का दूसरा पहलू भी होता है। कई अरब नागरिकों और भाषा विशेषज्ञों का कहना है कि अरबी संस्कृति में किसी अजनबी को सीधे “ए” या “तुम” कहकर बुलाना असभ्य माना जाता है। इसलिए ‘रफ़ीक़’, ‘अख़ी’ (भाई) या ‘सदीक़’ (घनिष्ठ मित्र) जैसे शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं। एक Quora यूज़र ने तुलना करते हुए कहा कि यह ठीक वैसा ही है जैसे भारत में किसी अनजान व्यक्ति को “भाई साहब” कहकर संबोधित किया जाता है—न कि उसे नीचा दिखाने के लिए, बल्कि बातचीत को सभ्य बनाने के लिए।
समय बदला, नज़र बदली
बीते वर्षों में सऊदी अरब की सामाजिक संरचना में बड़ा बदलाव आया है। शिक्षा का स्तर बढ़ा है, प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों पर बातचीत तेज़ हुई है और समाज पहले से अधिक वैश्विक हुआ है। इसका असर भाषा पर भी पड़ा है। बाबर मुगल के मुताबिक, आज सार्वजनिक जगहों पर ‘रफ़ीक़’ शब्द का नकारात्मक इस्तेमाल पहले के मुकाबले काफी कम हो गया है। लोग ज़्यादा सचेत हो गए हैं कि शब्द सिर्फ आवाज़ नहीं होते, वे सामने वाले की इज़्ज़त और आत्मसम्मान से जुड़े होते हैं।
‘रफ़ीक़’ से ‘सदीक़’ तक का सफ़र
दिलचस्प बात यह है कि अब सऊदी अरब में एक और शब्द धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रहा है— ‘सदीक़’, जिसका मतलब भी दोस्त ही होता है, लेकिन यह ज़्यादा गर्मजोशी और बराबरी का एहसास कराता है। कई प्रवासियों का कहना है कि आजकल स्थानीय लोग गैर-अरब मज़दूरों को संबोधित करते समय ‘सदीक़’ का इस्तेमाल ज़्यादा करने लगे हैं, जो भाषा और सोच में आए बदलाव का संकेत है।
एक शब्द, कई कहानियाँ
‘रफ़ीक़’ सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि वह आईना है जिसमें प्रवासी मज़दूरों की मेहनत, संघर्ष, अपमान, स्वीकार्यता और बदलती पहचान झलकती है। कभी यह शब्द दर्द देता था, कभी सहारा बनता था, और आज यह धीरे-धीरे अपने मूल अर्थ— दोस्ती—की ओर लौटता दिख रहा है। यह कहानी सिर्फ भाषा की नहीं, बल्कि समाज के बदलते मिज़ाज और इंसानी रिश्तों की भी है।




