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Listen Audio of Sardar Patel : हिंदू राष्ट्र की सोच अस्वीकार्य, मुसलमान भारत के अपने लोग, और विभाजन पर कोई पछतावा नहीं

एबीसी डेस्क 15 दिसंबर 2025

सरदार वल्लभभाई पटेल की पुण्यतिथि के अवसर पर जब देश उन्हें “लौह पुरुष” के रूप में याद करता है, तब इतिहास के पन्नों से उनका फरवरी 1949 का एक भाषण फिर सामने आना आज की राजनीति और वैचारिक बहसों के लिए बेहद प्रासंगिक बन जाता है। यह वह दौर था जब देश आज़ादी के तुरंत बाद सांप्रदायिक हिंसा, शरणार्थी संकट और राष्ट्र निर्माण की कठिन चुनौतियों से जूझ रहा था। ऐसे समय में देश के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल ने बेहद स्पष्ट, दो-टूक और निर्भीक शब्दों में राष्ट्र की दिशा तय करने की कोशिश की थी। उनके उस भाषण में न कोई भ्रम था, न कूटनीतिक गोलमोलपन—बल्कि भारत के संविधानिक और लोकतांत्रिक चरित्र की स्पष्ट घोषणा थी।

सरदार पटेल ने अपने भाषण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और उससे जुड़े संगठनों की “हिंदू राष्ट्र” की अवधारणा पर खुली आपत्ति जताई थी। उन्होंने साफ कहा था कि “हिंदू राष्ट्र की बात कोई भी सरकार बर्दाश्त नहीं कर सकती”, क्योंकि भारत किसी एक धर्म का नहीं, बल्कि सभी नागरिकों का देश है। पटेल का यह बयान उस समय आया था जब गांधी की हत्या के बाद देश में सांप्रदायिक तनाव अपने चरम पर था और सरकार को यह आशंका थी कि धार्मिक राष्ट्रवाद भारत की एकता के लिए घातक साबित हो सकता है। गृह मंत्री के रूप में पटेल का यह रुख बताता है कि वे राष्ट्र को धार्मिक पहचान से नहीं, बल्कि कानून, संविधान और नागरिकता के आधार पर देख रहे थे।

अपने भाषण में सरदार पटेल ने मुसलमानों को लेकर भी अत्यंत स्पष्ट और मानवीय रुख अपनाया। उन्होंने कहा था कि “मुसलमान इसी देश के हैं और उन्हें बाहर करने का विचार शैतानी है।” यह वक्तव्य उस समय दिया गया था जब विभाजन के बाद बड़ी संख्या में मुसलमान भारत में ही रह गए थे और उनके प्रति अविश्वास और नफरत का माहौल बनाया जा रहा था। पटेल ने ऐसे विचारों को न केवल खारिज किया, बल्कि उन्हें नैतिक रूप से गलत और राष्ट्र के लिए खतरनाक बताया। उनके अनुसार, किसी भी समुदाय को संदेह की निगाह से देखना या उसे देश से बाहर करने की सोच रखना भारत की आत्मा के खिलाफ है।

सबसे चौंकाने और आज के संदर्भ में सबसे अधिक बहस पैदा करने वाला हिस्सा सरदार पटेल का विभाजन को लेकर दिया गया बयान है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि विभाजन देश के लिए अच्छा था और इससे सहमति का उन्हें कोई पछतावा नहीं है। पटेल का तर्क यह था कि निरंतर संघर्ष, असहमति और खून-खराबे की स्थिति में एक स्पष्ट विभाजन ने भारत को स्थिरता और आगे बढ़ने का अवसर दिया। यह कोई भावनात्मक फैसला नहीं था, बल्कि एक कठोर राजनीतिक यथार्थ को स्वीकार करने का निर्णय था, जिसे उन्होंने राष्ट्र की दीर्घकालिक शांति के लिए आवश्यक माना।

सरदार पटेल का यह भाषण यह भी स्पष्ट करता है कि वे न तो सांप्रदायिक राजनीति के समर्थक थे और न ही किसी एक विचारधारा के दबाव में फैसले लेने वाले नेता। उन्होंने हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को अस्वीकार किया, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा की बात की और साथ ही विभाजन जैसे कठिन निर्णय की जिम्मेदारी भी खुले तौर पर स्वीकार की। यही संतुलन उन्हें सिर्फ “लौह पुरुष” नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक और संवैधानिक नेता के रूप में स्थापित करता है।

आज जब भारत में राष्ट्रवाद, धर्म और नागरिकता को लेकर तीखी बहस चल रही है, सरदार पटेल का फरवरी 1949 का यह भाषण इतिहास का कोई धुंधला दस्तावेज़ नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए एक आईना है। यह भाषण बताता है कि भारत के संस्थापक नेताओं की कल्पना में राष्ट्र का अर्थ क्या था—एक ऐसा देश जहां सरकार धर्म आधारित राष्ट्रवाद को स्वीकार नहीं करती, जहां अल्पसंख्यक समान अधिकारों के साथ नागरिक हैं और जहां कठिन फैसलों को भी राष्ट्रहित में बिना पछतावे के लिया जाता है।

सरदार पटेल की पुण्यतिथि पर उनके इन शब्दों को याद करना सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि यह समझने का अवसर भी है कि आज की राजनीति और सत्ता उनकी सोच के कितने करीब है और कितनी दूर।

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