एबीसी डेस्क 15 दिसंबर 2025
दुनिया की सबसे ऊँची पर्वत श्रंखला हिमालय के नंदा देवी शिखर (25,645 फीट) पर 1965 में अमेरिकी केंद्रीय खुफिया एजेंसी (CIA) और भारत के इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) द्वारा मिलकर चलाया गया एक गुप्त कोल्ड वॉर मिशन आज भी एक भयानक रहस्य बनकर खड़ा है। इसका लक्ष्य चीन के परमाणु परीक्षणों पर नजर रखना था, लेकिन यह मिशन एक परमाणु-शक्ति वाला जासूसी उपकरण खो देने की वजह से समाप्त हो गया — एक ऐसा उपकरण जो आज तक हिमालय की बर्फ़ों में कहीं गुम है और संभावित पर्यावरणीय खतरों को जन्म दे रहा है।
1960 के दशक में कोल्ड वॉर चरम पर था, और 1964 में चीन ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया, जिससे अमेरिका और उसके सहयोगियों को भारी चिंता हुई। सीआईए और भारत के खुफिया अधिकारियों ने मिलकर एक योजना बनाई, जिसके तहत एक रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर (RTG) को नंदा देवी की चोटी पर स्थापित किया जाना था, जो प्लूटोनियम से संचालित होकर सेंसर्स और ट्रांसमिशन उपकरण को शक्ति देगा और चीन की परमाणु गतिविधियों की निगरानी करेगा।
ऑपरेशन के दौरान:
अक्टूबर 1965 में टीम ने कठिन मौसम और बर्फीले तूफ़ानों के बीच चढ़ाई शुरू की। जैसे-जैसे वे शिखर के करीब पहुँचे, मौसम और ज़्यादा खराब हो गया। 16 अक्टूबर को भीषण Blizzard ने मिशन को रोक दिया, और टीम को उपकरण को एक चट्टानी crevice में बाँधकर वापस लौटना पड़ा, क्योंकि आगे बढ़ना असंभव था।
उस अभियान के अगले वर्ष मई 1966 में एक पुनर्प्रयास किया गया, पर उपकरण का कोई पता नहीं चला। खासकर जब नयूरॉन डिटेक्टर्स से खोज की गई, तो भी कोई संकेत नहीं मिला — विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया कि भारी हिमस्खलन या ग्लेशियर की गति की वजह से यह उपकरण नीचे सरक गया होगा।
इस मिशन में इस्तेमाल हुई RTG डिवाइस में भारी मात्रा में प्लूटोनियम-238 था, जो अपनी दीर्घायु रेडियोधर्मी प्रकृति के कारण सैकड़ों साल तक सक्रिय रह सकता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञ अब भी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि अगर यह उपकरण किसी नदी तक पहुँच जाए — खासकर गंगा नदी के स्रोतों तक — तो सैंकड़ों लाखों लोगों के लिए गंभीर स्वास्थ्य और पर्यावरणीय जोखिम पैदा हो सकता है।
स्थानीय लोगों और कुछ विशेषज्ञों के बीच यह भी विवादित धारणा है कि समय-समय पर आए प्राकृतिक आपदाएँ, जैसे 2021 के उत्तराखंड में भूस्खलन और बाढ़, इस खोए हुए उपकरण के प्रभाव से जुड़ी हो सकती हैं, हालांकि वैज्ञानिक साक्ष्य इस दावे का समर्थन नहीं करते।
आज भी यह सवाल बना हुआ है कि वह परमाणु-जासूसी उपकरण कहां है और क्या यह ग्लेशियरों के पिघलने के साथ-साथ कभी किसी मानवीय क्षेत्र तक पहुँच सकता है। यह मामला न केवल एक कोल्ड वॉर रहस्य है, अब पर्यावरण, सुरक्षा और भू-राजनीति का एक बड़ा मुद्दा भी बन चुका है, जो दुनियाभर के विशेषज्ञों और शासन चौकों की निगाहों में है।
वैज्ञानिक अध्ययनों की चिंता: बर्फ़ के नीचे छुपा रेडियोधर्मी खतरा
नंदा देवी पर खोए CIA के रेडियोधर्मी जासूसी उपकरण को लेकर समय-समय पर वैज्ञानिक समुदाय में गहरी चिंता जताई जाती रही है। इस मिशन में इस्तेमाल किया गया प्लूटोनियम-238 एक ऐसा रेडियोधर्मी पदार्थ है, जिसकी आधी आयु लगभग 88 वर्ष है, यानी यह सैकड़ों वर्षों तक सक्रिय रह सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर यह उपकरण किसी ग्लेशियर की गति के साथ नीचे की ओर खिसक चुका है, तो उसके कण धीरे-धीरे हिमनदों के पिघलने वाले पानी में मिल सकते हैं। हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों का तेज़ी से पिघलना इस खतरे को और बढ़ा देता है, क्योंकि इससे रेडियोधर्मी पदार्थों के नदियों तक पहुँचने की आशंका को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।
गंगा प्रणाली से जुड़ा डर: आशंका बनाम आधिकारिक दावे
वैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही रहा है कि क्या यह रेडियोधर्मी सामग्री कभी गंगा नदी प्रणाली तक पहुँच सकती है। हालांकि आधिकारिक स्तर पर भारत और अमेरिका दोनों ही यह दावा करते रहे हैं कि कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं है कि उपकरण पिघलकर जलस्रोतों में मिला हो, लेकिन स्वतंत्र विशेषज्ञ मानते हैं कि हिमालय जैसे भूगर्भीय रूप से सक्रिय क्षेत्र में किसी भी रेडियोधर्मी वस्तु का “पूरी तरह सुरक्षित” रहना कहना वैज्ञानिक रूप से जोखिम भरा दावा है। यही वजह है कि यह मामला केवल अतीत की भूल नहीं, बल्कि भविष्य की संभावित आपदा के रूप में देखा जाता है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ: संसद से लेकर सियासी आरोप-प्रत्यारोप तक
इस रहस्य के सामने आने के बाद भारत में समय-समय पर राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिली हैं। कुछ नेताओं ने इसे भारत की संप्रभुता से जुड़ा गंभीर सवाल बताया और आरोप लगाया कि शीत युद्ध के दौर में विदेशी एजेंसियों को भारतीय हिमालय में इस तरह के खतरनाक प्रयोग की अनुमति कैसे दी गई। वहीं, दूसरी ओर सरकारें आमतौर पर इस मुद्दे पर बेहद सतर्क और सीमित प्रतिक्रिया देती रही हैं, जिससे यह धारणा और मज़बूत हुई कि पूरी सच्चाई आज भी सार्वजनिक डोमेन से दूर रखी गई है।
अंतरराष्ट्रीय चुप्पी और अमेरिका की रणनीतिक चुप्पी
अमेरिका की ओर से भी इस मुद्दे पर कभी स्पष्ट और विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया। CIA ने लंबे समय तक इस मिशन के अस्तित्व तक से इनकार किया, और बाद में जब कुछ दस्तावेज़ सार्वजनिक हुए, तब भी रेडियोधर्मी उपकरण के अंतिम ठिकाने पर कोई ठोस जानकारी नहीं दी गई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह मामला कभी संयुक्त राष्ट्र या किसी वैश्विक परमाणु निगरानी मंच पर गंभीर बहस का विषय नहीं बन पाया, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या बड़ी ताकतें ऐसे मामलों में जवाबदेही से बच निकलती हैं।
आज भी अनुत्तरित सवाल: इतिहास या भविष्य का खतरा?
छह दशक बीत जाने के बाद भी सबसे बड़ा सवाल वही है — वह उपकरण आखिर गया कहाँ? क्या वह हिमस्खलन में दब गया, ग्लेशियरों के साथ बह गया, या अब भी कहीं सुरक्षित पड़ा है? यह रहस्य सिर्फ कोल्ड वॉर की एक कहानी नहीं, बल्कि पर्यावरण, मानव सुरक्षा और वैश्विक जिम्मेदारी से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। नंदा देवी की बर्फ़ के नीचे दबी यह परमाणु भूल आज भी दुनिया को यह याद दिलाती है कि गुप्त युद्धों की कीमत अक्सर आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ती है। आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ती है।




