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सावरकर का कच्चा चिट्ठा: जब ‘वीर’ की उपाधि खुद ने खुद को दे दी माफीवीर ने

एबीसी डेस्क 13 दिसंबर 2025

यह कहानी बहुत कम कही जाती है, शायद इसलिए क्योंकि यह उस गढ़ी हुई छवि को तोड़ती है जिसे वर्षों से बड़े सुनियोजित तरीके से प्रचारित किया गया। आज जब सावरकर को ‘वीर’ कहकर राष्ट्रवाद का प्रतीक बना दिया गया है, तब यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि यह ‘वीर’ शब्द आया कहां से और किसने दिया। सच यह है कि सावरकर को यह उपाधि किसी जनआंदोलन, किसी स्वतंत्रता संग्राम की मान्यता या किसी क्रांतिकारी सर्वसम्मति से नहीं मिली, बल्कि यह उपाधि उन्होंने खुद अपने लिए गढ़ी। यह तथ्य इतिहास के पन्नों में मौजूद है, लेकिन बार-बार दबा दिया गया।

1926 में, जब सावरकर जेल से रिहा हुए, उसके कुछ समय बाद एक किताब बाज़ार में आई—‘वीर सावरकर का जीवन’। इस किताब को उनकी महान जीवनी के रूप में प्रचारित किया गया। किताब के कई संस्करण छपे, पढ़ाए गए और आगे चलकर यही पुस्तक सावरकर की “वीरता” का आधार बन गई। उस दौर में आम धारणा यही बनाई गई कि किसी प्रशंसक या स्वतंत्र लेखक ने सावरकर के त्याग और संघर्ष से प्रभावित होकर यह जीवनी लिखी है। लेकिन यह पूरी कहानी अधूरी और भ्रामक थी।

वर्षों बाद जब इतिहासकारों और शोधकर्ताओं ने इस पुस्तक की पड़ताल की, तो एक चौंकाने वाला सच सामने आया। इस किताब के लेखक के रूप में जिस नाम का उल्लेख था—‘चित्रगुप्त’—वह कोई और नहीं, बल्कि स्वयं विनायक दामोदर सावरकर थे। यानी सावरकर ने अपनी जीवनी खुद लिखी, लेकिन अपने नाम से नहीं, बल्कि छद्म नाम से। यही नहीं, उसी किताब में उन्होंने अपने नाम के साथ ‘वीर’ शब्द भी जोड़ दिया। दूसरे शब्दों में कहें तो ‘वीर सावरकर’ कोई ऐतिहासिक उपाधि नहीं, बल्कि आत्म-घोषित ब्रांड था।

यह सवाल अपने आप खड़ा होता है कि अगर सावरकर की वीरता इतनी स्वयंसिद्ध थी, तो क्या कोई और उनके जीवन पर निष्पक्ष जीवनी लिखने को तैयार नहीं था? क्या उन्हें अपनी प्रशंसा खुद करनी पड़ी? इतिहास में ऐसे उदाहरण विरले ही मिलते हैं, जहां कोई व्यक्ति खुद ही अपनी महानता का प्रमाण पत्र लिखे और फिर उसी को इतिहास की तरह प्रचारित किया जाए। यह आत्म-प्रचार सिर्फ अहंकार नहीं दिखाता, बल्कि उस पूरी विचारधारा पर सवाल खड़े करता है जो आज सावरकर को निर्विवाद नायक के रूप में पेश करती है।

इस आत्म-निर्मित छवि को समझना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि यही तरीका आगे चलकर सावरकर की पूरी राजनीति और विचारधारा में दिखता है—तथ्यों का चयन, असहज सच्चाइयों को छिपाना और सुविधाजनक कथाओं को बार-बार दोहराकर उन्हें “इतिहास” बना देना। जिस व्यक्ति ने अपने नाम के आगे ‘वीर’ खुद जोड़ा, उससे जुड़ी बाकी कहानियों को बिना सवाल किए स्वीकार कर लेना क्या समझदारी है?

आज जब सावरकर को राष्ट्रभक्ति का पर्याय बनाकर प्रस्तुत किया जाता है, तब यह कच्चा चिट्ठा याद रखना ज़रूरी है। यह कहानी सिर्फ एक किताब या एक नाम की नहीं है, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया की है, जिसमें आत्म-प्रचार को इतिहास बना दिया गया। सावरकर को ‘वीर’ कहने से पहले यह जानना और समझना ज़रूरी है कि यह उपाधि जनता ने नहीं, इतिहास ने नहीं—खुद सावरकर ने खुद को दी थी। यही वह सच है, जो अक्सर शोर, नारों और राजनीतिक प्रचार में दबा दिया जाता है।

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