अवधेश कुमार । नई दिल्ली | 10 दिसंबर 2025
नई दिल्ली। संसद के तनावपूर्ण राजनीतिक माहौल में सोमवार का दिन एक अलग ही ऊर्जा लेकर आया—ऊर्जा सौहार्द की, भरोसे की, और विपक्षी एकजुटता की। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के जन्मदिन के मौके पर राहुल गांधी, अखिलेश यादव और डिंपल यादव की एक साथ मौजूदगी ने न सिर्फ राजनीतिक संदेश दिया, बल्कि यह दिखा दिया कि रिश्ते अक्सर राजनीति से बड़े होते हैं। विरोधी दलों को एक मंच पर लाना भले ही कठिन हो, लेकिन नेताओं के बीच विश्वास और आत्मीयता उस खाई को पाटने का काम करती हैं जिसे राजनीति अक्सर चौड़ा कर देती है। इस मुलाकात ने यह स्पष्ट कर दिया कि गठबंधन केवल रणनीति नहीं—एक जीवंत रसायन, एक मानवीय संबंध है।
घटना की शुरुआत लोकसभा में SIR पर हुई गर्म बहस के बाद हुई। अमित शाह और राहुल गांधी की तीखी टकराहट के बाद सदन से बाहर निकलते विपक्षी नेताओं की भीड़ में मीडिया ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव और उनके साथ मौजूद डिंपल यादव को घेर लिया। अखिलेश पत्रकारों के सवालों का जवाब दे रहे थे, वहीं उनके पीछे खड़े राहुल गांधी लगातार उन्हें देख रहे थे, मानो कुछ कहना चाह रहे हों। लेकिन मीडिया के शोर-शराबे में संवाद संभव नहीं था। जैसे ही अखिलेश यादव फ्री हुए, राहुल गांधी ने बिना हिचकिचाहट उनका हाथ थामा और मुस्कुराते हुए कहा—“चलिए…”। अखिलेश और डिंपल यादव, दोनों राहुल के साथ कांग्रेस दफ्तर की ओर बढ़ गए—एक सहज, मानवीय और भरोसे से भरी चाल।
पुरानी संसद की इमारत के भीतर स्थित कांग्रेस दफ्तर में सोनिया गांधी पहले से मौजूद थीं। माहौल सियासी कम, पारिवारिक ज्यादा था। नेताओं के चेहरे हल्की मुस्कान से भरे हुए थे और वातावरण में औपचारिकता की जगह अपनापन अधिक था। सोनिया गांधी के जन्मदिन का केक कटिंग सेरेमनी शुरू हुई, और इस बीच राहुल, अखिलेश और डिंपल के बीच जिस तरह सहज बातचीत और हँसी-मजाक दिखा, उसने यह साफ कर दिया कि राजनीतिक गठबंधन केवल समझौता नहीं—एक भावनात्मक जुड़ाव भी है। डिंपल यादव की उपस्थिति ने इस पूरे दृश्य में एक और परत जोड़ दी—वह सपा की राजनीतिक और नैतिक ताकत दोनों का प्रतिनिधित्व करती हैं, और उनकी मौजूदगी ने यह संदेश स्पष्ट कर दिया कि यह रिश्ता परिवारों और विचारों के स्तर पर भी गहराता जा रहा है।
जब अखिलेश और डिंपल यादव बाहर निकले तो मीडिया फिर सक्रिय हो गई। “सर, कौन-सा केक था?”—इस हल्के सवाल पर अखिलेश मुस्कुराए और बोले—
“केक बहुत अच्छा था… और गठबंधन हमेशा रहेगा। सपा और कांग्रेस की दोस्ती बहुत गहरी है।”
डिंपल यादव की मुस्कुराती सहमति ने इस बयान को और मजबूत कर दिया। यह केवल एक टिप्पणी नहीं थी—यह आने वाले राजनीतिक दिनों का संकेत था।
लेकिन इस पूरी मुलाकात का असर केवल राजनीतिक दायरे तक सीमित नहीं रहा। सोशल मीडिया पर इस घटना की तस्वीरें वायरल होते ही कई बड़े लेखक, बुद्धिजीवी और नागरिकों ने इसे विपक्ष की मजबूती की तस्वीर बताया। वरिष्ठ लेखक हफीज़ किदवई ने तो इसे “उम्मीद की तस्वीर” कहा। उन्होंने लिखा—
“ये तस्वीरें घबराहट पैदा करती हैं उन्हें… जिनके दिल में जगह बहुत कम है। मुझे यह तस्वीर बहुत पसंद है। ये लोग जब एक परिवार की तरह मिलते हैं तो यह हमें याद दिलाता है कि मायूस मत हो—एक दिन हम सब सम्भाल लेंगे।”
किदवई ने आगे लिखा कि जब भी डिंपल यादव, अखिलेश जी के साथ सोनिया गांधी और राहुल गांधी से मिलते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे दो परिवार एकजुट हो रहे हों। उन्होंने कहा—
“दोनों की ताकत एक है, और दोनों को मिटाने का सपना देखने वाले भी एक ही गिरोह के लोग हैं। दोनों बराबरी और सम्मान के मुद्दों पर एक जैसे खड़े होते हैं।”
यह भावनात्मक व्याख्या सिर्फ साहित्यिक नहीं—राजनीतिक यथार्थ भी है। एकजुट विपक्ष अक्सर सत्ता पक्ष की सबसे बड़ी चिंता होता है, और यह तस्वीरें उस घबराहट को बढ़ाने वाली थीं जिसका ज़िक्र किदवई ने भी किया। उनके शब्दों में—
“अकूत दौलत और प्रचंड ताकत के बावजूद विरोधियों का यह गठबंधन नहीं टूट रहा—यही उनकी असली जीत है।”
सोनिया गांधी के जन्मदिन के बहाने हुई इस मुलाकात ने एक नई राजनीतिक तस्वीर सामने रखी—एक ऐसी तस्वीर जिसमें विश्वास है, पारिवारिकता है, गठबंधन की गर्माहट है और एक साझा लक्ष्य है: देश को एक बेहतर भविष्य की ओर ले जाना। हफीज़ किदवई ने अंत में जो लिखा, वह इस मुलाकात का सार बन गया—
“एक रहिए, इकट्ठे रहिए… हम सब मिलकर अंधेरा दूर कर देंगे, बहुत जल्द।”






