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भारत में सड़क हादसे क्यों बढ़ रहे हैं? राष्ट्रीय राजमार्गों पर सुरक्षा की सबसे बड़ी खामियां

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एबीसी डेस्क 10 दिसंबर 2025

भारत सड़क हादसों का वैश्विक केंद्र बनता जा रहा है। हर साल लाखों परिवार सड़क पर अपनों को खोने के दर्द से टूट जाते हैं और यह स्थिति लगातार बदतर ही होती जा रही है। राष्ट्रीय राजमार्ग, जो देश के कुल सड़क नेटवर्क का महज 2% हिस्सा हैं, वहीं देश की 35–40% से ज्यादा मौतें दर्ज होती हैं। यह अनुपात दिखाता है कि जिस सड़क तंत्र को सुरक्षित और तेज़ परिवहन व्यवस्था का प्रतीक माना जाना चाहिए, वही अब मौतों का सबसे बड़ा मैदान बनता जा रहा है। वर्ष 2023 में सड़क परिवहन मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कुल 5,07,000 से अधिक सड़क हादसे हुए, जिनमें 1,72,000 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। इसका मतलब है कि औसतन हर दिन 472 लोग सड़क पर मरते हैं—हर तीन मिनट में एक जान समाप्त हो जाती है। इन मौतों का 36% हिस्सा सिर्फ राष्ट्रीय राजमार्गों पर दर्ज हुआ, और सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि 2022 की तुलना में 2023 में हादसों में 11% और मौतों में 9% की वृद्धि हुई है। यह साफ बताता है कि सड़क सुरक्षा सुधार की गति हादसों की बढ़ती रफ्तार के मुकाबले कहीं पीछे रह जाती है।

राष्ट्रीय राजमार्गों पर हादसों में वृद्धि की पहली और सबसे गंभीर वजह है कमजोर सड़क डिजाइन और अधूरा इंफ्रास्ट्रक्चर। देश के लगभग 40% राजमार्ग ऐसे हैं जहां लेन मार्किंग अधूरी, faded या पूरी तरह गायब है। 13,000 से अधिक “ब्लैक स्पॉट” चिन्हित हैं—यानी ऐसे स्थान जहां बार-बार दुर्घटनाएं होती हैं—लेकिन इनमें से हज़ारों अभी भी सुधारे नहीं गए। सड़क इंजीनियरिंग में खामियों के कारण होने वाले हादसों की हिस्सेदारी 20% तक पहुँच चुकी है, जो बताती है कि सड़क निर्माण में तकनीकी मानकों का पालन गंभीर रूप से कमजोर है। बारिश होने पर जलभराव और खराब ड्रेनेज कई स्थानों पर घातक फिसलन पैदा करते हैं, जिससे दुर्घटनाओं में 18% तक वृद्धि दर्ज की गई है। लंबी और बिल्कुल सीधी सड़कें ड्राइवर को मोनोटोन बनाकर झपकी जैसी स्थितियों को जन्म देती हैं, जो हाई-स्पीड क्रैश के बड़े कारणों में शामिल है। यह बेहद चिंताजनक है कि एक इंफ्रास्ट्रक्चर-प्रधान विकास मॉडल में भी सुरक्षा मानकों को उतना महत्व नहीं मिला, जितना मिलना चाहिए था।

तेज़ रफ्तार—यानी ओवरस्पीडिंग—अब भी राष्ट्रीय राजमार्गों पर मौतों की सबसे बड़ी वजह बनी हुई है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2023 में कुल सड़क हादसों में से 70% में सीधे-सीधे ओवरस्पीडिंग का योगदान था। हाईवे पर वाहन की औसत गति 90 से 110 किमी/घंटा तक पहुँच जाती है, और कई जगहों पर यह गति सुरक्षा सीमा से कहीं अधिक होती है। गति नियंत्रण के लिए स्थापित कानून तो हैं, लेकिन उनका प्रभाव लगभग नगण्य है—2023 में दर्ज किए गए गति उल्लंघन मामलों में से केवल 12% पर ही जुर्माना लगाया गया। यह दर्शाता है कि निगरानी तंत्र, कैमरा कवरेज और डिटेक्शन सिस्टम गंभीर रूप से कमजोर हैं। हाईवे पर वाहन जितना तेज चलता है, प्रतिक्रिया समय उतना ही कम हो जाता है; और एक छोटे से पल की गलती कई लोगों की जान ले लेती है। इस पूरी स्थिति में यह साफ है कि भारत में स्पीड मैनेजमेंट अब भी एक असफल प्रणाली है।

वाहन चालकों का असुरक्षित व्यवहार भी सड़क हादसों में बड़ी भूमिका निभाता है। हेलमेट न पहनने से दोपहिया वाहन चालकों की कुल मौतों में 46% का योगदान है, जबकि सीट बेल्ट न पहनने से कार चालकों और यात्रियों की 54% मौतें होती हैं। ओवरटेक गलत तरीके से करने के कारण हाईवे पर 14% मौतें दर्ज हुईं, और शराब पीकर गाड़ी चलाने जैसे मामलों में 7% हादसे जुड़े हुए पाए गए—हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि शराब के मामलों की रिपोर्टिंग अक्सर कम होती है। सड़क सुरक्षा व्यवहार में सुधार तब तक संभव नहीं जब तक लोग इसे कानून का विषय न मानकर अपनी जान बचाने का साधन न समझें। तेज रफ्तार और मानवीय लापरवाही एक साथ मिलकर एक घातक समीकरण बनाते हैं, जो हाईवे को और अधिक खतरनाक बना देता है।

कानून भारत में बने तो काफी हैं, लेकिन उनका पालन सबसे कमजोर कड़ी साबित होता है। सड़क सुरक्षा बजट का मात्र 1.5% हिस्सा प्रवर्तन यानी enforcement पर खर्च किया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक स्पीड मॉनिटरिंग कैमरों का कवरेज केवल 28% राष्ट्रीय राजमार्गों तक सीमित है। सड़क निर्माण के दौरान सुरक्षा ऑडिट न होना एक बड़ी समस्या है—2023 में बनाई या मरम्मत की गई परियोजनाओं में से 50% से अधिक में उचित सुरक्षा ऑडिट नहीं हुआ। सबसे अधिक चिंताजनक है चिकित्सा सहायता की देरी—कई राष्ट्रीय राजमार्गों पर एम्बुलेंस का रिस्पॉन्स टाइम 25 से 40 मिनट तक रहता है, जबकि WHO का मानक 10 मिनट का है। रिपोर्ट बताती है कि अगर समय पर इलाज मिल जाए, तो सड़क हादसों के कारण होने वाली 30% मौतें रोकी जा सकती हैं। यानी लोग कभी-कभी हादसे से नहीं, बल्कि देर से मिलने वाले इलाज के चलते मरते हैं।

राष्ट्रीय राजमार्गों पर कुछ विशेष खतरे हैं जो आम सड़कों पर नहीं मिलते। कुल सड़क नेटवर्क का 2% होने के बावजूद इन राजमार्गों पर देश की एक-तिहाई से अधिक मौतें होती हैं। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु—इन पांच राज्यों में ही कुल हाईवे हादसों की 53% हिस्सेदारी है। आवारा पशुओं के कारण होने वाली दुर्घटनाओं में 2018 की तुलना में 2023 में 27% की वृद्धि हुई है। रात के समय अचानक सड़क पर आ गया पशु कई बार सीधे टक्कर और कई बार पलटी की वजह बनता है। ओवरलोडेड ट्रक, बिना फिटनेस के चलने वाले भारी वाहन और खराब पुल या फ्लाइओवर हादसों को और गंभीर बना देते हैं। देश के छोटे कस्बों और गांवों से होकर गुजरने वाले हाईवे पैदल यात्रियों के लिए जानलेवा सिद्ध हो रहे हैं—2023 में राष्ट्रीय राजमार्गों पर 11,000 पैदल यात्री मौतें दर्ज हुईं, जो इस बात का सबसे कड़ा प्रमाण है कि हाईवे पर सुरक्षित सड़क पार करने की व्यवस्था बेहद अपर्याप्त है।

अंततः यह स्पष्ट है कि भारत में सड़क हादसे किसी तरह की किस्मत या नियति के परिणाम नहीं हैं—वे पूरी तरह से सुधारी जा सकने वाली गलतियों का परिणाम हैं। भारत हर साल सड़क हादसों में जितने लोगों को खोता है, वह संख्या कई देशों के युद्ध या महामारी में हुई मौतों से अधिक है। हाईवे सुरक्षित बन सकते हैं, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि वैज्ञानिक सड़क डिज़ाइन को प्राथमिकता मिले, ब्लैक स्पॉट्स का त्वरित सुधार हो, गति नियंत्रण सख्त और ऑटोमेटेड हो, लोगों में सुरक्षा व्यवहार की जागरूकता बढ़ाई जाए और हाईवे पर मेडिकल रेस्पॉन्स को तेज, सक्षम और आधुनिक बनाया जाए। जब तक विकास के साथ सुरक्षा को समान स्तर की प्राथमिकता नहीं मिलेगी, तब तक भारत दुनिया के सबसे अधिक घातक सड़क नेटवर्क वाले देशों में गिना जाता रहेगा। राष्ट्रीय राजमार्ग देश की लाइफ़लाइन हैं—लेकिन यदि सुधार न किए गए, तो वे विकास की जगह विनाश का मार्ग बनते रहेंगे।

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