महेंद्र सिंह | नई दिल्ली | 9 दिसंबर 2025
जब देश चारों ओर संकटों से घिरा हुआ है—प्रदूषण इतनी खतरनाक हद पर पहुँच चुका है कि लोग ऑक्सीजन सिलेंडर ढोने को मजबूर हैं, इंडिगो का संचालन ठप पड़कर हज़ारों यात्रियों को बेहाल कर रहा है, डॉलर 90 रुपये पार कर पूरी अर्थव्यवस्था को झटका दे रहा है, ट्रेनें मानो मालगाड़ी की तरह भरी हुई चल रही हैं, और राज्य-दर-राज्य पुल ढहकर लोगों की जान ले रहे हैं—ऐसे समय में उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी कैबिनेट जनता के सामने खड़े होकर ठोस जवाब देंगे। लेकिन संसद में जो हुआ, उसने साफ कर दिया कि यह सरकार काम कम, प्रवचन ज़्यादा देने की अभ्यस्त हो चुकी है। प्रधानमंत्री ने एक घंटे से ज़्यादा लंबे भाषण में इन किसी भी असली मुद्दे पर एक शब्द नहीं कहा, बल्कि इतिहास की किताबों को झाड़ते हुए वही पुराने नेहरू-मुग़ल-वंदे मातरम् के मुद्दे उठाए—जिनसे जनता के जीवन पर आज एक इंच भी फर्क नहीं पड़ता।
मोदी सरकार की यह प्रवृत्ति कोई नई नहीं। जब भी मुश्किलें सिर पर चढ़ जाती हैं—महँगाई बढ़ती है, बेरोज़गारी बढ़ती है, अर्थव्यवस्था गिरती है, उद्योग चरमराते हैं—सरकार इतिहास के पन्ने पलटने लगती है, ताकि जनता का ध्यान वर्तमान की असफलताओं से हट जाए। संसद में प्रधानमंत्री ने अपने पूरे भाषण को इस तरह ढाला मानो 2025 की जनता को यह जानना ज़रूरी है कि 1925 में क्या हुआ, या स्वतंत्रता संग्राम में किसने क्या कहा। लेकिन वह यह बताने से बचते रहे कि आज क्यों प्रदूषण ने बच्चों और बुजुर्गों का दम घोंट रखा है, क्यों इंडिगो का संचालन ठप बैठा है, क्यों भारतीय रेलवे व्यवस्था ढह रही है, और क्यों पुलों का गिरना अब भारत में एक सामान्य घटना हो गई है। यह चुप्पी केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक दिवालियापन का संकेत देती है।
सरकार की दूसरी पंक्ति—अमित शाह, राजनाथ सिंह और अन्य—भी प्रधानमंत्री की ही तर्ज पर बात कर रहे हैं। मुद्दे वही हैं: नेहरू, इंदिरा, मुग़ल, इतिहास, वंदे मातरम्… मानो आज देश को जिन समस्याओं ने घेर रखा है, वे कोई मायने ही नहीं रखतीं। गृह मंत्री अमित शाह संसद में खड़े होकर वंदे मातरम् की स्वर्ण जयंती, नेहरू द्वारा दो अंतरे अलग करने, इंदिरा गांधी द्वारा लोगों को जेल में डालने जैसे मुद्दे उठाते रहे। लेकिन उनसे भी किसी ने पूछा कि आज हज़ारों लोग इंडिगो के काउंटर पर खड़े क्यों हैं? प्रदूषण से बच्चों की साँसें क्यों टूट रही हैं? पुल क्यों गिर रहे हैं? रेल दुर्घटनाएँ क्यों बढ़ रही हैं? डॉलर क्यों उछल रहा है? लेकिन इन सवालों का जवाब देने की हिम्मत न प्रधानमंत्री में दिखी, न उनके मंत्रियों में।
यह स्पष्ट है कि यह सरकार असल मुद्दों से भागने में माहिर हो चुकी है। इतिहास की धूल झाड़कर नफरत का ढोल पीटना इसकी राजनीतिक रणनीति का स्थायी हिस्सा बन चुका है। ऐसा लगता है कि वर्तमान की विफलताओं को छुपाने के लिए अतीत की कहानियों का इस्तेमाल एक हथियार की तरह किया जा रहा है। जनता की असली समस्याओं पर खामोशी और इतिहास पर प्रवचन—मोदी सरकार की यही पहचान बन चुकी है। ट्रेन की भीड़ ‘मुग़ल’ सुनकर कम नहीं होती, प्रदूषण ‘नेहरू’ कह देने से साफ नहीं होता, और इंडिगो की उड़ानें ‘वंदे मातरम्’ की बहस से समय पर नहीं उड़तीं। यह वही कोशिश है जो हर बार सरकार संकट में पड़ने पर करती है—ध्यान भटकाओ, असली सवालों से बचो, भावनाओं का जाल बुनो।
लोग क्या उम्मीद कर रहे थे और प्रधानमंत्री ने क्या कहा—वह केवल व्यंग्य नहीं है, वह भारत की राजनीति का दुखद सच है। जनता को चाहिए समाधान, जवाबदेही, योजनाएँ, ठोस कार्रवाई; लेकिन सरकार के पास है सिर्फ प्रवचन, इतिहास, और भावनाओं का जाल। यह वह स्थिति है जहाँ नेतृत्व नहीं, बल्कि प्रशासनिक पलायन और राजनीतिक रंगमंच दिखाई देता है। आज जब देश के करोड़ों नागरिक अपनी रोज़मर्रा की परेशानियों से जूझ रहे हैं, तब सरकार की प्राथमिकताएँ यह दिखाती हैं कि उसके लिए सत्ता की चिंता जनता की संकटों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।




