एबीसी डेस्क 8 दिसंबर 2025
दिलीप को मिली राहत, आठ वर्षों की बहुचर्चित कानूनी जंग पर लगा विराम
कोच्चि की एरणाकुलम प्रिंसिपल सेशंस कोर्ट ने सोमवार (8 दिसंबर 2025) को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मलयालम फिल्म इंडस्ट्री के लोकप्रिय अभिनेता दिलीप को केरल एक्टर रेप केस में सभी आरोपों से बरी कर दिया। करीब आठ वर्षों तक चले बेहद संवेदनशील और बहुचर्चित मुकदमे के बाद यह फैसला सामने आया, जिसने न केवल सिनेमा जगत बल्कि केरल के सामाजिक–राजनीतिक परिदृश्य को भी वर्षों तक झकझोरा था। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि अभियोजन पक्ष दिलीप के खिलाफ लगाए गए आरोपों के लिए आवश्यक और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहा, जिसके आधार पर उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता। दिलीप इस केस में आठवें आरोपी थे और लंबे समय से यह दावा करते आए थे कि उन पर लगाए आरोप राजनीतिक और व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरित हैं।
न्यायाधीश हनी एम. वर्गीस का फैसला—सबूतों की कमी में दिलीप दोषमुक्त, छह अन्य आरोपित दोषी
एरणाकुलम प्रिंसिपल सेशंस जज हनी एम. वर्गीस ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि मामले की संवेदनशीलता और जटिलता के बावजूद, अदालत कानून और साक्ष्यों के आधार पर ही निर्णय दे सकती है। लगभग आठ वर्षों में सैकड़ों गवाह, इलेक्ट्रॉनिक सबूत, डिजिटल रिकॉर्ड और गवाही–जिरह के बाद अंततः अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि दिलीप की संलिप्तता साबित करने के लिए अभियोजन का मामला पर्याप्त नहीं था। हालांकि अदालत ने बाकी छह आरोपियों को दोषी ठहराया है, जिनके खिलाफ अपराध में प्रत्यक्ष भूमिका के सबूत अदालत के सामने मजबूत रूप से स्थापित हुए। इन दोषियों को सज़ा 12 दिसंबर को सुनाई जाएगी, जिसके बाद मामले का एक अहम अध्याय बंद हो जाएगा।
इस केस में कई उतार-चढ़ाव रहे—राजनीतिक बयानबाज़ी, फिल्म इंडस्ट्री के भीतर गुटबाज़ी, सोशल मीडिया अभियानों से लेकर गवाहों पर दबाव और जांच एजेंसियों की भूमिका तक, हर पहलू ने इसे देश का सबसे हाई-प्रोफाइल क्रिमिनल केस बना दिया था।
केरल की सामाजिक–राजनीतिक बहस को वर्षों तक दिशा देने वाला केस
यह मुकदमा केवल एक आपराधिक मामला नहीं था, बल्कि केरल की सामाजिक सोच, राजनीति, सिनेमा इंडस्ट्री और महिला अधिकारों पर गहरा प्रभाव डालने वाला मुद्दा बन गया था। इस केस ने महिलाओं की सुरक्षा, फिल्म इंडस्ट्री में शक्ति संरचनाओं और पितृसत्तात्मक व्यवहार पर प्रश्नचिह्न लगाए। कई महिला संगठनों, एक्टिविस्टों और फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े समूहों ने लगातार अदालत और सरकार पर निष्पक्ष जांच की मांग की, जबकि दिलीप के समर्थक इसे साजिश बताते रहे। इस वजह से केस एक न्यायिक लड़ाई से आगे बढ़कर सामाजिक विमर्श का केंद्र बन गया।
इसके साथ ही, यह मामला केरल की राजनीति को भी प्रभावित करता रहा—फिल्म जगत में नए संगठनों का गठन हुआ, पुराने संघटन टूटे, और कई चर्चित कलाकार इस बहस में खुलकर शामिल हुए। अदालत का आज का फैसला इन सभी राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं को एक नया मोड़ दे सकता है।
दोषियों की सज़ा पर 12 दिसंबर को फैसला—केस का अंतिम चरण निर्णायक
अब निगाहें 12 दिसंबर पर टिकी हैं, जब अदालत दोषी पाए गए छह आरोपियों को सज़ा सुनाएगी। माना जा रहा है कि अदालत अपने निर्णय में अपराध की गंभीरता, पीड़िता के आघात और मुकदमे की लंबाई को ध्यान में रखते हुए महत्वपूर्ण आदेश दे सकती है। इस केस ने भारतीय न्याय व्यवस्था में पीड़िता की आवाज, डिजिटल सबूतों की भूमिका और सामाजिक दबाव के बीच न्यायिक स्वतंत्रता की मजबूती जैसे कई बड़े सवाल खड़े किए थे।
दिलीप की आज की बरी होने की घोषणा पर उनके समर्थकों ने कोर्ट परिसर में खुशी जताई, जबकि पीड़िता के पक्ष के लोग निराश नज़र आए। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या अभियोजन पक्ष आगे इस फैसले के खिलाफ अपील दायर करता है या नहीं।




