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इंडिगो पर कांग्रेस का वार: मोनोपॉली मॉडल, DGCA की नाकामी और बीजेपी–इंडिगो निकटता—सरकार पूरी तरह फेल

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सुमन कुमार । नई दिल्ली 6 दिसंबर 2025

देश के उड्डयन क्षेत्र को हिला देने वाले इंडिगो संकट पर कांग्रेस ने केंद्र सरकार को घेरते हुए बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता शशिकांत सेंथिल ने कहा कि मोदी सरकार के 11 सालों में भारतीय एविएशन सेक्टर को एक स्वस्थ, प्रतिस्पर्धी उद्योग के रूप में विकसित करने की जगह जानबूझकर उसे कुछ बड़े खिलाड़ियों के कब्जे में धकेल दिया गया। देश की हवाई व्यवस्था पहले विविधतापूर्ण थी—7–8 एयरलाइंस सक्रिय थीं, जिससे किराए, सेवाएं और यात्रियों के अधिकार संतुलन में रहते थे। लेकिन आज पूरा सेक्टर दो–तीन कंपनियों पर निर्भर है। सेंथिल ने कहा कि “यह मोनोपॉली मॉडल सरकार की ही देन है, और जैसे ही इनमें से एक कंपनी लड़खड़ाती है, पूरा देश ठप पड़ जाता है। यह किसी भी सक्षम लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था की निशानी नहीं, बल्कि सत्ता–कॉरपोरेट गठजोड़ का संकेत है।”

सेंथिल ने सबसे महत्वपूर्ण सवाल DGCA की भूमिका पर खड़ा किया। उन्होंने कहा कि जनवरी 2024 में जारी किए गए FDTL—Flight Duty Time Limitation नियम उड़ान सुरक्षा के लिए बेहद निर्णायक थे, लेकिन इंडिगो ने बार–बार इन नियमों की अनदेखी की। जुलाई 2025 में आंशिक और नवंबर 2025 से पूर्ण लागू होने के बावजूद DGCA ने न तो कंपनी को कड़ी चेतावनी दी, न दंडात्मक कार्रवाई की, न ही नियामक निगरानी के सामान्य मानकों का पालन करवाया। उन्होंने पूछा, “क्या DGCA सिर्फ नाम का रेगुलेटर बनकर रह गया? क्या सरकार ने कभी इंडिगो को नोटिस जारी किया, या फिर उसे शुरू से ही संरक्षण दिया जाता रहा? आखिर क्यों एक एयरलाइन को नियमों से ऊपर रखा गया?”

इसके बाद शशिकांत सेंथिल ने वह सवाल उठाया जिसने पूरे राजनीतिक हल्के में हलचल पैदा कर दी है—इलेक्टोरल बॉन्ड। उन्होंने कहा कि इंटरग्लोब समूह और उसके प्रमोटरों द्वारा बीजेपी को दिए गए भारी–भरकम इलेक्टोरल बॉन्ड अब सार्वजनिक हैं। उन्होंने सीधे पूछा—“क्या बीजेपी और इंडिगो की यही वित्तीय निकटता DGCA की चुप्पी और सरकार की नर्मदिली का कारण है? जब यात्रियों की सुरक्षा दांव पर थी, क्या उस समय भी चुनावी फंडिंग ही प्राथमिकता बनी रही?” उन्होंने कहा कि यदि यह आरोप सही है तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा से खिलवाड़ है।

सेंथिल ने उड्डयन मंत्री किंजरापु राम मोहन नायडू को भी कठघरे में रखा। उन्होंने कहा कि हजारों लोग एयरपोर्ट्स पर फंसे हैं, सैकड़ों उड़ानें रद्द हो रही हैं, देश की सबसे बड़ी एयरलाइन चरमराई हुई है, और मंत्री सिर्फ “स्थिति पर नज़र है” जैसे बासी बयान दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि “क्या मंत्री जिम्मेदारी लेंगे या फिर अस्पष्ट और अर्थहीन वक्तव्यों के पीछे छिपते रहेंगे? देश संकट में है और सरकार कहीं दिखाई नहीं दे रही।”

अंत में शशिकांत सेंथिल ने कहा,
“मुझे सरकार की तरफ से कोई पहल दिखाई नहीं देती। ऐसा लगता है जैसे यह संकट सरकार के लिए कोई मुद्दा ही नहीं है। लोग परेशान हैं, एयरपोर्ट अफरातफरी में है, लेकिन केंद्र की तरफ से कोई ठोस कदम नहीं—यह पूरी तरह सरकारी विफलता है।”

उन्होंने कहा कि भारत का एविएशन सेक्टर आज जिस डगमगाती स्थिति में है, वह किसी तकनीकी खामी का परिणाम नहीं, बल्कि गलत नीतियों, नाकाम नियमन और राजनीतिक–कॉरपोरेट गठजोड़ का परिणाम है। और इसका सबसे बड़ा नुकसान उसी आम आदमी को हो रहा है जिसका कोई गुनाह नहीं।

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