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पतंजलि–मॉस्को करार पर सवाल: रूस में योग–वेलनेस विस्तार की घोषणा के बीच रामदेव के असफल दावों का लंबा इतिहास

सुमन कुमार। नई दिल्ली 6 दिसंबर 2025

दिल्ली में योग गुरु रामदेव और मॉस्को सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में पतंजलि–मॉस्को समझौता हुआ, जिसे योग, आयुर्वेद, वेलनेस रिसर्च और लाइफस्टाइल डिजीज मैनेजमेंट के नए अंतरराष्ट्रीय अध्याय के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। रूस की राजधानी मॉस्को के मंत्री सर्गेई चेरेमिन और पतंजलि प्रतिनिधियों ने इस करार को एक दीर्घकालीन रणनीति बताया है, जिसमें आने वाले वर्षों में भारत से कुशल योग–आयुर्वेद विशेषज्ञों को रूस भेजने, वहां वेलनेस सेंटर स्थापित करने और व्यापारिक संबंधों को 2030 तक 100 बिलियन डॉलर तक ले जाने जैसे बड़े लक्ष्य शामिल हैं। इस करार को भारत और रूस के अब तक के सांस्कृतिक सहयोगों का विस्तार बताया जा रहा है, जिसमें योग विश्वभर में भारतीय पहचान का मुख्य माध्यम माना जा रहा है। रूस में योग और भारतीय आयुर्वेद के लिए पहले से ही एक बड़ा उपभोक्ता वर्ग मौजूद है, ऐसे में पतंजलि का प्रवेश वहां की वेलनेस इंडस्ट्री के लिए एक संभावित अवसर के रूप में देखा जा रहा है।

लेकिन इस उत्साहजनक तस्वीर के समानांतर एक दूसरी कहानी भी चल रही है—और वह है रामदेव के उन दावों और पहल का रिकॉर्ड, जो समय–समय पर गलत साबित हुए या वैज्ञानिक कसौटियों पर खरे नहीं उतरे। स्वास्थ्य जगत और वैज्ञानिक समुदाय वर्षों से इस बात पर ज़ोर देता आया है कि रामदेव के बड़े-बड़े वादों और उत्पादों की विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। कोविड महामारी के समय ‘कोरोनिल’ को कोरोना का पहला प्रमाणित इलाज बताने का दावा इसका सबसे बड़ा उदाहरण था। सरकार ने बाद में स्पष्ट किया कि कोरोनिल को केवल एक इम्युनिटी बूस्टर के रूप में अनुमति मिली थी, किसी इलाज के तौर पर नहीं। WHO ने भी यह साफ शब्दों में कहा कि उसने कोरोनिल को न तो प्रमाणित किया है, न समर्थन। इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पतंजलि और रामदेव के दावों को गहरी आलोचना के घेरे में ला दिया। वहीं 2021 में एलोपैथी को “मूर्खता भरा विज्ञान” कहने वाला उनका बयान देशभर के डॉक्टरों और विशेषज्ञों के लिए एक बड़ा झटका था, जिसके बाद उन्हें भारी विरोध के बीच अपना बयान वापस लेना पड़ा।

रामदेव वर्षों से यह दावा करते रहे हैं कि योग कैंसर, अस्थमा, मधुमेह, HIV जैसे गंभीर रोगों को पूरी तरह ठीक कर सकता है। लेकिन मेडिकल साइंस और डॉक्टरों ने ऐसे सभी दावों को निराधार बताया है। अदालतों में भी इन दावों की सत्यता पर सवाल उठे। इसके अलावा पतंजलि के उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर भी विभिन्न अवसरों पर विवाद सामने आए। कई बार पतंजलि की दवाइयां और खाद्य पदार्थ सरकारी लैब परीक्षणों में फेल पाए गए। उत्तराखंड सरकार की लैब, DRDO और स्वतंत्र लैबों की रिपोर्टों में पतंजलि के कई उत्पाद गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे। हाल ही में कोर्ट ने पतंजलि के घी के नमूनों को घटिया गुणवत्ता का बताते हुए कंपनी को कड़ी फटकार लगाई, जिससे कंपनी की विश्वसनीयता फिर सवालों में आ गई। 2017 में हरियाणा विधानसभा में परोसा गया पतंजलि एलोवेरा जूस भी अनफिट फॉर कंजम्प्शन घोषित किया गया था। इसी तरह “चीनी रहित” बताए गए कुछ पेय पदार्थों में बाद में शुगर पाई गई, जिसके बाद कंपनी को सफाई देनी पड़ी। यह पूरा इतिहास बताता है कि रामदेव और पतंजलि के दावों को हमेशा वैज्ञानिक परीक्षणों और निरीक्षण की दृष्टि से देखा जाना चाहिए।

इन सभी विवादों और असफल दावों के मद्देनज़र रूस के साथ हुए इस नए वेलनेस करार का भविष्य भी सवालों के घेरे में है। रूस में योग और भारतीय परंपरागत चिकित्सा के प्रति गहरी रुचि है, लेकिन पतंजलि के लिए यह लोकप्रियता जिम्मेदारी के साथ आने वाली कसौटी भी है। विशेषज्ञों का कहना है कि रूस को इस साझेदारी में अत्यधिक सतर्कता बरतनी होगी क्योंकि भारत में बार-बार पतंजलि के दावों और उत्पादों पर सवाल उठते रहे हैं। यदि पतंजलि रूस में अपने कार्यक्रमों, शोध या उत्पादों को किसी ठोस वैज्ञानिक आधार और गुणवत्ता परीक्षणों के बिना आगे बढ़ाती है, तो इसका असर न केवल उपभोक्ताओं पर पड़ेगा बल्कि भारत की आयुर्वेदिक विरासत की विश्वसनीयता पर भी पड़ेगा।

इसलिए जहाँ एक ओर यह करार भारत–रूस सांस्कृतिक और व्यापारिक रिश्तों को मजबूत करने का बड़ा अवसर है, वहीं दूसरी ओर यह भी आवश्यक है कि रामदेव के पिछले रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए पारदर्शिता, वैज्ञानिकता और गुणवत्ता की कठोर निगरानी सुनिश्चित की जाए। दुनिया योग और आयुर्वेद को भारत का प्रामाणिक उपहार मानती है—लेकिन यह उपहार तभी सार्थक है जब इसके साथ सत्य, प्रमाणिकता और जिम्मेदारी भी जुड़ी रहे।

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