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नए स्मार्टफोन में अनिवार्य सरकारी ऐप! गोपनीयता पर बड़ा विवाद, उद्योग और विशेषज्ञों में हड़कंप

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अवधेश कुमार । नई दिल्ली 2 दिसंबर 2025

भारत सरकार ने देश के 1.2 अरब से अधिक मोबाइल उपयोगकर्ताओं के लिए एक बड़ा और विवादित फैसला लिया है—अब सभी नए स्मार्टफोन में अनिवार्य रूप से सरकारी साइबर सुरक्षा ऐप “संचार साथी” (Sanchar Saathi) पहले से इंस्टॉल करना होगा। आदेश पिछले हफ्ते जारी हुआ था लेकिन सोमवार को सार्वजनिक हुआ। इसमें स्मार्टफोन निर्माताओं को 90 दिनों के भीतर यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया कि हर नया डिवाइस इस ऐप के साथ आए और उसकी “फंक्शनैलिटी को न तो हटाया जा सके और न ही सीमित किया जा सके।” सरकार का दावा है कि ऐप फोन की असली पहचान (IMEI) की जाँच, चोरी हुए फ़ोन का ट्रैकिंग, और टेलीकॉम धोखाधड़ी रोकने में मदद करता है। लेकिन साइबर विशेषज्ञों और निजता अधिकार समूहों का कहना है—यह फैसला निगरानी बढ़ाने वाला है और लाखों भारतीयों की गोपनीयता पर सीधा हमला है।

ऐप की प्राइवेसी पॉलिसी ने आलोचना को और बढ़ा दिया है। इसमें ऐप को फोन कॉल मैनेज करने, संदेश पढ़ने और भेजने, कॉल व मैसेज लॉग एक्सेस करने, कैमरा, फोटो, फाइल और कई संवेदनशील डेटा तक पहुँच की अनुमति दी गई है। इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन (IFF) का कहना है कि सरल भाषा में इसका मतलब है—“भारत में बिकने वाला हर स्मार्टफोन एक ऐसी सरकारी सॉफ़्टवेयर मशीन बन जाएगा जिसे उपयोगकर्ता न तो अस्वीकार कर सकते हैं, न नियंत्रित और न ही हटाया जा सकता है।” इस बयान ने पूरे टेक उद्योग में हलचल मचा दी है।

बढ़ते विरोध को शांत करने के लिए संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया सामने आए और कहा कि ऐप “पूरी तरह वैकल्पिक” है और उपयोगकर्ता चाहे तो इसे डिलीट कर सकते हैं। लेकिन बड़े सवाल का जवाब अधर में छोड़ दिया गया—जब आदेश कहता है कि ऐप की कार्यक्षमता “डिसेबल या रेस्ट्रिक्ट” नहीं की जा सकती, तो इसे हटाया कैसे जाएगा? इस अस्पष्टता ने विवाद को और गहरा कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के स्पष्टीकरण और आदेश के कानूनी शब्दों में विरोधाभास है।

सरकार का तर्क है कि भारत के विशाल सेकंड-हैंड मोबाइल मार्केट में नकली या स्पूफ्ड IMEI नंबर वाले फोन सुरक्षा के लिए खतरा बन चुके हैं। कई मामलों में चोरी या ब्लैकलिस्टेड फोन दोबारा बेचे जाते हैं, और खरीदार अनजाने में अपराध का हिस्सा बन जाते हैं। विभाग का कहना है कि संचार साथी ऐप ने अब तक 7 लाख से अधिक चोरी हुए फोन वापस दिलाने में मदद की है—जिसमें अकेले अक्टूबर महीने में 50,000 डिवाइस शामिल हैं। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि सुरक्षा और निजता के बीच संतुलन जरूरी है—अनियंत्रित सरकारी एक्सेस सुरक्षा नहीं, बल्कि निगरानी की दिशा में कदम हो सकता है।

तकनीकी विशेषज्ञ प्रसांतो के. रॉय ने कहा कि असल चिंता ऐप की व्यापक परमिशन को लेकर है। “हम यह नहीं देख सकते कि ऐप बैकग्राउंड में क्या करता है, बस यह देख पा रहे हैं कि इसे फोन की लगभग हर चीज की अनुमति चाहिए—फ़्लैशलाइट से लेकर कैमरा तक। यह अपने आप में चिंता पैदा करता है।” वहीं उद्योग जगत के लिए भी यह आदेश एक चुनौती है, क्योंकि अधिकांश कंपनियाँ—खासकर Apple—सरकारी ऐप को पहले से इंस्टॉल करने की अनुमति नहीं देतीं। रिपोर्ट्स के अनुसार Apple इस नियम का पालन नहीं करना चाहता और अपनी चिंताएँ दिल्ली तक पहुँचाने की तैयारी में है।

यह पहली बार नहीं है जब किसी देश ने स्मार्टफोन में अनिवार्य सरकारी ऐप का आदेश दिया हो। रूस ने इसी साल सभी डिवाइसों में राज्य समर्थित मैक्स मैसेंजर ऐप अनिवार्य किया था, जिसके बाद निगरानी को लेकर वही बहस उठी जो अब भारत में देखी जा रही है।

भारत की बढ़ती डिजिटल आबादी के बीच यह फैसला देश की प्राइवेसी बहस को नए मोड़ पर ले आया है—क्या सुरक्षा के नाम पर उपयोगकर्ताओं की निजता से समझौता किया जा सकता है? या फिर यह कदम डिजिटल युग में नागरिक अधिकारों पर एक नई चुनौती है? आने वाले महीनों में कंपनियों की प्रतिक्रिया, ऐप की वास्तविक कार्यप्रणाली और सरकार की स्पष्टता इस पूरे विवाद का भविष्य तय करेंगी।

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