महेंद्र सिंह। नई दिल्ली 1 दिसंबर 2025
कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मौजूदा सरकार पर ऐसा हमला बोला जिसने सत्ता पक्ष की “स्लोगन राजनीति” को कटघरे में खड़ा कर दिया। वेणुगोपाल ने कहा कि प्रधानमंत्री जब भी कोई बयान देते हैं, तो कम से कम यह सोच लेना चाहिए कि वह खुद और उनकी पार्टी क्या कर रही है। उन्होंने कहा कि आज PM संसद में विपक्ष को नसीहत देते फिर रहे हैं कि सदन में नारेबाज़ी ठीक नहीं, लेकिन देश की राजनीतिक ज़मीन पर “स्लोगन कल्चर” सबसे पहले बीजेपी ने ही शुरू किया—“मोदी-मोदी” के जबरदस्त शोर से।
वेणुगोपाल ने तीखा सवाल दागा कि क्या देश ने पंडित जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी या अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में कभी ऐसा तमाशा देखा था? क्या कभी ऐसा हुआ कि प्रधानमंत्री सदन में प्रवेश करें और उनके नाम के नारे लगाए जाएं? उन्होंने कहा कि पहले प्रधानमंत्री की गरिमा होती थी, पद का सम्मान होता था, अब सत्ता पक्ष राजनीति को भीड़-तंत्र में बदल चुका है।
उन्होंने कहा कि विडंबना यह है कि विपक्ष लोकतंत्र बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, सरकार को उसके गलत फैसलों और नाकाम नीतियों पर घेर रहा है—यह विपक्ष की जिम्मेदारी है—लेकिन उल्टा सरकार ही नारे लगा रही है और फिर उसी पर रोक लगाने का उपदेश भी दे रही है। यह राजनीतिक पाखंड की हद है।
वेणुगोपाल ने SIR मुद्दे को लेकर सरकार और चुनाव आयोग, दोनों पर सीधा आरोप लगाया कि यह किसी एक शिकायत या एक प्रक्रिया का मामला नहीं है—यह भारत की संपूर्ण चुनावी व्यवस्था के ढह जाने का सबूत है। उन्होंने कहा कि देश में चुनाव प्रणाली पूरी तरह चरमरा चुकी है, चुनाव आयोग अपनी स्वतंत्रता खो चुका है और अब किसी निष्पक्ष संस्था की तरह नहीं, बल्कि सरकार के “अटैच्ड ऑफिस” की तरह काम कर रहा है।
उन्होंने कहा कि आज हालत यह है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष चुनाव कराने की बजाय सत्ता पक्ष को बचाने और विपक्ष को नुकसान पहुंचाने का उपकरण बन गया है। BLOs की मौतें, SIR दबाव, पारदर्शिता का अभाव, और चुनावी सुधारों पर चर्चा से सरकार का भागना—ये सभी संकेत बताते हैं कि लोकतंत्र गंभीर संकट में है।
वेणुगोपाल ने कहा कि “देश में लोकतंत्र को फिर से स्थापित करना अब सिर्फ एक राजनीतिक एजेंडा नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय जिम्मेदारी है।” उन्होंने दावा किया कि विपक्ष एकजुट होकर इस लड़ाई को आगे बढ़ाएगा क्योंकि यदि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं रहेंगे, तो देश की पूरी संवैधानिक संरचना ढह जाएगी।
उनके इस बयान ने संसद और राजनीतिक हलकों में तीखी हलचल मचा दी है और सरकार पर SIR व चुनावी पारदर्शिता के सवालों को लेकर भारी दबाव बना दिया है।




