ऋषिका । नई दिल्ली 26 नवंबर 2025
कांग्रेस पर दशकों से यह आरोप लगता रहा है कि उसने हिंदू परंपराओं, आस्था और सांस्कृतिक प्रतीकों की अनदेखी की, लेकिन सच इसके बिल्कुल उलट है। देश के ऐतिहासिक रिकॉर्ड और सरकारी दस्तावेज़ बताते हैं कि हिंदू संस्कृति, धार्मिक धरोहर और आध्यात्मिक विरासत के संरक्षण में सबसे बड़े, सबसे संगठित और सबसे दूरगामी कदम कांग्रेस सरकारों ने ही उठाए। चाहे बात हो गंगा जैसी पवित्र नदी की सफाई की, रामलीला और रामायण महोत्सव के संवर्धन की, योग को वैश्विक पहचान दिलाने की, वाराणसी और चारधाम यात्रा जैसी प्राचीन धरोहरों के संरक्षण की—कांग्रेस ने हिंदू विरासत को मजबूत बनाने के लिए शासन शक्ति का इस्तेमाल किया, लेकिन कभी इसे चुनावी भाषणों या धर्म-आधारित वोट बैंक की राजनीति में नहीं बदला। इसके विपरीत, आज की राजनीति में बीजेपी इन्हीं सांस्कृतिक प्रतीकों को बेचकर, धर्म को नारों में बदलकर, इतिहास को प्रचार में बदलकर वोट हासिल करने का रास्ता अपनाए हुए है।
गंगा एक्शन प्लान आज भी भारत में नदी संरक्षण की सबसे महत्वाकांक्षी ऐतिहासिक परियोजनाओं में से एक माना जाता है। यह योजना कांग्रेस सरकार ने तब शुरू की, जब देश में पर्यावरण और जल संरक्षण पर किसी का ध्यान तक नहीं जाता था। घाटों का पुनर्निर्माण, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, प्रदूषण नियंत्रण और गंगा के जलग्रहण क्षेत्र को बचाने जैसे बड़े फैसले भारतीय पर्यावरण नीति को एक नए युग में ले गए। यह हिंदू आस्था को मजबूत करने का काम था—लेकिन बिना धार्मिक नारों, बिना राजनीतिक नफे-नुकसान और बिना वोट माँगे। इसके विपरीत, आज गंगा राजनीति का स्थायी मुद्दा है, लेकिन वास्तविक सफाई और संरक्षण की गति जनता प्रतिदिन देख रही है।
योग आज विश्वभर में भारतीय पहचान का बड़ा प्रतीक है, लेकिन इसके संस्थागत प्रसार की नींव भी कांग्रेस सरकारों ने ही रखी। आयुष मंत्रालय की आधारभूत संरचना, योग अनुसंधान, योग को सांस्कृतिक-चिकित्सीय विज्ञान के रूप में मान्यता देना और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) के माध्यम से योग को वैश्विक मंच तक पहुँचाना—यह सब राजनीतिक चमक-दमक के बिना हुआ। कांग्रेस ने कभी योग को धर्म विशेष की राजनीति में नहीं बदला। योग को “हिंदू बनाम अन्य” की बहस में झोंकने का काम बाद की सरकारों ने किया, जबकि कांग्रेस के शासन में यह “भारत की ज्ञान विरासत” के रूप में दुनिया तक पहुँचा।
हिंदू संस्कृति की सबसे जीवंत परंपराओं में से एक—रामलीला—को संरक्षित और प्रोत्साहित करने में भी कांग्रेस की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। चाहे दिल्ली के रामलीला मैदान की विशाल परंपरा को सुरक्षित करना हो, या काशी, अयोध्या और भारत के दर्जनों शहरों में होने वाली पारंपरिक रामलीलाओं को सरकारी सहायता देना—कांग्रेस सरकारों ने हमेशा इसे सांस्कृतिक धरोहर के रूप में देखा, न कि वोट जुटाने का मंच। वहीं बीजेपी राम नाम को राजनीतिक नारे में बदलकर चुनावी भाषणों में भुनाती रही है, जबकि वास्तविक सांस्कृतिक संरक्षण का काम कांग्रेस की फाइलों और बजटों में दर्ज है।
वाराणसी, जिसे दुनिया का सबसे प्राचीन जीवित शहर कहा जाता है, उसके संरक्षण, उसकी गलियों, घाटों और विरासत को बचाने का संगठित प्रयास भी कांग्रेस शासन में हुआ। काशी को हेरिटेज शहर के रूप में संरक्षित करना, उसके घाटों को पुनर्जीवित करना और सांस्कृतिक परियोजनाएँ शुरू करना—यह धार्मिक राजनीति नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत जिम्मेदारी थी। आज वाराणसी को राजनीति का ब्रांड बना दिया गया है, लेकिन उसकी धरोहर के असली आधार कांग्रेस ने ही मजबूत किए थे।
चारधाम यात्रा से जुड़े मार्गों, पुलों, सुरक्षा संरचनाओं और ठहरने की व्यवस्थाओं की शुरुआत भी कांग्रेस शासन में ही हुई। कठिन पहाड़ी क्षेत्रों में तीर्थयात्रियों के लिए सुरक्षित, सुगम और आधुनिक यात्रा নিশ্চিত करने के लिए किए गए ये प्रयास हिंदू धार्मिक भावनाओं की सेवा ही थे। लेकिन कांग्रेस ने कभी इन्हें चुनावी मंचों पर “धार्मिक उपलब्धि” की तरह पेश नहीं किया। इसके उलट, बीजेपी इन तीर्थस्थलों को राजनीतिक पूँजी में बदलकर वोटों की भाषा में पेश करती है।
दूरदर्शन पर रामायण और महाभारत का प्रसारण भारतीय टेलीविजन इतिहास की सबसे सांस्कृतिक घटनाओं में से एक रहा है। ये दोनों महाकाव्य कांग्रेस शासन में देश के हर घर तक पहुँचे, और लोगों को धर्म, संस्कृति और नैतिक मूल्यों से जोड़ने का कार्य किया। कांग्रेस ने इसे “सांस्कृतिक कनेक्ट” के रूप में किया — न कि “हिंदू वोट” के रूप में। आज यही परंपराएँ राजनीतिक युद्धघोष बन चुकी हैं।
कांग्रेस शासन में हजारों हिंदू मंदिरों का निर्माण, पुनर्निर्माण, संरक्षण और मरम्मत सरकारी सहायता से हुए। कई मंदिरों को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया गया, सुरक्षा दी गई और पुनरुद्धार पर पैसा खर्च किया गया। लेकिन कांग्रेस ने कभी इन कार्यों का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश नहीं की। वहीं बीजेपी के दौर में मंदिरों को चुनावी प्रतीक, धार्मिक ध्रुवीकरण का हथियार और राजनीतिक मुनाफे का साधन बना दिया गया।
इतना ही नहीं, कांग्रेस नेताओं ने हिंदू धर्म, वेदांत, उपनिषद, भारतीय दर्शन और आध्यात्मिकता पर कई पुस्तकें लिखीं—जो इस बात का प्रमाण हैं कि पार्टी के भीतर गहरी सांस्कृतिक समझ और आध्यात्मिक रुचि मौजूद रही है। लेकिन इन पुस्तकों को राजनीतिक मंचों से प्रचारित कर वोट मांगने का कभी प्रयास नहीं किया गया।
अंततः, तस्वीर साफ है—कांग्रेस ने हिंदू संस्कृति पर काम किया, उसके संरक्षण के लिए नीतियाँ बनाईं, संस्थाएँ खड़ी कीं और संसाधन लगाए, लेकिन कभी धर्म को राजनीति का साधन नहीं बनाया। वहीं बीजेपी ने धर्म को नारे में बदला, मंदिरों को चुनावी मुद्दा बनाया, हिंदू प्रतीकों को वोट मशीन बना दिया। यही अंतर बताता है कि वास्तव में हिंदू विरासत की असली रखवाली किसने की—काम करने वालों ने या धर्म बेचकर वोट माँगने वालों ने?




