[the_ad id="179"]
Home » National » 26 साल में 1,34,735 छात्र आत्महत्याएं—कसूरवार कौन? स्कूलों की क्रूर प्रतिस्पर्धा या मां-बाप का अंधा दबाव?

26 साल में 1,34,735 छात्र आत्महत्याएं—कसूरवार कौन? स्कूलों की क्रूर प्रतिस्पर्धा या मां-बाप का अंधा दबाव?

अवधेश कुमार | नई दिल्ली 21 नवंबर 2025

पिछले 26 वर्षों में भारत में छात्र-आत्महत्या के आंकड़े चौंकाने वाले और डराने वाले दोनों हैं। NCRB के अनुसार 1995 से 2021 तक 1,34,735 छात्रों ने आत्महत्या की, यानी हर साल औसतन हज़ारों घर बिखरते रहे, पर सवाल वही खड़ा है—दोषी कौन? शिक्षा-व्यवस्था या पारिवारिक दबाव? यह संख्या सिर्फ एक डेटा नहीं, यह भारत के युवाओं की टूटती मानसिकता, शिक्षा-क्षेत्र की अंधी प्रतिस्पर्धा और परिवार की बढ़ती अपेक्षाओं का सामूहिक परिणाम है। यह कड़वा सच हमें बताता है कि शिक्षण संस्थानों में बढ़ते तनाव, दंडात्मक वातावरण, रिज़ल्ट-केंद्रित सोच और कमजोर काउंसलिंग-प्रणाली ने बच्चों का भावनात्मक सहारा छीना है। कई संस्थान उपलब्धियों के दबाव में छात्रों को इंसान नहीं, बल्कि ‘रैंक’ की तरह देखने लगे हैं—जहाँ बच्चे अपने आप को गलतियों की जगह बोझ की तरह महसूस करने लगते हैं।

इसी के साथ माता-पिता की अनजानी—परंतु खतरनाक—अपेक्षाएँ भी बच्चों को मानसिक दवाब की खाई में धकेल देती हैं। घरों में ‘तू ही हमारा सपना है’, ‘फेल हुए तो क्या मुंह दिखाएँगे’ जैसी बातें बच्चों के मन में असफलता का ऐसा भय बनाती हैं कि वे संवाद के बजाय चुप्पी चुन लेते हैं। यह चुप्पी धीरे-धीरे अवसाद, भय, निराशा और अंततः आत्महत्या जैसे कठोर कदम तक पहुंच सकती है। कई बच्चों को लगता है कि वे अपने परिवार की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाए, इसलिए उनका जीवन बेकार है—और यही भावना सबसे घातक होती है।

इस पूरी त्रासदी में सच्चाई यह है कि दोष किसी एक का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम का है—स्कूल प्रशासन, कोचिंग संस्थानों, परिवारों और समाज के सामूहिक व्यवहार का। शिक्षा सिर्फ अंकों की दौड़ नहीं हो सकती और न ही बच्चों का भविष्य सिर्फ एक परिणाम की मोहताज। स्कूलों में मजबूत काउंसलिंग-सिस्टम, भावनात्मक शिक्षा, तनाव-मुक्त वातावरण और छात्रों के साथ मानवीय व्यवहार अनिवार्य होना चाहिए। वहीं परिवारों को यह समझना होगा कि बच्चे मशीन नहीं, भावनाओं से भरे इंसान हैं—जिन्हें सहयोग, संवाद और भरोसे की ज़रूरत है, न कि दबाव और तुलना की।

आज इन आंकड़ों ने भारत के सामने एक गंभीर प्रश्न रख दिया है—क्या हम अपने बच्चों को सफलता की सीढ़ी चढ़ा रहे हैं या उन्हें भावनात्मक रूप से तोड़ रहे हैं? यह समय है बदलने का, नहीं तो आने वाले वर्षों में इन 1,34,735 आत्महत्याओं से भी ज्यादा डरावने आंकड़े हमारा इंतजार कर रहे होंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *