अखलाक अहमद | नई दिल्ली 21 नवंबर 2025
देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई ने एक अहम कार्यक्रम के दौरान धार्मिक मान्यताओं और व्यक्तिगत आस्था पर ऐसा बयान दिया है, जिसने पूरे देश में व्यापक चर्चा छेड़ दी है। अपने संबोधन में उन्होंने साफ कहा कि वे बौद्ध धर्म का पालन करते हैं, लेकिन इसके साथ-साथ सभी धर्मों का सम्मान करते हैं और भारत की बहुसांस्कृतिक, बहुधार्मिक विरासत को अपनी सोच की मूल प्रेरणा बताया। ऐसे समय में जब धार्मिक ध्रुवीकरण देशभर में राजनीतिक और सामाजिक वातावरण को प्रभावित कर रहा है, मुख्य न्यायाधीश का यह संतुलित और संवैधानिक दृष्टिकोण एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।
CJI गवई ने यह भी रेखांकित किया कि भारत का संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है—यह न केवल किसी धर्म को मानने की आज़ादी है, बल्कि दूसरे धर्मों के अनुयायियों के प्रति सम्मान और सहिष्णुता का संदेश भी है। उन्होंने कहा कि उनका व्यक्तिगत झुकाव बौद्ध शिक्षाओं और आंबेडकरवाद से प्रेरित है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे किसी अन्य धर्म को कमतर मानते हैं। उन्होंने कहा कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में विविधता ही हमारी सबसे बड़ी पहचान और शक्ति है।
इस संदर्भ में गवई ने इतिहास और समाज दोनों की ओर इशारा करते हुए कहा कि भारत की सभ्यता सदियों से अनेक धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों को अपने भीतर समेटती आई है। यहां आस्था को लेकर मतभेद तो हो सकते हैं, लेकिन मनुष्यता और सह-अस्तित्व की भावना हमेशा उससे ऊपर रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायपालिका भी इन्हीं संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध है—न्याय बिना किसी भेदभाव के, समानता और निष्पक्षता के सिद्धांतों पर आधारित रहेगा।
उन्होंने यह भी कहा कि धर्म का उद्देश्य मनुष्यों को जोड़ना है, अलग करना नहीं। आधुनिक समय में धार्मिक पहचान को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने के बढ़ते चलन पर उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से चिंता भी जताई। उनका कहना था कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में धार्मिक विविधता को सम्मान के साथ संभालना आवश्यक है, और भारत इस उदाहरण का सबसे मजबूत केंद्र है। उन्होंने भारत की न्यायिक परंपरा को भी ऐसी ही समावेशी सोच का वाहक बताया।
मुख्य न्यायाधीश का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में धर्म आधारित बहसें बढ़ रही हैं और कई बार सामाजिक सौहार्द को चुनौती मिलती दिखाई देती है। उनकी ओर से दिया गया यह संदेश केवल व्यक्तिगत आस्था का इज़हार नहीं, बल्कि उन संवैधानिक आदर्शों की पुनर्पुष्टि है, जिन पर भारत की एकता और लोकतंत्र की नींव टिकी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की विविधता को स्वीकारना और सम्मान देना ही राष्ट्रीय चरित्र की पहचान है—और यह जिम्मेदारी हर नागरिक की है, चाहे वह सामान्य व्यक्ति हो या देश का मुख्य न्यायाधीश।




