Home » National » पाखंडी बाबा की पदयात्रा: प्रशासन बंधक, अपराधी फ्रंटलाइन—सरकारी नाकामी का सबसे गंदा खेल बेनकाब

पाखंडी बाबा की पदयात्रा: प्रशासन बंधक, अपराधी फ्रंटलाइन—सरकारी नाकामी का सबसे गंदा खेल बेनकाब

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

रवि शंकर, नई दिल्ली | 19 नवंबर 2025

देश इस समय आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक आपातकाल के सबसे भयावह दौर से गुजर रहा है। महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है, बेरोजगारी ने युवाओं के भविष्य को कुतर दिया है, किसान बेमौत मरने को मजबूर हैं, उद्योग-धंधे ठप हैं, महिलाएँ पहले से ज्यादा असुरक्षित हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था तेजी से टूट रही है। लेकिन इन गंभीर राष्ट्रीय संकटों पर सरकार की चुप्पी और निष्क्रियता हैरान करने वाली है। लोगों की बुनियादी समस्याओं पर ध्यान देने की बजाय केंद्र और राज्य सरकारें एक पाखंडी बाबा की साम्प्रदायिक पदयात्रा को ‘ऐतिहासिक सफलता’ बताते हुए अपने पूरे सरकारी तंत्र को इस नौटंकी में झोंक रही हैं, मानो यह यात्रा देश की समस्याओं का समाधान हो। प्रशासन और पुलिस से लेकर ट्रैफिक विभाग तक को बाबा के नौकरों की तरह खड़ा कर दिया गया है। सड़कों पर भारी जाम, एम्बुलेंसों का फँसना, बच्चों को स्कूल पहुँचने में कठिनाई, अस्पतालों तक पहुँचने में अवरोध—यह सब 21वीं सदी के लोकतांत्रिक भारत के चेहरे पर करारा तमाचा है।

सरकारी आंकड़े खुद सरकार की पोल खोल रहे हैं। अगस्त 2025 में बेरोजगारी 5.1% पर, जबकि युवा बेरोजगारी 15% के आसपास है। खुदरा महंगाई जून 2025 में भले 2.1% बताई गई, लेकिन खाद्य वस्तुओं की कीमतें ग्रामीण परिवारों की कमर तोड़ रही हैं। किसानों की औसत आय वृद्धि 3–4% पर सिमटी है और जीडीपी चाहे 7.8% क्यों न दर्ज हो, जमीनी हकीकत यह है कि ग्रामीण और औद्योगिक क्षेत्रों में रोजगार का संकट गहराता जा रहा है। ऐसे समय में सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए बागेश्वर धाम के धीरेंद्र शास्त्री उर्फ़ ‘पाखंडी बाबा’ की दिल्ली-वृंदावन पदयात्रा को सुपरहिट बनाने में संसाधन झोंक रही है। पुलिस बैरिकेडिंग से लेकर सड़क ब्लॉक, प्रशासनिक अधिकारियों की ड्यूटी से लेकर सरकारी वाहनों का दुरुपयोग—सब कुछ बाबा की यात्रा को सफल दिखाने के लिए हो रहा है, जबकि जनता की असली समस्याएँ अनदेखी की जा रही हैं।

मजदूर मोर्चा की रिपोर्ट बताती है कि कई एम्बुलेंसें घंटों जाम में अटकी रहीं, छात्रों की बसें रूट डायवर्ट होने से हजारों बच्चे स्कूल नहीं पहुँच सके, मरीज इलाज के बिना तड़पते रहे और अधिकारी बाबा की सभा में भीड़ जुटाने, वीडियो बनाने और सोशल मीडिया कैंपेन चलाने में व्यस्त रहे। यह पूरा तंत्र इतना दयनीय दिख रहा है कि समझ नहीं आता देश प्रशासन चला रहा है या किसी बाबा की PR एजेंसी।

इस पदयात्रा का सबसे गंदा, शर्मनाक और खतरनाक पहलू यह है कि इसे प्रचारित करने के लिए ऐसे चेहरे आगे किए जा रहे हैं जिनकी फाइलें अदालतों, पुलिस और ईडी में धूल खा रही हैं। यह यात्रा एक तरह से ‘क्रिमिनल वॉशिंग मशीन’ में बदल गई है, जिसमें अपराधी अपनी छवि को भक्तिभाव के साबुन से धोने की कोशिश कर रहे हैं, और सरकार उन्हें मंच देकर यह संदेश दे रही है कि कानून से बड़ा धर्म का चोगा है और पाखंड का मंच उन्हें पवित्रता का प्रमाणपत्र दे देगा।

सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों में राज कुंद्रा—जो पॉर्नोग्राफिक कंटेंट बनाने के आरोपों और 1.2 मिलियन डॉलर की डील वाले मनी लॉन्ड्रिंग केस में घिरे हैं—बाबा के साथ दिख रहे हैं। उनकी पत्नी शिल्पा शेट्टी—जिन पर 60 करोड़ की धोखाधड़ी में पूछताछ हुई—अचानक ‘धर्मपरायण’ छवि में घूम रही हैं। शिखर धवन, जिनकी 11 करोड़ से अधिक की संपत्ति अवैध बेटिंग ऐप केस में अटैच की गई, और राजपाल यादव, जो चेक बाउंस के मामलों में जेल काट चुके हैं—सभी ‘भक्त’ बनकर अपनी छवि के धब्बे धोने निकले हैं। यह दृश्य सिर्फ घिनौना ही नहीं, बल्कि प्रशासन की नैतिक पतन का प्रमाण है।

इन दागी चेहरों की मौजूदगी बताती है कि पदयात्रा धार्मिक नहीं, बल्कि एक राजनीतिक-आर्थिक प्रोजेक्ट है, जिसका उद्देश्य है—

  • सरकार की विफलताओं से जनता का ध्यान हटाना
  • हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडा को हवा देना
  • अपराधियों की छवि सुधारना
  • धार्मिक तमाशे के सहारे राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ाना

देश में 2025 में किसानों की आत्महत्याएँ 20% बढ़ी हैं, महिलाओं के खिलाफ अपराधों में 10% वृद्धि हुई है। उद्योग—जो लाखों नौकरियाँ पैदा कर सकते थे—मंदी में डूबे हैं। युवाओं का भविष्य बेरोजगारी के अंधकार में जा रहा है। लेकिन सरकार इन असली मुद्दों पर ज़ीरो एक्शन लेकर बस धार्मिक PR और भीड़भाड़ वाली पदयात्राओं में व्यस्त है। एक्स (पूर्व ट्विटर) पर जनता सीधे लिख रही है—

“पाखंडी बाबा बेरोजगारी, बलात्कार, भ्रष्टाचार के खिलाफ कब पदयात्रा निकालेंगे?”

सच्चाई साफ है—

यह पदयात्रा धार्मिक नहीं, लोकतंत्र पर हमला है।

यह तीर्थ यात्रा नहीं, सरकारी नाकामी का महोत्सव है।

यह सनातन की एकता नहीं, अपराधियों की धुलाई है।

यह सामाजिक सुधार नहीं, राजनीतिक नौटंकी है।

जब सरकार लोगों की ज़रूरतों—रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा—को छोड़कर पाखंडी बाबाओं और दागी सेलेब्रिटियों के पीछे भागने लगे, तब लोकतंत्र सर्कस में बदल जाता है और राज्य जनता का सेवक नहीं, बल्कि धार्मिक बाज़ारू तमाशे का मैनेजर बन जाता है।

और यही आज भारत की सबसे बड़ी त्रासदी है—

असली मुद्दे मर रहे हैं, नौटंकी फल-फूल रही है।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments