संजीव कुमार | नई दिल्ली 16 नवंबर 2025
भारतीय क्रिकेट के आधुनिक इतिहास में विराट कोहली सिर्फ एक सफल कप्तान नहीं, बल्कि खिलाड़ी-संरक्षण और संसाधन-प्रबंधन के उस्ताद भी माने जाते हैं। उनकी कप्तानी का एक कम चर्चित लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू था—तेज गेंदबाजों, खासकर जसप्रीत बुमराह को गैर-ज़रूरी थकान से बचाना। विराट ने बार-बार बुमराह से कहा—“जाओ, अपने शरीर को आराम दो।” यह वह सोच थी जिसने भारतीय क्रिकेट को पहली बार एक ऐसे दौर में प्रवेश कराया, जहाँ तेज़ गेंदबाज सिर्फ बलि का बकरा नहीं, बल्कि रणनीति के केंद्रबिंदु बने। विराट समझते थे कि बुमराह की असाधारण एक्शन और लंबी चोट के खतरे के बीच उनका हर ओवर सोने से भी कीमती है। इसी वजह से होम टेस्ट मैचों में विराट ने कभी भी बुमराह पर अनावश्यक बोझ नहीं डाला। उन्होंने ईशांत शर्मा, उमेश यादव और मोहम्मद शमी के त्रिकोण को लगातार रोटेशन में इस्तेमाल किया—और परिणाम यह हुआ कि घर में आठ लंबे वर्षों में भारत सिर्फ दो टेस्ट मैच हारा। यह आँकड़ा सिर्फ जीत का नहीं, विराट की रणनीतिक प्रतिभा और संसाधन-प्रबंधन की शक्ति का प्रतीक है।
विराट के बाद वही टीम, वही गेंदबाज़—फिर घर में इतनी हार क्यों? जवाब बुमराह की गलत मैनेजमेंट में छिपा है
विराट कोहली की कप्तानी समाप्त होने के बाद यही कहानी उलटती दिखाई देती है। महज़ तीन वर्षों में भारत पाँच घरेलू टेस्ट मैच हार चुका है—वह भी तब, जब बुमराह को घर पर लगातार खेलने के लिए मजबूर किया गया। यह वही बुमराह हैं जिन्हें विराट ने बड़े ध्यान से SENA (South Africa, England, New Zealand, Australia) दौरों के लिए बचाकर रखा था। विराट की रणनीति यह थी कि घरेलू पिचों पर जहाँ स्पिनर खेल का केंद्र होते हैं, वहाँ बुमराह की ऊर्जा बर्बाद करना समझदारी नहीं होगी। लेकिन कोहली के बाद बुमराह का ऐसा इस्तेमाल हुआ जैसे वह हर मैच में जीत का सिर्फ एक ही रास्ता हों—परिणाम ये हुआ कि न बुमराह पहले जितने ताज़ा नज़र आए और न टीम की घरेलू प्रदर्शन–स्थिरता वैसी रही, जैसी कोहली के दौर में थी। भारतीय क्रिकेट के इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ कि सबसे कीमती तेज गेंदबाज़ की ‘यूज़ेज़ स्ट्रैटेजी’ ही टीम की कमजोरी बन गई।
SENA में बुमराह को बचाकर रखने की विराट की नीति ने दिए भारत को ऐतिहासिक पल—जिन्हें आज भी क्रिकेट प्रेमी याद करते हैं
विराट कोहली का कप्तानी करियर एक बात पर हमेशा गर्व से याद किया जाएगा—विदेशों में भारत की तेज गेंदबाज़ी को अजेय बनाना। और इसमें बुमराह वह ब्रह्मास्त्र थे, जिनका इस्तेमाल विराट ने सटीक समय पर किया। SENA देशों की तेज़, उछालभरी और चुनौतीपूर्ण पिचों पर विराट का पूरा भरोसा बुमराह पर था—और बुमराह ने भी इस भरोसे को ऐतिहासिक जीतों में बदल दिया। इंग्लैंड में नॉटिंघम जीत, ऑस्ट्रेलिया में एडिलेड- मेलबर्न में भारत की प्रचंड जीतें, और दक्षिण अफ्रीका में बेहतरीन स्पेल—ये सभी उन टेस्ट मैचों की गाथाएँ हैं जहाँ विराट की दूरदर्शिता और बुमराह की कार्य क्षमता ने मिलकर भारतीय क्रिकेट को विदेशी धरती पर नया आत्मविश्वास दिया। यह वही समीकरण था—कोहली captain, बुमराह weapon—जिसने भारत को वह प्रतिष्ठा दी जिसके लिए पिछले कई दशकों तक भारतीय टीमें तरसती रहीं।
विराट की कप्तानी केवल आक्रामकता नहीं—वैज्ञानिक, रणनीतिक और खिलाड़ी-हितैषी सोच का सर्वोत्तम उदाहरण थी
आज जब हम इन आंकड़ों की तुलना करते हैं—विराट के 8 साल में घरेलू टेस्ट में सिर्फ 2 हार, और उनके बाद 3 साल में 5 हार—तो यह साफ़ समझ आता है कि कप्तानी सिर्फ मैदान पर फैसले लेने का नाम नहीं है। विराट ने अपनी टीम, खासकर अपने तेज गेंदबाजों का उपयोग एक वैज्ञानिक और संतुलित दृष्टिकोण से किया। वह जानते थे कि बुमराह जैसे गेंदबाज़ हर दिन नहीं बनते, और उन्हें ऐसे ही लगातार खपाना टीम के दीर्घकालिक हित के विरुद्ध है। इसलिए उन्होंने बुमराह को वहाँ इस्तेमाल किया, जहाँ वह भारत की दिशा बदल सकते थे—और ऐसा उन्होंने बार-बार किया। विराट की यही रणनीतिक दूरदर्शिता भारतीय क्रिकेट इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगी।




