उन्नीस वर्ष की नाजुक आयु में भी करतार सिंह सराभा वह नाम बन गए, जिसकी चमक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आकाश में आज भी एक धूमकेतु की तरह दिखाई देती है। उनका जीवन छोटा था, लेकिन उसके भीतर जो आग, जो जोश और जो त्याग समाया हुआ था, वह युगों तक फैलने वाली ऊर्जा बन गया। वह वह नौजवान थे जिसने अपने भीतर आज़ादी की ऐसी लौ जलाई, जिसने न केवल उनके आसपास के लोगों को झकझोरा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी क्रांतिकारी चेतना का मार्ग दिखाया। जिस उम्र में युवा दुनिया को समझना शुरू करते हैं, उस उम्र में उन्होंने दुनिया को बदलने का संकल्प ले लिया था।
सरदार भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारी भी करतार सिंह को अपना गुरु, मार्गदर्शक और साथी मानते थे। उनके बारे में भगत सिंह का कहना—“यह मेरा गुरु, साथी और भाई है”—सिर्फ एक प्रशंसा नहीं, बल्कि उस गहरी प्रेरणा का प्रमाण था जो सराभा ने भगत सिंह जैसे तेजस्वी व्यक्तित्व पर भी छोड़ी। भगत सिंह अपनी जेब में सराभा की तस्वीर रखते थे, जैसे कोई साधक अपने ईश्वर की आराधना करता है। यह संबंध दो क्रांतिकारियों का नहीं, बल्कि दो आत्माओं का मिलन था—जो दोनों मातृभूमि के लिए जीवित थे और उसी के लिए प्राण देने को तत्पर।
करतार सिंह का देशप्रेम कोई अचानक पैदा हुआ भाव नहीं था, बल्कि उनके अध्ययनकाल में ही उनके मन में राष्ट्रभक्ति का वह बीज अंकुरित हो चुका था। पंजाब के इस सादगीभरे युवक के भीतर धीरे-धीरे यह भावना परिपक्व होती गई और जब वे पढ़ाई के लिए अमेरिका पहुँचे, वहाँ यह बीज एक विशाल वृक्ष बनकर फूट पड़ा। अमेरिका में भारतीय मजदूरों, किसानों और प्रवासी समुदाय के बीच गूंज रहे ‘ग़दर’ आंदोलन का प्रभाव उनके हृदय पर गहरा पड़ा। ग़दर पार्टी का उद्देश्य स्पष्ट था—विदेश से क्रांति की चिनगारी जलाकर भारत में स्वतंत्रता का महाआंदोलन खड़ा करना। यह विचार करतार सिंह को अपनी आत्मा जैसा लगा।
‘ग़दर’ की गतिविधियों में वे न केवल शामिल हुए, उनमें सबसे युवा, सबसे तेज, सबसे ऊर्जावान चेहरे के रूप में उभरे। उनकी लेखनी और वक्तृत्व में ऐसी क्रांतिकारी अग्नि थी जो प्रवासियों में जोश भर देती थी। लेकिन करतार सिंह का सपना सिर्फ विदेश में बैठकर आंदोलन चलाने का नहीं था—वह पंजाब की मिट्टी में लौटकर, अपने गांव-देहात के नौजवानों को प्रेरित करके, भारत भूमि पर ही क्रांति की मशाल जलाना चाहते थे। इसलिए वे ग़दर पार्टी के संदेश और योजना को लेकर भारत लौट आए, और यहां भी उसी उत्साह से स्वतंत्रता की लड़ाई को गति देने लगे।
लेकिन इतिहास के पन्ने हमेशा वीरों के साथ न्याय नहीं करते। ग़दर की वह खूबसूरत कोशिश ग़द्दारी की साज़िश की भेंट चढ़ गई। कुछ अंदरूनी मुखबिरों ने अंग्रेज़ों को ग़दर पार्टी के योजनाओं की खबर दे दी। जैसे ही करतार सिंह पंजाब लौटे, अंग्रेजी हुकूमत उनके पीछे पड़ गई और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद उन पर मुक़दमा चलाया गया—लेकिन वह मुक़दमा न्याय से अधिक एक औपचारिकता था। अंग्रेज़ों ने पहले ही उनका भाग्य तय कर लिया था।
आज ही के दिन, उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया। उन्नीस वर्ष की आयु में, मुस्कराते हुए, बिना किसी भय के, मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण अर्पित कर दिए। जिस उम्र में जीवन शुरू होता है, उस उम्र में उन्होंने बलिदान को जीवन का उद्देश्य बना लिया।
करतार सिंह सराभा की शहादत सिर्फ इतिहास का एक प्रसंग नहीं, बल्कि भारतीय युवाओं के लिए एक अनन्त प्रेरणा है—कि देश के लिए समर्पण आयु नहीं देखता, परिस्थितियों की प्रतीक्षा नहीं करता, और त्याग हमेशा अमर रहता है। उनका संघर्ष, उनका आदर्श और उनकी अदम्य राष्ट्रभक्ति यह संदेश देती है कि आज़ादी की राह कभी आसान नहीं होती, लेकिन वह हर उस कदम से पवित्र हो जाती है जो मातृभूमि के लिए उठाया जाता है। इंकलाब जिंदाबाद!




