अंतरराष्ट्रीय डेस्क 16 नवंबर 2025
दुनिया भर में जब देश जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए तेज़ कदम उठाने की माँग कर रहे हैं, उसी समय सऊदी अरब एक ऐसे देश के रूप में सामने आया है जिसे विशेषज्ञ वैश्विक जलवायु कार्रवाई का सबसे बड़ा अवरोधक मान रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, देश की प्रमुख तेल कंपनी अरामको की कमाई इतनी विशाल है कि वह लगभग $170,000 प्रति मिनट की दर से पैसा बनाती है—और यही आर्थिक शक्ति अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में उसका सबसे बड़ा हथियार बन गई है। सऊदी अरब इस प्रभाव का इस्तेमाल वैश्विक जलवायु समझौतों की प्रक्रिया को धीमा करने और कई फैसलों को रोकने में करता है।
अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में अक्सर फैसले “सहमति आधारित” प्रणाली से लिए जाते हैं। यानी कोई एक देश भी रोक लगा दे, तो पूरा प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ता। सऊदी अरब इसी प्रक्रिया का फायदा उठाकर उन नीतियों का विरोध करता है जिनका लक्ष्य दुनिया को तेल पर निर्भरता से बाहर निकालना होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह रणनीति तीन हिस्सों में बँटी है—ऊर्जा संक्रमण को धीमा रखना, घरेलू तौर पर “ग्रीन इमेज” पेश करना ताकि आलोचना कम हो, और भविष्य में होने वाले हरित परिवर्तन से पहले जितना संभव हो सके उतना तेल बेचना।
दिलचस्प बात यह है कि सऊदी अरब अपने देश के भीतर अक्षय ऊर्जा को तेज़ी से बढ़ा रहा है। 2030 तक वह अपनी आधी बिजली सौर और पवन ऊर्जा से बनाने का लक्ष्य रखता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसका रुख इसके बिल्कुल उलट है। देश का लक्ष्य अपनी घरेलू खपत कम करके और अधिक तेल निर्यात करना है, ताकि उसकी अर्थव्यवस्था लंबे समय तक तेल पर आधारित रह सके। यही विरोधाभास उसे दुनिया भर में आलोचना का केंद्र बनाता है।
सऊदी अरब खुद भी जलवायु संकट से गहराई से प्रभावित हो रहा है। पिछले 40 वर्षों में वहाँ का औसत तापमान लगभग 2.2°C बढ़ चुका है—जो वैश्विक औसत से लगभग तीन गुना है। रियाद और मक्का जैसे क्षेत्रों में गर्मी पहले से कहीं अधिक खतरनाक स्तर तक पहुँच चुकी है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आने वाले समय में देश में गर्मी से होने वाली मौतें 13 से 63 गुना तक बढ़ सकती हैं। फिर भी, देश का अंतरराष्ट्रीय रुख बताता है कि उसकी प्राथमिकता तेल-आधारित अर्थव्यवस्था को बचाए रखना है।
यह स्थिति दुनिया के लिए एक बड़ा सवाल छोड़ती है—जब एक अकेला देश अपनी आर्थिक ताकत के कारण पूरी वैश्विक जलवायु कार्रवाई को रोक सकता है, तो क्या दुनिया समय पर जलवायु संकट से लड़ पाएगी? क्या वैश्विक नीतियाँ उन देशों की इच्छा पर निर्भर रहेंगी जिनकी कमाई तेल से जुड़ी है? और क्या ऐसी व्यवस्था जलवायु न्याय के अनुकूल है? इन सवालों का जवाब आने वाले वर्षों में तय करेगा कि दुनिया जलवायु संकट को कैसे और किस गति से संभाल पाएगी।




