बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों पर कांग्रेस सचिव और गुजरात के सह-प्रभारी बीवी श्रीनिवास ने ऐसा राजनीतिक विस्फोट किया है, जिसने राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य को हिलाकर रख दिया है। श्रीनिवास ने आरोप लगाया कि बिहार का चुनाव न तो निष्पक्ष था, न पारदर्शी, और न लोकतांत्रिक मूल्यों की न्यूनतम कसौटी पर खरा उतरता था। उन्होंने इसे “एक संगठित, पूर्व-नियोजित और प्रबंधित ऑपरेशन” करार देते हुए कहा कि यह चुनाव जनता की आवाज़ को शक्तियों के गठजोड़ ने दबाने की एक बेशर्म सरकारी कोशिश थी। उनका कहना है कि इस चुनाव ने यह साफ कर दिया है कि भारत का लोकतंत्र अब एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, जहां सत्ता ने सिस्टम को हथियार में बदलकर जनादेश को रौंदने की कोशिश की है।
श्रीनिवास की तीखी टिप्पणी केवल चुनाव नतीजों तक सीमित नहीं रही; उन्होंने इसे भारतीय चुनावी व्यवस्था के “सबसे बड़े संस्थागत अपहरण” की शुरुआत बताया। उन्होंने कहा कि यह जंग किसी दल या नेता की नहीं, बल्कि हर उस नागरिक की है जो लोकतंत्र में विश्वास करता है। उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं से निराशा तोड़कर सड़कों पर उतरने, जनता से संवाद बढ़ाने और लोकतंत्र बचाने के लिए एक राष्ट्रव्यापी जनांदोलन खड़ा करने का आह्वान किया।
संगठित धांधली का पूरा ब्लूप्रिंट: वोटर सूची से लेकर स्ट्रॉन्ग रूम तक खेला गया खेल
बीवी श्रीनिवास का आरोप है कि इस चुनाव में सिर्फ हेरफेर नहीं हुई—बल्कि सिस्टम को योजनाबद्ध तरीके से हाईजैक किया गया। उन्होंने कहा कि:पहला और सबसे खतरनाक हमला वोटर सूची पर हुआ। उनके अनुसार, पूरे राज्य में 68 लाख वोटर डिलीट किए गए, जिनमें मुसलमानों, दलितों और पिछड़े वर्गों की बड़ी संख्या शामिल थी। इसके विपरीत, 22 लाख ‘अदृश्य/नकली’ वोटर जोड़े गए, जिनका कोई सामाजिक अस्तित्व नहीं है लेकिन जिनका राजनीतिक उपयोग तैयार किया गया था। यह पूरा ऑपरेशन “SIR सिस्टम” के तहत चलाया गया, जिसमें बूथ-दर-बूथ फर्जी वोटरों की संख्या को इस तरह बढ़ाया गया कि पिछली बार कम अंतर से हारी सीटों पर एक झटके में खेल पलट जाए।
दूसरा बड़ा हमला चुनाव आचार संहिता पर हुआ। श्रीनिवास ने कहा कि चुनाव से ठीक पहले 1.3 करोड़ महिलाओं के खातों में ₹10,000 डालना भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा “वोट खरीद अभियान” था, जिसे चुनाव आयोग ने न केवल रोका नहीं बल्कि अपनी चुप्पी से इसे वैधता प्रदान कर दी। उन्होंने कहा कि जब तमिलनाडु और राजस्थान में इसी तरह की योजनाएं रोकी जा सकती थीं तो बिहार में क्यों नहीं रोकी गईं? जवाब जनता जानना चाहती है, उन्होंने कहा।
तीसरा और सबसे खतरनाक अध्याय था चुनावी ‘सैन्यीकरण’। श्रीनिवास का दावा है कि सैकड़ों विशेष ट्रेनों के जरिए भाजपा कार्यकर्ताओं को अन्य राज्यों से बिहार भेजा गया, जिनका काम बूथ मैनेजमेंट, वोटिंग पैटर्न नियंत्रित करना और रणनीतिक तरीके से फर्जी मतदान करवाना था। उन्होंने कहा कि यह किसी चुनावी वर्कर का नहीं बल्कि “संगठित चुनावी आर्मी” का मॉडल था जिसने मतदान केंद्रों को जनतांत्रिक संस्थानों की जगह चुनावी किले में बदल दिया।
ECI पर सीधा हमला—“मुख्य चुनाव आयुक्त सत्ता का हिस्सा बन चुके हैं”
अपने सबसे ज़ोरदार बयान में श्रीनिवास ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की निष्पक्षता पर खुला सवाल उठाते हुए कहा कि जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक केंद्रीय गृह मंत्री के निजी सचिव की भूमिका में रह चुका हो, तो उससे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की उम्मीद करना राजनीतिक भोलेपन के अलावा कुछ नहीं है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग अब संविधान का प्रहरी नहीं रहा, बल्कि सत्ता के एजेंडे का संस्थागत विस्तार बन चुका है।
उन्होंने चेतावनी दी कि EVM मूवमेंट, स्ट्रॉन्ग रूम गतिविधियाँ और CCTV रिकॉर्डिंग वह सच छुपाती हैं जिसे सत्ता दबाना चाहती है—और यह सारी रिकॉर्डिंग 45 दिनों के भीतर नष्ट हो जाएगी। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की हत्या का सबसे बड़ा सबूत इसी समय-सीमा में दफन कर दिया जाएगा।
“यह लड़ाई राहुल गांधी की नहीं—हम सबकी है”
अपने भावनात्मक और दृढ़ संदेश के अंत में श्रीनिवास ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों और लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले हर नागरिक से एकजुट होने की अपील की। उन्होंने कहा “यह सिर्फ राहुल गांधी की लड़ाई नहीं है। यह लड़ाई हमारी है, आपकी है, हर उस हिंदुस्तानी की है जो संविधान में विश्वास करता है। लोकतंत्र अब सिर्फ भाषणों में नहीं बचेगा—इसे बचाना होगा, सड़क पर, जनता के बीच, संघर्ष के माध्यम से।” उन्होंने वादा किया कि वह अंतिम सांस तक इस जनांदोलन के साथ रहेंगे और लोकतंत्र की रक्षा को अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता का सर्वोच्च लक्ष्य बनाएंगे।




