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यूरिया संकट गहराया — मांग आसमान पर, उत्पादन पीछे, सरकार की बढ़ी चिंता

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नई दिल्ली 12 नवंबर 2025

देश में खेती-किसानी का मौसम अपने चरम पर है, लेकिन इसी बीच एक चिंताजनक तस्वीर उभरकर सामने आई है — भारत में यूरिया की मांग तेज़ी से बढ़ रही है, जबकि घरेलू उत्पादन उसकी रफ्तार पकड़ नहीं पा रहा है। यह असंतुलन अब खाद क्षेत्र के लिए गंभीर चुनौती बन गया है और सरकार को आयात बढ़ाने के सिवा कोई विकल्प नहीं दिख रहा। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर यही स्थिति जारी रही तो आने वाले महीनों में न केवल किसानों को यूरिया की कमी झेलनी पड़ेगी, बल्कि देश का कृषि बजट भी भारी दबाव में आ सकता है।

भारत में हर साल लगभग 3.4 करोड़ टन यूरिया की ज़रूरत होती है, जबकि देश की उत्पादन क्षमता केवल 2.6 करोड़ टन के आसपास है। यानी लगभग 80 लाख टन यूरिया हर साल विदेशों से मंगाना पड़ता है। यह अंतर सरकार के लिए लगातार सिरदर्द बनता जा रहा है। मौजूदा हालात में रूस-यूक्रेन युद्ध, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट और गैस की ऊंची कीमतों ने यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ा दी हैं, जिससे भारत का सब्सिडी बिल अब लगभग दो लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है।

सरकार ने आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए पिछले कुछ वर्षों में कई कदम उठाए हैं — नई यूरिया फैक्ट्रियों के पुनरुद्धार से लेकर नैनो यूरिया के प्रयोग तक — लेकिन ज़मीन पर इन योजनाओं का असर सीमित ही दिख रहा है। किसानों के लिए खाद की मांग लगातार बढ़ रही है क्योंकि जलवायु परिवर्तन और मिट्टी की घटती उर्वरता ने फसलों को अधिक नाइट्रोजन की ज़रूरतमंद बना दिया है। गेहूं, धान और मक्का जैसी फसलों की बुआई के दौरान यूरिया की खपत में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई है।

कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि भारत में पिछले पाँच सालों में यूरिया की खपत में लगभग 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जबकि घरेलू उत्पादन केवल 8–10 प्रतिशत तक ही बढ़ पाया है। अधिकारी के अनुसार, “किसानों को समय पर खाद मिले, इसके लिए सरकार हर संभव कदम उठा रही है, लेकिन यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें और बढ़ीं, तो सब्सिडी का बोझ काफी बढ़ जाएगा।”

रिपोर्टों के मुताबिक, भारत में प्रति हेक्टेयर यूरिया उपयोग अब वैश्विक औसत से कहीं अधिक है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रति हेक्टेयर 170 किलोग्राम से अधिक यूरिया का उपयोग हो रहा है, जबकि वैश्विक औसत करीब 130 किलोग्राम है। यह अत्यधिक उपयोग न केवल मिट्टी की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि पर्यावरण और भूजल प्रदूषण की समस्या को भी जन्म दे रहा है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि मिट्टी में नाइट्रोजन का असंतुलन दीर्घकाल में भूमि की स्थायी उर्वरता को प्रभावित कर रहा है।

सरकार ने इस चुनौती से निपटने के लिए ‘वन नेशन, वन फर्टिलाइज़र’ योजना लागू की है, जिसके तहत पूरे देश में यूरिया को “भारत यूरिया” ब्रांड नाम से बेचा जा रहा है। इसके साथ-साथ नैनो यूरिया को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसे भारतीय किसान उर्वरक सहकारी (IFFCO) ने विकसित किया है। दावा है कि नैनो यूरिया पारंपरिक यूरिया की तुलना में दस गुना प्रभावी है और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचाता। हालांकि, छोटे किसानों में अभी भी इसके उपयोग को लेकर संशय बना हुआ है, क्योंकि उन्हें इसके प्रभाव और परिणामों पर भरोसा नहीं हो पा रहा।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यूरिया संकट भारत की कृषि अर्थव्यवस्था और राजकोषीय अनुशासन दोनों पर भारी असर डाल सकता है। इस वर्ष अकेले यूरिया सब्सिडी पर सरकार को लगभग 1.75 लाख करोड़ रुपये का खर्च उठाना पड़ा है — जो रक्षा और शिक्षा मंत्रालय के कुल बजट के बराबर है। यही वजह है कि केंद्र सरकार अब ग्रीन अमोनिया और ग्रीन यूरिया परियोजनाओं पर काम कर रही है, ताकि 2030 तक उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल की जा सके।

खास तौर पर बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हरियाणा जैसे कृषि प्रधान राज्यों में स्थिति और गंभीर है। इन राज्यों में हर फसल सीज़न के दौरान यूरिया की लंबी कतारें और कालाबाज़ारी आम बात बन चुकी है। कई जगहों पर किसान खुदरा विक्रेताओं पर ओवरप्राइसिंग के आरोप लगा रहे हैं, जबकि अधिकारी बार-बार यह दावा कर रहे हैं कि पर्याप्त स्टॉक मौजूद है।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अब भारत को सिर्फ़ “ज्यादा उत्पादन” पर नहीं, बल्कि “स्मार्ट उपयोग” पर ध्यान देना होगा। इसके लिए मिट्टी परीक्षण, डिजिटल फर्टिलाइज़र वितरण, और फसल-आधारित खपत मॉनिटरिंग को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। वे चेतावनी देते हैं कि यदि नीतिगत सुधार समय पर नहीं हुए, तो भविष्य में यूरिया संकट तेल संकट की तरह राष्ट्रीय स्तर का आर्थिक झटका बन सकता है।

इस समय भारत के सामने दोहरी चुनौती है — एक तरफ किसानों को समय पर सस्ती खाद मुहैया कराना, और दूसरी तरफ इस बढ़ती मांग के बीच मिट्टी की सेहत और पर्यावरण को संतुलित रखना। बढ़ती जनसंख्या और बदलते मौसम चक्र के बीच अब यह सवाल और गहराता जा रहा है कि क्या भारत यूरिया उत्पादन में आत्मनिर्भर बन पाएगा या आने वाले वर्षों में खाद भी पेट्रोल की तरह “रणनीतिक चिंता” का कारण बन जाएगी।

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