कोलकाता 6 नवंबर 2025
बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन मीडिया रिपोर्टों को कड़े शब्दों में खारिज कर दिया है, जिनमें दावा किया गया था कि उन्हें खुद BLO (Booth Level Officer) द्वारा SIR एन्यूमरेशन फ़ॉर्म — यानी “Summary Revision of Electoral Rolls” के तहत जारी दस्तावेज़ — सीधे उनके निवास पर पहुँचाए गए। The Hindu के अनुसार, ममता ने इसे पूरी तरह फर्जी खबर बताते हुए कहा कि उन्हें इस तरह का कोई फ़ॉर्म कभी प्रदान नहीं किया गया। उन्होंने साफ किया कि यह दावे राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित हैं और जनता को भ्रमित करने का प्रयास है। कलकत्ता में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ममता ने मीडिया को चेतावनी भरे लहजे में कहा — “बिना प्रमाण के खबर न चलाएँ। मैं मुख्यमंत्री हूँ, कोई सामान्य मतदाता नहीं कि मेरे दरवाज़े पर कोई भी आकर फ़ॉर्म थमा देगा।”
ममता ने सवाल उठाया कि आखिर अचानक इस तरह की अफवाहें कौन और किस मकसद से फैला रहा है? उनका आरोप है कि केंद्र सरकार और भाजपा SIR प्रक्रिया का दुरुपयोग कर मतदाता सूची में भारी पैमाने पर छेड़छाड़ कर रही है, और इस मुद्दे पर उनकी आक्रामकता को कमजोर दिखाने के लिए इस तरह की अफवाहें फैलाई जा रही हैं। उन्होंने दोहराया कि यह SIR प्रक्रिया “छुपे एजेंडे वाला चुनावी हथकंडा” है, जिसके जरिए बंगाल के लाखों मतदाताओं का नाम काटे जाने और कुछ संदिग्ध प्रविष्टियाँ जोड़े जाने की आशंका व्यक्त की जा रही है। उनका कहना है कि वोटरलिस्ट की यह नई कवायद पूरी तरह असंतुलित और लोकतंत्र के खिलाफ है, और यदि राज्य सरकार व नागरिक जागरूक नहीं रहे तो चुनाव पूरी तरह एकतरफा कर दिए जाएंगे।
यह विवाद ऐसे समय में फूटा है जब बंगाल में SIR के खिलाफ पहले ही राजनीतिक टकराव चल रहा है। तृणमूल कांग्रेस लगातार आरोप लगा रही है कि केंद्र सरकार चुनावी प्रबंधन की आड़ में एक “निगरानी और पहचान नियंत्रण” सिस्टम लागू करना चाहती है, जिससे विपक्षी मतदाताओं को टारगेट किया जा सके। BLO द्वारा सीधे मुख्यमंत्री तक पहुँचने जैसे दावों ने इस आरोप को और विवादित बना दिया है। ममता ने कहा कि यदि कभी कोई BLO उनका सत्यापन करने आए भी, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा होगा — लेकिन आज की तारीख तक कोई ऐसी घटना हुई ही नहीं, और मीडिया भ्रम फैलाकर भाजपा के झूठ को मंच दे रहा है। उन्होंने मीडिया से अपील की कि वह ऐसे दावों की पहले जांच करे, फिर खबर चलाए।
TMC नेताओं का कहना है कि यह मामला केवल ममता बनर्जी से जुड़ा नहीं है, बल्कि पूरे राज्य के मतदाताओं के अधिकार खतरे में हैं। विपक्षी दल दावा कर रहे हैं कि ममता इस मुद्दे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही हैं ताकि केंद्र की किसी भी जनसांख्यिकी या मतदाता सत्यापन पहल का विरोध किया जा सके। लेकिन ममता यह तर्क देती हैं कि जब तक पारदर्शिता और निष्पक्षता की गारंटी नहीं, तब तक इस तरह की प्रक्रिया को अंधविश्वास के साथ स्वीकार करना लोकतंत्र के लिए आत्मघाती होगा। सुप्रीम कोर्ट में भी चुनावी प्रक्रियाओं और मताधिकार की स्वतंत्रता पर चल रही बहस ने इस विवाद को और संवेदनशील बना दिया है।
इस सबके बीच यह साफ हो चुका है कि SIR के बहाने बंगाल में चुनावी राजनीति की गर्मी धीमी पड़ने वाली नहीं। मुख्यमंत्री का यह बयान जहां अपने समर्थन आधार को मजबूत करने का प्रयास माना जा रहा है, वहीं केंद्र के लिए यह संदेश है कि बंगाल में कोई भी चुनावी बदलाव बिना राजनीतिक confrontation के आसान नहीं होगा। अब गेंद चुनाव आयोग और केंद्र सरकार के पाले में है — उन्हें यह साबित करना होगा कि SIR जनहित में है, न कि सत्ता की रणनीति का नया हथियार।




