दैनिक भास्कर की इन्वेस्टिगेशन टीम की एक गंभीर और साहसी अंडरकवर रिपोर्ट ने बिहार चुनाव और राजनीतिक सत्ता के बीच मौजूद गंदे गठजोड़ की पोल खोलने का दावा किया है। यह मामला पटना से जुड़ा है, और रिपोर्ट के केंद्र में हैं — बीजेपी की झारखंड अनुसूचित जाति मोर्चा की प्रदेश मंत्री फूल जोशी, जो कथित तौर पर एक ऐसे नेटवर्क का हिस्सा बताई गई हैं जो हाई-प्रोफाइल नेताओं के “टेस्ट” के मुताबिक लड़कियाँ सप्लाई करने की बात स्वीकारते हुए कैमरे में कैद हुई हैं। यह आरोप केवल किसी व्यक्ति विशेष के चरित्र का नहीं — बल्कि एक ऐसी राजनीतिक सच्चाई का पर्दाफाश है जो बताती है कि सत्ता के गलियारे किस हद तक सड़ चुके हैं। वीडियो में फूल जोशी खुद यह कहती सुनी गईं कि नेता “ग्लैमर वाली लड़कियाँ” चाहते हैं — कोई “सिंगल एंजॉय” पसंद करता है तो कोई “डबल”। और कुछ नेता तो सिर्फ साथ चाहते हैं, सेक्स नहीं, पर दिखावा चाहते हैं — ताकि उनकी “इमेज” बनी रहे। यह सब सुनने भर से लोकतंत्र की पवित्रता शर्मसार हो जाती है।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि फूल जोशी गर्व से बताती हैं कि वे इस नेटवर्क में ऊँचे स्तर पर जुड़ी हुई हैं — “हर पार्टी में हमारे लोग हैं”, “सबको पता है पर कोई पूछने की हिम्मत नहीं करता” — ये वाक्य राजनीतिक व्यवस्था के भीतर छिपे उस भयावह साम्राज्य को उजागर करते हैं जहाँ महिलाओं का व्यापार चुनावी रणनीति का हिस्सा बन चुका है। यह कोई आकस्मिक घटना या व्यक्तिगत दुराचरण नहीं — बल्कि सत्ता और शोषण का गठबंधन है, जिसने चुनाव को “जनादेश” की जगह “गर्ल्स सप्लाई सर्विस” के हिसाब से परिभाषित कर दिया है। वीडियो में यह भी कहा गया है कि केंद्रीय नेतृत्व ने बड़ी जिम्मेदारी दी है, जिससे “काम आसान” हो जाएगा — यह संकेत कितना गहरा और खतरनाक है, इसे समझने के लिए किसी सबूत की जरूरत नहीं, बल्कि संवेदना की जरूरत है।
इस रिपोर्ट के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठता है — क्या बिहार की राजनीति वास्तव में समाज सेवा और विकास की जगह ऐश और शरीर आधारित सौदों के दम पर जीतने का प्रयास कर रही है? क्या ऐसे नेता जो रात में “डबल एंजॉय” और “ग्लैमर टेस्ट” पूरे करते हैं, सुबह मंचों से “नैतिकता और संस्कृति” का भाषण दे सकते हैं? जो महिलाएँ राजनीति में सशक्तिकरण के प्रतीक बनकर आने वाली थीं — क्या उन्हें ही यहाँ उपकरण बना दिया गया है? इस स्टिंग में एक महिला खुद उन महिलाओं का शोषण करती दिखती हैं — यह विडंबना राजनीतिक संस्कारों की सबसे विकृत तस्वीर पेश करती है।
भास्कर की इन्वेस्टिगेशन यह भी स्थापित करती है कि यह नेटवर्क सत्ता के अंदर से सुरक्षित है। रिपोर्ट के अनुसार, फूल जोशी का दावा है कि विधायकों को सब पता है पर मौन हैं। यहाँ लोकतंत्र के वास्तविक खतरों की पहचान होती है — जब चुने हुए प्रतिनिधि भ्रष्टाचार पर चुप्पी साध लें, तो उनका मौन भी अपराध बन जाता है। जनता की रक्षा तो दूर — जनता का भरोसा ही सबसे बड़ा शिकार बन जाता है। क्योंकि जिन्हें नैतिकता का प्रहरी बनना था, वे खुद इस गंदे खेल के संरक्षक बन चुके हैं। ऐसे में अगर चुनाव आयोग, पुलिस या पार्टी नेतृत्व इस मामले पर तुरंत कार्रवाई नहीं करता, तो यह संदेह और प्रबल होगा कि राजनैतिक व्यवस्था केवल दिखावटी है — भीतर से यह शक्ति और शारीरिक शोषण की घिनौनी प्रयोगशाला है।
यह रिपोर्ट न केवल खुलासा है — यह चेतावनी है कि लोकतंत्र का पतन तब शुरू होता है जब सत्ता और अपराध एक-दूसरे का सहारा बन जाते हैं। और अगर आज यह गंदा खेल पकड़ में आया है, तो यह पत्रकारिता की जीत है। जनता को जानने का अधिकार है — और पत्रकारिता का धर्म उसे उजागर करना है।




