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जनादेश चोरी है, तो सत्ता भी चोरी है — यह भारत बनाम वोट-चोरों की लड़ाई है

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जब सत्ता चुराई जाती है — तो वह किसी एक नेता, किसी एक पार्टी की लड़ाई नहीं रह जाती। वह लड़ाई हर भारतीय की बन जाती है। भारत का संविधान कहता है कि सरकार जनता चुनती है, पर जब सरकार ही जनता की पसंद चुरा ले — तब जनता को ही खड़े होकर कहना पड़ता है — “वोट चोरी? तो गद्दी छोड़ो!” एक समय था जब इस देश ने अपने ही राष्ट्रपिता को गोली लगते देखा था। महात्मा गांधी की हत्या हुई, और देश के एक हिस्से ने उस पर जश्न मनाया, मिठाइयाँ बांटीं — वह दृश्य केवल एक हत्या नहीं था, बल्कि भारत की आत्मा की हत्या का पहला संकेत था। पर तब भी संविधान ने इस देश को फिर उठाया, सुभाष चंद्र बोस के साहस ने उम्मीद जगाई, जवाहरलाल नेहरू की दृष्टि ने नई पीढ़ी को दिशा दी, बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने समाज के प्रत्येक कमजोर को बराबरी का अधिकार दिया, सरदार पटेल ने राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोया, मौलाना आज़ाद ने शिक्षा और ज्ञान की मशाल जलाए रखी, और डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इस गणराज्य को लोकतांत्रिक गरिमा का पहला शपथ दिलाया। उन्होंने भारत को ऐसा संविधान दिया जिसमें जनता सर्वोच्च है और वोट उसका सबसे बड़ा हथियार — मगर आज वही वोट एक खेल बनाकर चुराया जा रहा है। गांधी को गोली मारने वाले लोग उस दौर में अल्पसंख्यक थे, लेकिन आज उसी मानसिकता ने लोकतंत्र के तंत्र पर कब्जा कर लिया है — संविधान की आत्मा की हत्या करते हुए। फर्क बस इतना है कि तब एक शरीर मारा गया था, आज विचार और व्यवस्था को मारा जा रहा है।

आज जो हो रहा है, वह किसी सरकार की गलती नहीं — यह राष्ट्र के बुनियादी विश्वास के साथ किया गया पाप है। चुनाव आयोग, जो जनता के विश्वास का मंदिर था, अब कार्यपालिका की जेब में पड़ी एक फाइल की तरह दिखने लगा है। भाजपा, जो देशभक्ति का दावा करती है, वह सत्ता की भूख में जनता की आवाज़ को ही लील जाने पर उतारू नजर आती है। वोट चोरी — यह शब्द अब केवल धांधली का विवरण नहीं, बल्कि लोकतंत्र का कलंक है। और यह कलंक जब सत्ता और सिस्टम दोनों के चेहरे पर एक साथ दिखने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि खतरा केवल विपक्ष के लिए नहीं — 140 करोड़ भारतीयों के लिए है। वोट चोरी करके जो सत्ता हासिल होती है, वह कभी जनता की नहीं होती, वह चोरी की दुकान होती है, जहां राष्ट्रवाद के नाम पर लोकतंत्र की नीलामी की जाती है। आज लूट सिर्फ धन की नहीं — सत्ता, अधिकार और भविष्य की हो रही है।

राहुल गांधी ने पहली बार नहीं, कई बार इस “लोकतंत्र-विरोधी तंत्र” की परतें खोली हैं। पर आज उन्होंने हरियाणा चुनाव की पूरी पोथी, पूरी स्क्रिप्ट, पूरा खुला खेल देश की आंखों के सामने रख दिया। उन्होंने बताया कि कैसे एक राज्य के नतीजे जनता के नहीं, किसी कमरे में बैठकर तय किए गए। उन्होंने यह भी दिखाया कि कैसे फर्जी वोटरों की पूरी फौज तैयार की गई — यह काम किसी अकेले ठेकेदार ने नहीं, बल्कि व्यवस्था में बैठी मिलीभगत ने किया। राहुल ने साफ कहा कि यह सिर्फ कांग्रेस बनाम भाजपा की लड़ाई नहीं — यह भारत की आत्मा को बचाने की लड़ाई है। क्योंकि जिस दिन वोट की कीमत डेटा हेरफेर से कम हो जाएगी, उस दिन भारत गणराज्य नहीं, एक प्रबंधित साम्राज्य बनकर रह जाएगा।

पर सबसे बड़ा प्रश्न हम नागरिकों का है — क्या हम सच में इस लूट के गवाह बनकर चुप रह सकते हैं? क्या हम बस टीवी डिबेट्स देखकर संतोष कर लेंगे कि लोकतंत्र सुरक्षित है? या हम यह स्वीकार कर चुके हैं कि परिणाम सत्ता तय करेगी, जनता नहीं? इतिहास बताता है — जब-जब भारत खामोश हुआ, गलत ताकतें हावी हुईं। आज फिर वैसी ही लड़ाई हमारे सामने है — फर्क बस इतना कि इस बार दुश्मन बाहर नहीं, व्यवस्था के भीतर है। और इसीलिए यह लड़ाई सिर्फ राहुल गांधी की नहीं — यह हर भारतीय की लड़ाई है। हर उस नागरिक की जो कतार में खड़ा होकर वोट देता है और उम्मीद करता है कि उसकी उंगली पर लगा स्याही का निशान देश की दिशा तय करेगा। अगर आज यह लड़ाई न लड़ी गई, तो हो सकता है अगले चुनाव में किसी की भी उंगली पर लगी स्याही मायने न रखे — क्योंकि मतदाता सूची से पहले ही उसे मिटा दिया जाएगा।

भारत ने आजादी संविधान से नहीं मांग ली थी, उसे संघर्ष से पाया था। और अब उस संविधान की आत्मा को बचाने का वक्त आ चुका है। यह लड़ाई शामिल होने की नहीं — जीने की वजह है। क्योंकि जब वोट चोरी हो जाता है — भविष्य चोरी हो जाता है। और जब भविष्य चोरी हो जाता है — देश सिर्फ नक्शे में रह जाता है। इसलिए सवाल आज सिर्फ यह है — सत्ता कौन चला रहा है? नहीं। सवाल यह है — सत्ता किसने चुनी? अगर जवाब जनता नहीं — तो गद्दी पर बैठे लोगों को याद रखना चाहिए: वोट चोरी करो, तो गद्दी छोड़ो — यह 140 करोड़ भारतीयों की लड़ाई है।

 

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