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यह राहुल नहीं — हर भारतीय की लड़ाई है

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भारत की आत्मा पर जब हमला होता है तो वह किसी एक नेता, पार्टी या विचारधारा की लड़ाई नहीं रहती—वह पूरे राष्ट्र की लड़ाई बन जाती है। राहुल गांधी की “H-Files Hydrogen Bomb” प्रेस कॉन्फ्रेंस इसी राष्ट्रीय संघर्ष की घोषणा है। उन्होंने जो आरोप लगाए, वह केवल हरियाणा चुनाव के परिणाम पर प्रश्न नहीं हैं, बल्कि यह चेतावनी हैं कि कहीं हमारा लोकतंत्र सिर्फ कागज़ी औपचारिकता बनकर न रह जाए। राहुल गांधी ने यह कहकर राजनीति को ललकारा कि हरियाणा की सत्ता जनता ने नहीं, बल्कि सत्ता-तंत्र और चुनावी मशीनरी ने मिलकर “मैनेज” की है। यह दावा जितना भयावह है, उतना ही हमारे लोकतांत्रिक विवेक को जगाने वाला भी—क्योंकि अगर एक लोकतंत्र में जनता की इच्छा चोरी हो जाए, तो फिर चुनावों का अर्थ केवल परिणाम की घोषणा तक सीमित हो जाता है।

राहुल गांधी ने अपने तथ्य और उदाहरण पूरे आत्मविश्वास से रखे। 25 लाख से अधिक ‘फर्जी वोट’—यह आंकड़ा किसी भाषण का तड़का नहीं, बल्कि वह दावा है जो अगर सत्य सिद्ध हो गया तो हरियाणा में बैठी सरकार एक पल भी नैतिक आधार पर नहीं टिक सकती। एक महिला का सौ बार वोट डाल पाना, एक ही फोटो का दो सौ तेइस वोटों में इस्तेमाल, दो भाइयों का अठारह-अठारह बार मतदान करना—यह सब त्रुटियाँ नहीं, बल्कि एक ऐसी तकनीकी फैक्ट्री का प्रमाण है जिसमें लोकतंत्र को डेटा एंट्री के रूप में प्रोसेस करके, चुनाव परिणाम की रीढ़ इच्छानुसार मोड़ दी जाती है। और यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती—हरियाणा की वोटर लिस्ट में ब्राज़ील की मॉडल तक का नाम दर्ज होना इस पूरे खेल की अंतरराष्ट्रीय गंभीरता पर भी सवाल खड़ा करता है। यह संयोग नहीं—यह संकेत है कि चुनाव अब स्थानीय पोलिंग बूथों के बजाय दूर बैठी किसी ‘केंद्रीकृत प्रयोगशाला’ से तय किए जा रहे हैं।

पर असल सवाल इन उदाहरणों से बड़ा है—जहाँ सबसे बड़ा संदेह जन्म लेता है, वह है चुनाव आयोग की चुप्पी। वह संस्था जिसे निष्पक्षता का प्रहरी माना गया, वह इस पूरे प्रकरण में या तो अज्ञान का वस्त्र धारण किए हुए है या मौन-सहमति का कवच। राहुल गांधी ने साफ बोला—“चुनाव आयोग एक क्लिक में डुप्लीकेट पहचान सकता है, पर करता नहीं।” यह वाक्य भारत के संविधान की नींव पर हथौड़े की चोट जैसा है। अगर तंत्र जानकर आँखें बंद कर ले, तो अपराधियों को किसी मास्टरमाइंड की ज़रूरत ही नहीं रहती—सिस्टम ही अपराधी बन जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ लोकतंत्र नहीं टूटता—बल्कि गिर जाता है।

राहुल गांधी ने पोस्टल बैलेट्स का उल्लेख किया—जहाँ मशीन नहीं, हाथों का मतदान था। वहां कांग्रेस को भारी बढ़त मिली। लेकिन जब मशीन और ‘व्यवस्था’ वाले मतों की बारी आई—चमत्कार ने करवट ली और परिणाम उलट दिए गए। यह कोई गणितीय संयोग नहीं—यह एक राजनीतिक संकेत है। और संकेत जब व्यवस्था को बताने लगें, तब समझना चाहिए कि कहीं नतीजे पहले ही लिखे जा चुके हैं, और जनता का वोट उस पटकथा का सिर्फ सांकेतिक भाग बनकर रह गया है।

आज हमें खुद से पूछना ही होगा—क्या हम उसी भारत में जी रहे हैं जहाँ संविधान ने हमें यह अधिकार दिया कि “हम वोट देते हैं, इसलिए सरकार बनती है”? या हम उस भारत में पहुँच चुके हैं जहाँ “सरकार पहले बन जाती है, और फिर वोट को उसके अनुसार एडजस्ट किया जाता है”? यह प्रश्न कड़वा है लेकिन सत्य का अंश यही है कि लोकतंत्र की हत्या शोर मचाकर नहीं होती—वह खामोशी में की जाती है, एक सिस्टम अपडेट के मायाजाल में छुपाकर।

राहुल गांधी ने गुरु नानक देव जी का उल्लेख सिर्फ श्रद्धा के लिए नहीं किया—बल्कि यह याद दिलाने के लिए किया कि सत्य और साहस इस देश की असली पहचान हैं। अगर आज हम खामोश रहे, अगर हमने इस चेतावनी को महज़ राजनीतिक बयान मानकर खारिज कर दिया—तो हम भी उस अपराध का हिस्सा बन जाएंगे जिसमें जनता के वोट की हत्या कर लोकतंत्र को मृत घोषित कर दिया जाएगा। याद रखिए—लोकतंत्र तब नहीं मरता जब एक तानाशाह उभरता है; वह तब मरता है जब जनता चुप हो जाती है।

इसलिए यह लड़ाई राहुल गांधी की नहीं—यह हर भारतीय की है। हर उस नागरिक की जो वोट देने के लिए कतार में खड़ा होता है। हर उस परिवार की जो अपने भविष्य को मतपत्र पर उकेरने आता है। हर उस युवा की जो मानता है कि यह देश उसकी आवाज़ सुनता है। आज अगर चुप रहे—तो कल यह चुप्पी हमारी पहचान चुरा लेगी। यह लड़ाई सत्ता की नहीं—वोट की है। और जो इस लड़ाई से कतराएगा, वह भारत की आत्मा से कतराएगा।

 

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