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अफगानिस्तान में 6.3 तीव्रता का भूकंप: कम से कम 20 मौतें, राहत और बचाव में भारी चुनौतियाँ

अफगानिस्तान एक बार फिर प्राकृतिक आपदा के भयानक प्रहार से हिल गया है। शनिवार को देश के पश्चिमी हिस्से में आए 6.3 तीव्रता के शक्तिशाली भूकंप ने कम से कम 20 लोगों की जान ले ली, जबकि कई दर्जन घायल बताए जा रहे हैं। अफगानिस्तान के ग्रामीण इलाके पहले से ही संसाधनों की भारी कमी, गरीबी और राजनीतिक अस्थिरता का सामना कर रहे हैं, ऐसे में इस तरह के भूकंप ने आम नागरिकों को और भी गहरे संकट में धकेल दिया है। भूकंप के झटके सीमावर्ती ईरान तक महसूस किए गए, जिससे भय का माहौल और फैल गया।

स्थानीय प्रशासन के मुताबिक भूकंप का केंद्र हरात प्रांत के पास था, जहाँ अधिकांश घर मिट्टी और पत्थरों से बने होने के कारण पल भर में मलबे में तब्दील हो गए। कई गाँवों में इमारतें ढह गईं और लोग नींद में ही दब गए। बचाव दलों ने रात भर राहत अभियान चलाया, लेकिन भूकंप प्रभावित इलाकों में टूटे रास्ते और आधुनिक मशीनों की कमी के कारण राहत कार्य बेहद धीमी रफ्तार से चल रहा है। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि लोग अपने हाथों और फावड़ों से मलबा हटाकर जीवित लोगों को खोजने की कोशिश कर रहे हैं।

अफगानिस्तान की इस त्रासदी में सबसे बड़ी चिंता यह है कि संचार व्यवस्था और बिजली के बाधित होने की वजह से दूर-दराज़ इलाकों की सटीक जानकारी जुटाना बेहद मुश्किल हो रहा है। राहत एजेंसियाँ यह आशंका जता रही हैं कि मौतों का आंकड़ा अभी शुरुआत है और आने वाले समय में यह तेजी से बढ़ सकता है। महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग इस आपदा में सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले ज़्यादातर परिवार भूकंपरोधी घरों तक की सुविधा नहीं रखते।

भूकंप के बाद कई बार आफ्टरशॉक भी महसूस किए गए, जिससे लोग घबराकर खुले मैदानों में रात बिताने को मजबूर हुए। कड़ाके की ठंड और खाने-पीने की कमी ने स्थिति को और खराब कर दिया है। अस्पतालों में इलाज की भारी कमी है और डॉक्टर सीमित साधनों में घायल लोगों को बचाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। मानवीय सहायता के लिए संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने मदद की पेशकश की है, लेकिन राजनीतिक हालात के चलते समन्वय की चुनौतियाँ सामने हैं।

अफगानिस्तान पिछले एक दशक में कई विनाशकारी भूकंप झेल चुका है। वहीं तालिबान शासन के बाद अंतरराष्ट्रीय सहायता में तेज गिरावट आई, जिससे देश की आपदा-प्रबंधन क्षमता बेहद कमजोर हो गई है। हरात में कुछ ही महीनों के भीतर यह दूसरा बड़ा भूकंप है, जिसने एक बार फिर दुनिया को यह याद दिलाया है कि यह क्षेत्र भू-वैज्ञानिक रूप से अत्यधिक संवेदनशील है। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत निर्माण ढाँचे और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली की कमी इस त्रासदी को और भयावह बना देती है।

इस दर्दनाक घटना के बाद बचावकर्मियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती समय है — क्योंकि मलबे के नीचे फँसे हर मिनट के साथ ज़िंदगियों की उम्मीद घटती जा रही है। स्थानीय लोग भी अपने खोए परिजनों के लिए आंसुओं में डूबे हैं, जबकि पूरी दुनिया इस आपदा को देखकर मानवता के नाम एक बार फिर दुआ कर रही है।

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