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विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से दूर — आखिर समस्या वैश्विक है या भारत की आर्थिक नीतियों की?

सुनील कुमार, बिजनेस एडिटर । मुंबई 3 नवंबर 2025

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) का भारतीय ऋण (debt) बाजार में निवेश लगातार गिरता जा रहा है। इस साल अब तक महज़ ₹69,073 करोड़ (लगभग $7.8 बिलियन) का ही निवेश हुआ है, जबकि पिछले वर्ष यह आंकड़ा ₹1,52,775 करोड़ ($17.26 बिलियन) था। यह स्थिति तब है जब सरकार ने विदेशी निवेशकों के लिए Fully Accessible Route (FAR) जैसी उदार नीतियां लागू की हैं, जिससे भारतीय सरकारी बांड में निवेश आसान हो गया है। सवाल उठता है — जब निवेश के रास्ते खुले हैं, तो पूंजी क्यों नहीं आ रही? क्या समस्या केवल वैश्विक अस्थिरता की है, या भारत की आर्थिक नीतियों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं?

दरअसल, जब सरकार और रिज़र्व बैंक ने भारतीय सरकारी बांड को JP Morgan जैसे वैश्विक बांड इंडेक्स में शामिल करने का फैसला किया था, तब यह अनुमान लगाया गया था कि अगले एक वर्ष में $20-25 बिलियन तक की विदेशी पूंजी भारत में आएगी। लेकिन हकीकत में अक्टूबर 2025 तक यह आंकड़ा मुश्किल से $10.7 बिलियन तक पहुंचा है — यानी अनुमान का आधा भी नहीं। यह निवेशकों के मन में भारतीय वित्तीय वातावरण के प्रति गहराते अविश्वास का संकेत है। रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) और वित्त मंत्रालय लगातार यह दावा करते रहे हैं कि भारत की नीतियां स्थिर हैं और विकास दर मजबूत है, लेकिन आंकड़े इससे उलट कहानी सुना रहे हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि यह निवेश घटने का कारण केवल अमेरिकी ब्याज दरों या वैश्विक अस्थिरता को ठहराना आसान बहाना है। असली वजहें भारतीय अर्थव्यवस्था की अंदरूनी कमजोरी, नीतिगत असंगति और भरोसे की कमी हैं। विदेशी निवेशक अब भारत को ‘तेज़ी वाले बाजार’ की बजाय ‘जोखिम भरे बाजार’ के रूप में देखने लगे हैं। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक जहां पहले भारतीय इक्विटी में लंबी अवधि की कमाई देखते थे, अब वे छोटे लाभ लेकर तेजी से बाहर निकल रहे हैं। इस साल अब तक FPIs ने इक्विटी मार्केट से ₹1.39 लाख करोड़ की भारी निकासी की है।

यह रुझान केवल एक चेतावनी नहीं बल्कि आर्थिक प्रणाली में विश्वास के संकट का संकेत है। भारत सरकार ने भले ही ‘Ease of Doing Business’ का नारा दिया हो, लेकिन निवेशकों को नीतियों की अस्पष्टता, टैक्स के अनिश्चित प्रावधानों और ब्यूरोक्रेसी के रवैये से परेशानी है। विदेशी फंड मैनेजर्स का कहना है कि जब तक भारत अपनी कर प्रणाली, नियामक ढांचे और नीति-निर्माण प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं लाता, तब तक कोई भी सुधार विदेशी पूंजी को स्थायी रूप से आकर्षित नहीं कर पाएगा।

इसके साथ ही घरेलू बाज़ार में उपभोग और औद्योगिक उत्पादन की गति भी कमजोर पड़ी है। बेरोज़गारी दर में मामूली गिरावट के बावजूद खर्च की क्षमता घट रही है, जिससे मांग-आधारित अर्थव्यवस्था का पहिया सुस्त पड़ गया है। विदेशी निवेशक जानते हैं कि जब घरेलू मांग ठंडी हो और राजनीतिक स्थिरता पर सवाल हों, तब किसी भी बाजार में दीर्घकालिक पूंजी डालना जोखिम भरा होता है।

साफ है — अगर यह स्थिति जारी रही तो भारत को न सिर्फ विदेशी निवेश में गिरावट झेलनी होगी, बल्कि रुपया, बॉन्ड यील्ड और वित्तीय संतुलन पर भी दबाव बढ़ेगा। विदेशी पूंजी केवल आंकड़ों से नहीं आती, वह भरोसे और नीति-संगति से आती है। इसलिए अब समय आ गया है कि सरकार “वैश्विक कारकों” की आड़ लेना बंद करे और भारतीय अर्थव्यवस्था की असल सर्जरी करे — जहां निवेशक भरोसा करें कि भारत केवल ‘सबसे तेज़ बढ़ती अर्थव्यवस्था’ नहीं, बल्कि ‘सबसे विश्वसनीय अर्थव्यवस्था’ भी है।

 

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