पटना 31 अक्टूबर 2025
नीतीश कुमार, जेपी नड्डा, चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा — सभी मंच पर मौजूद थे। लेकिन जैसे ही घोषणा पत्र का औपचारिक विमोचन हुआ, न तो किसी ने मीडिया से बात की, न जनता के लिए कोई संदेश दिया। पूरा कार्यक्रम कुछ ही सेकंड में ख़त्म हो गया।
राजनीतिक विश्लेषक इसे बिहार चुनाव के माहौल में “संघर्ष से पहले की चुप्पी” बता रहे हैं। आम तौर पर चुनावी घोषणा पत्र किसी भी पार्टी के लिए जनता के बीच अपनी नीतियां, वादे और दृष्टिकोण साझा करने का अहम मौका होता है। लेकिन इस बार एनडीए ने इसे मात्र औपचारिकता तक सीमित कर दिया।
कई जानकारों का मानना है कि यह “असहज एकता” की झलक थी — क्योंकि मंच पर मौजूद नेताओं के बीच तालमेल और आपसी भरोसे की कमी साफ़ दिखी। एनडीए का यह आयोजन चुनावी रणनीति की बजाय राजनीतिक मजबूरी का प्रदर्शन लगता रहा।
एक तरफ़ विपक्ष, ख़ासकर तेजस्वी यादव ने अपने घोषणापत्र को विस्तार से जनता के सामने रखा है, जिसमें रोज़गार, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और युवाओं के भविष्य पर ठोस बातें की गई हैं। वहीं एनडीए का यह 26 सेकंड का सन्नाटा जनता के मन में सवाल छोड़ गया —
क्या सत्ता में इतने साल रहने के बाद अब एनडीए के पास कहने के लिए कुछ बचा ही नहीं?
यह “26 सेकंड की चुप्पी” बिहार के चुनावी इतिहास में याद रखी जाएगी — न सिर्फ़ उसकी संक्षिप्तता के लिए, बल्कि इस सवाल के लिए भी कि — क्या यह गठबंधन थक चुका है, या जनता से नज़रें चुराने की कोशिश कर रहा है?




