नई दिल्ली, 30 अक्तूबर 2025
लद्दाख सीमा पर भारत और चीन के बीच गतिरोध को कम करने के उद्देश्य से हुई नवीनतम कोर कमांडर स्तर की वार्ता एक बार फिर बिना किसी ठोस परिणाम के समाप्त हो गई। वार्ता भारत की ओर स्थित मोल्डो-चुशूल सीमा बैठक बिंदु पर “मित्रतापूर्ण और सौहार्दपूर्ण वातावरण” में हुई, लेकिन जिस मुद्दे पर सबसे अधिक बहस और चिंता है — यानी ‘बफर ज़ोन’ — उस पर दोनों देशों ने न तो कोई स्पष्ट बयान दिया और न ही कोई नया समाधान सामने रखा।
संयुक्त वक्तव्य में मात्र इतना कहा गया कि “दोनों पक्ष मौजूदा तंत्रों के माध्यम से सीमावर्ती मुद्दों को शांतिपूर्ण तरीक़े से हल करने और सीमा क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं।” परंतु, इस शब्दावली के पीछे वह गहरी कूटनीतिक खामोशी छिपी है, जो गालवान घाटी की रक्तरंजित झड़प के बाद से चली आ रही है।
गालवान से गोगरा तक – पीछे हटना, लेकिन कीमत भारत के हिस्से
जून 2020 की गालवान घाटी झड़प में भारत के 20 जवानों की शहादत के बाद से दोनों देशों के रिश्तों में गहरी दरार पड़ी थी। इसके बाद से चीन ने गालवान घाटी, पैंगोंग झील के दक्षिण और उत्तर तट, हॉट स्प्रिंग्स और गोगरा क्षेत्रों से आंशिक वापसी तो की है, लेकिन यह वापसी ‘बफर ज़ोन’ बनाने की शर्त पर हुई — यानी ऐसे निष्क्रिय इलाके, जहाँ से दोनों देशों की सेनाएँ समान दूरी पर हट जाती हैं।
परंतु, यह समानता केवल कागज़ पर है। वास्तविकता में, इन बफर ज़ोनों की सीमा भारतीय भूभाग के भीतर तक फैली हुई है, जिससे भारत की सामरिक गश्त और नियंत्रण वाली ज़मीन घट गई है। भारतीय सैनिकों को अपने ही दावे वाले इलाक़ों से पीछे हटना पड़ा है ताकि टकराव टाला जा सके। यह परिस्थिति भारत के लिए भू-राजनीतिक दृष्टि से गंभीर है, क्योंकि यह यथास्थिति चीन के पक्ष में झुकी हुई दिखती है।
सरकार की खामोशी और विशेषज्ञों की बेचैनी
सैन्य विशेषज्ञों और पूर्व अधिकारियों ने नरेंद्र मोदी सरकार की ‘रणनीतिक चुप्पी’ पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इन बफर ज़ोनों ने वस्तुतः चीन को नई ज़मीन का लाभ दिया है। कई रिटायर्ड अधिकारियों का आरोप है कि भारत ने “स्थायी समाधान” की खोज में अनजाने में ही “तथ्यात्मक समर्पण” कर दिया है। पूर्व सेना अधिकारी और रणनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इन ज़ोनों के निर्माण से भारत के गश्ती अधिकार कमज़ोर हुए हैं और अब भारतीय सैनिक उन इलाक़ों तक नहीं जा सकते जहाँ वे 2020 से पहले नियमित रूप से गश्त करते थे। “यह मौन स्वीकारोक्ति है कि भारत ने अपनी कुछ अग्रिम चौकियों को तात्कालिक शांति के नाम पर खो दिया,” एक वरिष्ठ रिटायर्ड अधिकारी ने कहा।
राजनाथ सिंह ने फिर दोहराई स्थायी समाधान की आवश्यकता
इस बीच, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने चीनी समकक्ष एडमिरल डोंग जुन से जून 2025 में हुई द्विपक्षीय बैठक में यह ज़रूर कहा था कि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद का “स्थायी समाधान” निकाला जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि शांति केवल अस्थायी व्यवस्था से नहीं, बल्कि पारदर्शी संवाद और परस्पर विश्वास से संभव है।
हालांकि, उस उच्चस्तरीय बैठक में भी बफर ज़ोन का कोई सीधा ज़िक्र नहीं हुआ, जिससे यह संकेत मिलता है कि भारत इस विषय को सार्वजनिक रूप से उठाने से बच रहा है, संभवतः वार्ता प्रक्रिया को टूटने से बचाने के लिए।
दोनों सेनाओं की भारी तैनाती जारी
पूर्वी लद्दाख में स्थिति अब भी संवेदनशील है। दोनों देशों की सेनाएँ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर लगभग 60,000 से अधिक सैनिकों और भारी हथियारों के साथ तैनात हैं। कई स्थानों पर अस्थायी ढाँचे और निगरानी चौकियाँ स्थापित की गई हैं। अक्टूबर 2024 में हुए एक समझौते के तहत चीन ने डेपसांग मैदान और डेमचोक इलाक़ों से अपनी सीमित सेनाएँ वापस ली थीं, लेकिन बफर ज़ोन की रेखाओं को लेकर अभी तक कोई सहमति नहीं बनी। इस कारण, ज़मीनी स्तर पर तनाव और अनिश्चितता बनी हुई है।
बफर ज़ोन — शांति का रास्ता या आत्मसमर्पण की रणनीति?
कूटनीतिक हलकों में अब यह चर्चा बढ़ती जा रही है कि ये ‘बफर ज़ोन’ क्या वास्तव में शांति की दिशा में उठाया गया कदम हैं या यह भारत के लिए एक रणनीतिक रियायत साबित हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन निष्क्रिय क्षेत्रों ने चीन को सैन्य और मनोवैज्ञानिक बढ़त दिलाई है। बीजिंग अब इस स्थिति को नए सामान्य (New Normal) की तरह प्रस्तुत कर रहा है, जबकि भारत अभी भी “पुराने यथास्थिति” की वापसी की कोशिश कर रहा है।
इस पृष्ठभूमि में, लद्दाख सीमा विवाद अब केवल सैन्य या भौगोलिक नहीं रहा, बल्कि यह भारत की विदेश नीति, सुरक्षा रणनीति और राष्ट्रीय आत्मसम्मान से जुड़ा मुद्दा बन गया है।
भारत और चीन के बीच संवाद जारी है, लेकिन समाधान दूर। हर दौर की वार्ता “सकारात्मक माहौल” और “आपसी सहयोग” जैसे शब्दों में लिपटी होती है, जबकि ज़मीनी सच्चाई यह है कि सैनिक अब भी आमने-सामने हैं। ‘बफर ज़ोन’ का विचार अगर शांति की दिशा में कदम है, तो उसे अस्थायी नहीं — समान अधिकारों और परस्पर सम्मान पर आधारित होना चाहिए। वरना इतिहास यही कहेगा कि शांति की कीमत भारत की ज़मीन ने चुकाई।




