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75 साल बाद जब लहुरिया गांव में आई नल की पानी की खुशी, राजनीति ने फिर सुखा दी धार

आज़ादी के 75 साल बाद जब बलरामपुर ज़िले के लहुरिया गांव में पहली बार नल से पानी बहा, तो गांववालों की आंखों में खुशी के आंसू थे। दशकों से टैंकरों पर निर्भर यह गांव आखिरकार जल संकट से मुक्त होने जा रहा था। लेकिन यह खुशी ज़्यादा दिनों तक टिक नहीं पाई — राजनीतिक अहंकार और प्रशासनिक हस्तक्षेप ने गांव की उम्मीदें फिर तोड़ दीं।

75 साल का इंतज़ार और एक अफसर की कोशिश

लहुरिया गांव में पानी की समस्या इतनी पुरानी थी कि बुजुर्ग भी कहते थे — “हमने कभी अपने आंगन में नल नहीं देखा।” गांव के प्रधान ने कई बार सांसदों, विधायकों और मंत्रियों को पत्र लिखे, पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।

तब जिले में नई नियुक्त हुई IAS अधिकारी दिव्या मित्तल ने गांव का हाल देखा और वादा किया — “लहुरिया में भी अब पानी घर-घर पहुँचेगा।” उनकी मेहनत से जल जीवन मिशन के तहत नल कनेक्शन लगाए गए, और पहली बार गांव में जलधारा बही।

‘जल पूजन’ में राजनीति की साजिश

जब ‘जल पूजन’ का आयोजन हुआ, तो अफसर दिव्या मित्तल ने इसे एक जनभागीदारी का उत्सव बनाया, लेकिन स्थानीय विधायक को निमंत्रण नहीं भेजा। यही बात विधायक को नागवार गुज़री। उन्होंने नाराज़ होकर मुख्यमंत्री को पत्र लिखा, और कुछ ही दिनों में IAS दिव्या मित्तल का तबादला कर दिया गया।

अब फिर सूखा — पाइपलाइन तोड़ी गई

अफसर के जाने के बाद गांव में हालात फिर बदल गए। गांववालों के मुताबिक, “कुछ असामाजिक तत्वों ने जल पाइपलाइन तोड़ दी,” जिससे नल फिर सूख गए और जल आपूर्ति बंद हो गई। 75 साल बाद मिली राहत कुछ ही हफ्तों में छिन गई।

गांववालों का दर्द

गांव की महिलाओं का कहना है कि “हमने सोचा था अब सिर पर मटके नहीं ढोने पड़ेंगे, लेकिन राजनीति ने फिर हमें प्यासा कर दिया।”लोग मांग कर रहे हैं कि सरकार इस मामले की उच्चस्तरीय जांच कराए और दिव्या मित्तल जैसी ईमानदार अफसरों को राजनीतिक प्रतिशोध से बचाया जाए। लहुरिया की कहानी केवल एक गांव की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की है जो विकास से पहले राजनीति को तरजीह देती है।

 

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