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मुकेश सहनी : महागठबंधन में सीट शेयरिंग पर विवाद था लेकिन क्या NDA मुझे उप मुख्यमंत्री बनाती?

बिहार की राजनीति में हलचल मचाते हुए विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के प्रमुख मुकेश सहनी ने पहली बार स्वीकार किया है कि महागठबंधन में सीट शेयरिंग को लेकर विवाद हुआ था। उन्होंने कहा कि यह सही है कि सीटों के बंटवारे के दौरान कई मुद्दों पर मतभेद थे, लेकिन डिप्टी सीएम पद को लेकर कोई विवाद नहीं था। सहनी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब बिहार में महागठबंधन और एनडीए दोनों ही अपने-अपने सहयोगियों के बीच तालमेल बिठाने में जुटे हैं।

मुकेश सहनी ने कहा कि, “सीट शेयरिंग को लेकर कुछ विवाद था। हम चाहते थे कि हमें अच्छी-खासी सीटें मिलें ताकि हमारी पार्टी भी बराबरी की हिस्सेदारी के साथ मैदान में उतर सके। लेकिन यह संभव नहीं हो पाया।” उन्होंने कहा कि वह अब सीट बंटवारे से संतुष्ट हैं और अपनी पार्टी को जिताने के लिए पूरी ताकत से काम करेंगे।

बातचीत के दौरान जब उनसे पूछा गया कि अगर वे NDA से हाथ मिला लें तो क्या हालात बदल सकते हैं, तो उन्होंने एक तीखा लेकिन संतुलित जवाब दिया, “अगर मैं उनके साथ चला भी जाऊं, तो क्या वे मुझे नेता मानेंगे? बीजेपी हमेशा अपने सहयोगियों की पार्टी को तोड़ देती है। हमें दिल्ली से मिले आदेशों का पालन करना होगा, और यही वजह है कि मैं इस तरह के गठबंधन में नहीं रहना चाहता।”

सहनी के इस बयान ने साफ कर दिया कि वह बीजेपी और एनडीए के साथ अपने पुराने अनुभवों से अब भी संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने इशारा किया कि भाजपा का गठबंधन “समान साझेदारी” का नहीं, बल्कि “आदेश पालन” की राजनीति है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सहनी का यह बयान बिहार की राजनीति में दोहरी दिशा दिखाता है — एक तरफ वह महागठबंधन में असंतोष ज़ाहिर कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ एनडीए की राजनीति पर अविश्वास भी जता रहे हैं। इसका सीधा असर निषाद समुदाय के मतदाताओं पर पड़ सकता है, जो मुकेश सहनी को अपनी राजनीतिक आवाज़ मानते हैं।

हालांकि सहनी ने स्पष्ट किया कि वे तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन में काम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी सामाजिक न्याय, पिछड़ों और दलितों के अधिकारों के लिए काम करती रहेगी। “हम सत्ता की राजनीति नहीं, समाज की राजनीति करते हैं। अगर हमारे बीच मतभेद भी हैं, तो वह लोकतंत्र का हिस्सा है — दुश्मनी नहीं।”

मुकेश सहनी का यह बयान भले ही सधे शब्दों में दिया गया हो, लेकिन इसके राजनीतिक निहितार्थ गहरे हैं। उन्होंने यह साफ कर दिया कि बिहार की राजनीति में अब वह न तो किसी के ‘इशारे’ पर चलने को तैयार हैं, न ही अपने समाज के अधिकारों से समझौता करने को।

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