बेंगलुरु 23 अक्टूबर 2025
कर्नाटक की आलंद विधानसभा सीट पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी के “वोट चोरी” के आरोपों ने अब बड़ा रूप ले लिया है। राज्य की विशेष जांच टीम (SIT) ने अपनी रिपोर्ट में ऐसा खुलासा किया है, जिसने लोकतंत्र की जड़ें हिला दी हैं। जांच में सामने आया कि मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए बाकायदा पैसों का लेन-देन हुआ — प्रत्येक वोटर का नाम मिटाने के लिए औसतन 80 रुपये दिए गए। यह खुलासा बताता है कि लोकतंत्र की सबसे अहम प्रक्रिया — वोटर लिस्ट — को किस तरह पैसों के खेल में बदल दिया गया।
SIT की जांच रिपोर्ट के अनुसार, आलंद सीट पर एक संगठित गिरोह ने यह साजिश रची थी। इस गिरोह ने स्थानीय स्तर पर चुनावी प्रक्रिया से जुड़े कुछ व्यक्तियों की मदद से हजारों वैध वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटवाए। पैसे के बदले वोट डिलीट करने की यह प्रक्रिया इतनी व्यवस्थित थी कि हर नाम को “फर्जी” घोषित करने के लिए फॉर्म भरे गए और 80 रुपये प्रति वोट की दर से भुगतान किया गया। इसका सीधा अर्थ है — वोटर लिस्ट को राजनीतिक हितों के लिए खरीदा-बेचा गया।
राहुल गांधी ने कुछ समय पहले इस मुद्दे को उठाते हुए बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने कहा था कि “कर्नाटक में लोकतंत्र की हत्या हुई है। बीजेपी ने सुनियोजित तरीके से हमारे वोट चुराए हैं।” अब SIT की रिपोर्ट ने उनके आरोपों को नई सच्चाई दी है। कांग्रेस का कहना है कि आलंद विधानसभा क्षेत्र में हजारों असली वोटरों के नाम मतदाता सूची से गायब कर दिए गए, जिससे चुनावी नतीजों पर सीधा असर पड़ा।
जांच एजेंसी के अनुसार, यह धांधली सिर्फ एक सीट तक सीमित नहीं है। SIT ने इशारा किया है कि कर्नाटक के कई अन्य इलाकों में भी वोटर डिलीशन का यही पैटर्न देखने को मिला है। यह एक गहरी साजिश का हिस्सा प्रतीत होता है, जिसमें कुछ स्थानीय अधिकारी, डेटा ऑपरेटर्स और राजनीतिक हित साधने वाले दल एक साथ काम कर रहे थे। लोकतंत्र की पवित्र प्रक्रिया — मतदाता पहचान और वोटिंग अधिकार — को इस तरह के “कैश कॉन्ट्रैक्ट” में बदल देना भारत के चुनावी इतिहास का सबसे बड़ा कलंक बन सकता है।
इस मामले पर कांग्रेस ने केंद्र और राज्य सरकार से जवाब मांगा है। पार्टी का कहना है कि अगर SIT की रिपोर्ट में यह तथ्य प्रमाणित हैं, तो यह “वोट चोरी नहीं, लोकतंत्र की लूट” है। वहीं बीजेपी ने राहुल गांधी के आरोपों को “राजनीतिक ड्रामा” बताया और कहा कि कांग्रेस सिर्फ हार का बहाना ढूंढ रही है।
लेकिन सवाल अब केवल राजनीति का नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का है। जब एक मतदाता का नाम मात्र 80 रुपये में मिटाया जा सकता है, तो चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर कितना भरोसा किया जा सकता है? यह खुलासा देशभर में लोकतंत्र की रक्षा के लिए नई बहस छेड़ चुका है।
क्या भारत में अब वोट भी बिकने लगे हैं? और अगर हां, तो फिर लोकतंत्र की कीमत कितनी बची है?




