जयपुर 23 अक्टूबर 2025
राजस्थान की राजधानी जयपुर से एक दर्दनाक और शर्मनाक मामला सामने आया है जिसने इंसानियत को झकझोर दिया है। बिहार के सात मासूम बच्चे, जिन्हें जयपुर की एक चूड़ी फैक्ट्री में जबरन काम कराया जा रहा था, आखिरकार मौत और यातना के उस कारखाने से किसी तरह भाग निकले। ये बच्चे 18 घंटे तक लगातार काम करने को मजबूर थे, और जब कोई बीमार पड़ जाता, तो उसे बेरहमी से पीटा जाता था। भागने के बाद बच्चों ने डर के मारे कब्रिस्तान में जाकर शरण ली, जहां से स्थानीय लोगों ने उन्हें बचाया।
पुलिस और बाल संरक्षण अधिकारियों के मुताबिक, ये सभी बच्चे बिहार के अलग-अलग जिलों से लाए गए थे — बहला-फुसलाकर या फिर गरीबी के कारण परिवारों से दूर कर दिए गए। इन बच्चों को यह कहकर जयपुर लाया गया था कि उन्हें किसी अच्छी दुकान पर काम मिलेगा, लेकिन यहां पहुंचते ही उनकी जिंदगी नर्क में बदल गई। चूड़ी बनाने वाली उस फैक्ट्री में बच्चों से दिन-रात काम करवाया जाता था — सुबह 6 बजे से लेकर आधी रात तक, बिना आराम, बिना ठीक से खाना, और बिना किसी मजदूरी के।
बच्चों ने बयान में बताया कि फैक्ट्री मालिक और उसके कारिंदे बीमारी या थकान जताने पर डंडों से पिटाई करते थे। छोटे हाथ जलते कांच और केमिकल्स के संपर्क में आने से जख्मी हो चुके थे। किसी को बुखार होता, तो भी उन्हें काम रोकने की इजाजत नहीं थी। कई बच्चों की उंगलियों पर छाले, जलन और सूजन के निशान अब भी मौजूद हैं।
पुलिस को सूचना तब मिली जब एक स्थानीय व्यक्ति ने कब्रिस्तान के पास सात थके, डरे और गंदे कपड़ों में लिपटे बच्चों को छिपते हुए देखा। पूछताछ में उन्होंने रोते हुए बताया कि वे “फैक्ट्री से भागे हैं” क्योंकि वहां “मार खाते थे और खाना नहीं मिलता था।” इसके बाद बाल कल्याण समिति (CWC) और जयपुर पुलिस ने रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया और फैक्ट्री मालिकों की तलाश शुरू कर दी।
राजस्थान पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और फैक्ट्री मालिक के खिलाफ बाल श्रम निषेध कानून, मानव तस्करी, और गैरकानूनी बंधुआ मजदूरी के तहत गंभीर धाराओं में जांच शुरू की है। वहीं, बिहार सरकार से भी संपर्क किया जा रहा है ताकि इन बच्चों को सुरक्षित घर और पुनर्वास मिल सके।
यह घटना एक बार फिर उस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है कि आज भी भारत में हजारों गरीब बच्चे शिक्षा और बचपन से वंचित होकर मुनाफे की मशीनों के पुर्जे बना दिए जाते हैं। जयपुर जैसे बड़े शहरों में चल रहे ऐसे “छिपे कारखाने” दरअसल आधुनिक काल की गुलामी की फैक्ट्रियां हैं, जहां न कोई कानून है, न कोई इंसानियत।
जब एक बच्चे के बचपन की कीमत सिर्फ “18 घंटे का काम और डंडे की मार” रह जाए, तो क्या हम अब भी खुद को सभ्य समाज कह सकते हैं?




