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बिहार चुनाव 2025: एनडीए उम्मीदवारों का जातीय गणित — सत्ता की राह पर 243 चेहरों की कहानी

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पटना ब्यूरो 17 अक्टूबर 2025

जातीय समीकरणों का चुनावी शास्त्र

बिहार चुनावों की राजनीति कभी भी केवल घोषणाओं और वादों पर नहीं चली। यहाँ की सियासत की धड़कन हमेशा जातीय समीकरणों की नब्ज़ पर टिकी रही है। यही कारण है कि 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए (भाजपा–जदयू–हम–रालोसपा आदि) गठबंधन ने 243 सीटों के लिए उम्मीदवारों का चयन करते समय हर जिले, हर ब्लॉक और हर गांव की जातीय रचना का गहराई से अध्ययन किया। इस बार नीतीश कुमार और भाजपा दोनों ने स्पष्ट संदेश दिया है कि “वोट बैंक अब केवल नारे से नहीं, गणित से साधे जाएंगे।” यही वजह है कि टिकट बंटवारे की यह प्रक्रिया किसी “चुनाव रणनीति” से कम और “समाजशास्त्रीय सर्वेक्षण” से ज़्यादा लगती है।

243 उम्मीदवारों की पूरी सूची देखने पर पता चलता है कि एनडीए ने जाति संतुलन को अपने पूरे अभियान की रीढ़ बना दिया है। इसमें यह प्रयास दिखाई देता है कि एक भी सामाजिक समूह ऐसा न बचे जो अपने को “अवांछित” या “अनदेखा” महसूस करे। सवर्णों, पिछड़ों, अतिपिछड़ों और दलितों — सबको उनके हिस्से की राजनीतिक हिस्सेदारी दी गई है। यही एनडीए का वह ‘मिश्रित मॉडल’ है, जिसके ज़रिए वह हर वर्ग में “आंशिक संतुष्टि” पैदा करना चाहता है।

रणनीति की पहली परत — सवर्ण और पिछड़ा संतुलन

एनडीए की रणनीति की पहली परत सवर्ण-पिछड़ा संतुलन पर टिकी है। बिहार में सवर्ण समुदाय — विशेष रूप से ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत और कायस्थ — पारंपरिक रूप से भाजपा का समर्थन आधार रहा है। भाजपा ने इन वर्गों को नाराज़ न करने के लिए पर्याप्त संख्या में उम्मीदवार इन्हीं समुदायों से चुने हैं। लेकिन साथ ही, यह भी ध्यान रखा गया है कि जदयू के सामाजिक आधार — यानी कुर्मी और कोइरी जैसी पिछड़ी जातियों — की हिस्सेदारी घटे नहीं। इस कारण कई जिलों में भाजपा ने अपने “सेफ सीट्स” पर भी पिछड़ा उम्मीदवार उतारकर सामाजिक समावेश का प्रदर्शन किया है।

दरभंगा, मोतिहारी, और वैशाली जैसे जिलों में भूमिहार-ब्राह्मण उम्मीदवारों की उपस्थिति परिपाटी बनी रही है, जबकि गया, नालंदा, नवादा और पटना ग्रामीण में जदयू ने अपने पारंपरिक ओबीसी आधार को मजबूत करने के लिए कुर्मी उम्मीदवारों को उतारा है। इस संतुलन के पीछे उद्देश्य केवल सीट जीतना नहीं, बल्कि सत्ता की साझेदारी की छवि बनाना है, ताकि कोई भी समुदाय अपने को राजनीतिक रूप से हाशिए पर महसूस न करे।

दूसरी परत — दलित और महादलित समुदायों का समावेश

नीतीश कुमार की राजनीति की पहचान “सात निश्चय” योजनाओं जितनी ही महादलित सशक्तिकरण से भी जुड़ी रही है। इस बार एनडीए ने करीब 33 से अधिक सीटें दलित और महादलित समुदायों के उम्मीदवारों को देकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि एनडीए की सामाजिक आधार रेखा केवल ऊंची जातियों तक सीमित नहीं है। पासवान समुदाय (हम पार्टी और लोक जनशक्ति रामविलास गुट के बीच विभाजित) को भी सम्मानजनक संख्या दी गई है, ताकि उनके पारंपरिक मतदाताओं का झुकाव एनडीए से दूर न जाए।

विशेष ध्यान देने वाली बात यह है कि इस बार महादलित महिलाओं को भी कई सीटों पर मौका दिया गया है, खासकर उन जिलों में जहाँ पिछली बार राजद ने महिला सशक्तिकरण के नाम पर मजबूत पकड़ बनाई थी। भाजपा ने इन सीटों पर अपने “लाडली बहना” और “जन कल्याण” अभियानों से जुड़ी महिला कार्यकर्ताओं को उतारकर यह संकेत दिया है कि उसकी राजनीति अब “विकास + सम्मान” के दोहरे फ्रेम में चल रही है।

तीसरी परत — अति पिछड़ा और मुस्लिम मतदाताओं के बीच प्रयोग

बिहार की राजनीति में अति पिछड़ा वर्ग (EBC) निर्णायक भूमिका निभाता है। एनडीए ने पिछली बार की तुलना में इस वर्ग को अधिक प्राथमिकता दी है। करीब 65 उम्मीदवार अति पिछड़े वर्ग से हैं, जिनमें नाई, तेली, धोबी, बिंद, केवट, पासवान, कुहार और ततैया जैसे समूहों का प्रतिनिधित्व है। ये वही मतदाता हैं जो 2010 और 2015 में नीतीश के सामाजिक इंजीनियरिंग मॉडल की नींव बने थे। भाजपा और जदयू दोनों को विश्वास है कि यह वर्ग अब भी “विकास बनाम पहचान” के तर्क में एनडीए के साथ रहेगा।

मुस्लिम मतदाताओं के बीच हालांकि एनडीए की स्थिति पारंपरिक रूप से कमजोर रही है, लेकिन इस बार उसने 6 मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर प्रतीकात्मक प्रयास किया है कि वह “समावेश” की छवि बना सके। यह प्रयोग खासतौर पर सीमांचल और मधेपुरा जैसे इलाकों में किया गया है, जहाँ मुस्लिम आबादी निर्णायक है।

समीकरणों की सर्जरी — किसने कितनी हिस्सेदारी पाई

एनडीए के 243 उम्मीदवारों में अनुमानतः लगभग 58 सवर्ण, 82 पिछड़ा वर्ग (OBC), 65 अतिपिछड़ा (EBC), 33 दलित/महादलित, और 5–6 मुस्लिम उम्मीदवार हैं। इस वर्गीकरण से साफ़ है कि एनडीए जातीय राजनीति के हर पहलू को गणित की तरह साधना चाहता है। हर सीट पर उम्मीदवार तय करने से पहले गठबंधन ने स्थानीय जातीय संरचना, पिछली बार का वोट शेयर, उम्मीदवार की सामाजिक स्वीकार्यता और विपक्षी दल के जातीय आधार — इन सभी कारकों का विस्तृत विश्लेषण किया।

राजनीतिक निहितार्थ और भविष्य का संकेत

एनडीए का यह “जातीय इको-सिस्टम” दरअसल उस डर से जन्मा है कि बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण से बाहर कोई भी चुनाव नहीं जीता जा सकता। भले ही केंद्र में “विकास”, “मिशन वोकल फॉर लोकल” या “राष्ट्रवाद” जैसे एजेंडे चल रहे हों, परंतु बिहार में अब भी जाति, रोजगार और सम्मान ही असली मुद्दे हैं। नीतीश कुमार और भाजपा जानते हैं कि अगर वे जाति का समीकरण नहीं साध सके, तो विपक्ष — विशेष रूप से राजद और कांग्रेस गठबंधन — इस मोर्चे पर बढ़त बना लेगा।

लेकिन इस रणनीति की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जातीय गणित राजनीति को दिशा तो देता है, लेकिन नैतिक गहराई खो देता है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या बिहार के मतदाता अब भी जाति के नाम पर वोट देंगे, या इस बार “विकास और युवाओं के भविष्य” को प्राथमिकता देंगे।

 जाति बनाम क्षमता का मुकाबला

बिहार का यह चुनाव केवल राजनीतिक दलों का नहीं, बल्कि राजनीतिक सोच का भी इम्तिहान है। एनडीए ने एक बार फिर दिखाया है कि बिहार की सियासत में जातीय संतुलन के बिना सत्ता की चाबी हासिल नहीं की जा सकती। पर सवाल यह भी है कि क्या यही रणनीति आने वाले समय में बिहार को “नई दिशा” देगी या फिर राज्य की राजनीति हमेशा उसी पुराने जातीय चक्र में घूमती रहेगी?

243 उम्मीदवारों की यह सूची बिहार की सामाजिक बनावट का जीवंत नक्शा है — एक ऐसा नक्शा जो दिखाता है कि लोकतंत्र के इस रणक्षेत्र में हर जाति, हर वर्ग और हर चेहरा एक संख्या नहीं, बल्कि सत्ता के समीकरण का हिस्सा बन गया है।

 

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