अखलाक अहमद | जयपुर 28 दिसंबर 2025
राजस्थान में गुमशुदा मामलों का सिलसिला अब एक गंभीर सामाजिक समस्या के रूप में उभर रहा है। राज्य के पुलिस और प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार, हर साल लगभग 34,000 लोग किसी न किसी कारण से गुमशुदा हो जाते हैं, जिसका औसत लगभग 93 लोग प्रतिदिन गायब होने का है, यानी रोज़ाना करीब ढाई दर्जन परिवारों की दुनिया रातों-रात बदल जाती है। इन गायब लोगों में से लगभग 76 % महिलाएं हैं, जो यह दर्शाता है कि यह समस्या सिर्फ़ युवाओं या पुरुषों तक सीमित नहीं है, बल्कि महिलाओं और लड़कियों पर इसका प्रभाव कहीं अधिक गहरा है।
पुलिस की सीसीटीएनएस (Crime & Criminal Tracking Network & Systems) पोर्टल पर दर्ज आंकड़ों के मुताबिक़, एक ही सप्ताह में राज्यभर में दर्ज किए गए मिसिंग मामलों में महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में बहुत अधिक थी। उदाहरण के लिए, एक हफ़्ते में कुल लगभग 650 लोग लापता हुए, जिनमें 494 महिलाएं और 156 पुरुष शामिल थे, और इनमें 111 नाबालिग बच्चों का भी विवरण था। इनमें 90 लड़कियां और 21 लड़के शामिल थे, जो यह संकेत देते हैं कि बाल और किशोर वर्ग भी इस समस्या से अछूते नहीं हैं।
विशेष रूप से यह देखा गया है कि लापता महिलाओं का बड़ा हिस्सा 18 से 30 वर्ष की उम्र के युवा वर्ग का है, जो सामाजिक और पारिवारिक दबाव, प्रेम-प्रसंग, नौकरी-शहर परिवर्तन तथा अन्य व्यक्तिगत कारणों से घर से अलगाव की ओर बढ़ते हैं। हालांकि पुलिस और परिवारों का कहना है कि कुल गायब लोगों में से लगभग 60-70 % लोग कुछ समय बाद स्वयं या पुलिस की तलाश में वापस मिल जाते हैं, कुछ को पुलिस सुरक्षित बरामद कर लेती है, लेकिन लगभग 5 % लोग हादसे, आत्महत्या या अन्य दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में फँस जाते हैं, जिनमें अधिकांश मामलों में पहचान मुश्किल हो जाती है।
राजस्थान पुलिस और स्थानीय प्रशासन यह मानते हैं कि मिसिंग पर्सन के मामलों के पीछे केवल प्रेम-प्रसंग या आपसी सहमति की स्थिति नहीं है, बल्कि इसके पीछे सामाजिक सहयोग, घरेलू तनाव, आर्थिक असुरक्षा, मनोवैज्ञानिक दबाव, तकनीकी-सामाजिक बदलाव जैसे कई जटिल कारण भी हैं, जिन पर गहराई से अध्ययन और संवाद की आवश्यकता है। यह प्रवृत्ति परिवारों में चिंता, अनिश्चितता और भय को जन्म देती है, जहाँ कोई भी सदस्य अचानक गायब हो सकता है और घर-परिवार में स्थायी रूप से अशांति फैल सकती है।
अधिकारियों ने कहा है कि राज्य में मिसिंग मामलों पर तुरंत कार्रवाई, परिजनों से संवाद, और समुदाय-आधारित जागरूकता आवश्यक है ताकि ऐसे मामलों को समय रहते समाधान मिल सके और परिवारों को मानसिक राहत प्रदान की जा सके। साथ ही सामाजिक संरचना में परिवर्तन, युवा मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा-संवाद और सुरक्षा उपायों पर भी जोर देने की आवश्यकता है, जिससे राजस्थान में “गुमशुदा” प्रकरणों की बढ़ती वृद्धि को रोका जा सके और हर बच्चे, युवती या व्यक्ति का सुरक्षित घर वापस लौटना सुनिश्चित किया जा सके।
खास बातें:
* राजस्थान में सालाना लगभग 34,000 लोग गुमशुदा होते हैं।
* रोज़ाना लगभग 93 लोग गायब हो रहे हैं।
* गायब लोगों में 76 % महिलाएं हैं।
* 18-30 वर्ष की उम्र के युवा एवं नाबालिग भी बड़ी संख्या में शामिल हैं।
* लगभग 60-70 % लोग कुछ समय बाद सुरक्षित मिल जाते हैं।
ऐसे आंकड़े यह बताते हैं कि राजस्थान में “गुमशुदा मामलों” की समस्या अब सिर्फ़ एक आंकड़ा नहीं, हर परिवार की खोई हुई पहचान, दर्द और चिंता की तस्वीर बन चुकी है, जिसके सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और प्रशासनिक हल ढूँढने की ज़रूरत है।




