एबीसी डेस्क 2 दिसंबर 2025
भारत की राष्ट्रीय राजनीति में इन दिनों एक ऐसी प्रवृत्ति तेज़ी से उभर रही है, जो विपक्षी दलों के लिए आत्मघाती साबित हो रही है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस लगातार उन बयानों, बेमतलब के शोर और उकसावे वाली टिप्पणियों का जवाब देने में ऊर्जा खर्च कर रही है, जो सत्ता पक्ष की ओर से राजनीतिक रणनीति के रूप में जानबूझकर उछाले जाते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरी प्रक्रिया कांग्रेस को उस “गलत पिच” पर ले जाती है, जहाँ बहस का स्वरूप बदल जाता है और विपक्ष अनजाने में उन्हीं मुद्दों पर उलझ जाता है, जिन्हें उछालकर सत्ताधारी पक्ष फायदा उठाता है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर कब कांग्रेस इन दांवों को समझ पाएगी, और कब वह असली राष्ट्रीय मुद्दों पर विमर्श खड़ा करने की दिशा में खुद को संगठित करेगी?
प्रतिक्रियाओं की राजनीति: कांग्रेस को खींचकर ले जाया जा रहा है सांप्रदायिक दलदल में
सत्ता पक्ष की राजनीतिक भाषा, उत्तेजक बयान और सांप्रदायिक रूपकों का इस्तेमाल अक्सर राजनैतिक विमर्श को भावनात्मक दिशा में ले जाने के लिए किया जाता है। यह रणनीति 2002 के बाद से बार–बार दोहराई जा रही है और वर्तमान परिदृश्य में यह और भी परिष्कृत रूप में सामने आई है। आरोप है कि जानबूझकर दिए गए बयानों पर कांग्रेस तीखी प्रतिक्रिया देती है, और इसी प्रतिक्रिया में वह उन वास्तविक मुद्दों से भटक जाती है, जिन पर उसकी पकड़ मजबूत हो सकती है। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह वही जमीन है जहाँ “अनुभवसंपन्न” सत्तापक्ष विपक्ष को बार–बार मात देता है—विवाद को हिंदू–मुस्लिम बहस में बदलकर, और गंभीर राष्ट्रीय प्रश्नों को हाशिये पर धकेलकर।
असली मुद्दे गायब: 28 गंभीर सवाल जिन पर जवाब देने से सत्ता बच रही है
विपक्ष की ऊर्जा सोशल मीडिया के बयानबाजी वाले शोर में फंसती जा रही है, जबकि देश 28 ऐसे गंभीर राष्ट्रीय प्रश्नों से जूझ रहा है जिनका सीधा संबंध सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, लोकतंत्र, संविधान, संघवाद, संस्थागत स्वतंत्रता, मीडिया की आज़ादी और सामाजिक सामंजस्य से है। विशेषज्ञों के अनुसार ये वे बिंदु हैं जिन पर सरकार से कड़े सवाल पूछे जाने चाहिए, लेकिन कांग्रेस इसके बजाय उन मुद्दों पर बहस में उलझ जाती है जहां वास्तविक राजनीतिक लाभ सिर्फ सत्ताधारी पक्ष को मिलता है।
इन गंभीर सवालों में अमेरिका–प्रेरित युद्धविराम पर भारत की संप्रभुता का सवाल, पहलगाम त्रासदी के दोषियों की गिरफ्तारी का अभाव, बोथ–लेवल ऑफिसर्स (BLO) की मौतें, वोट चोरी और SIR (Systematic Influence Regulation) विवाद, चुनाव आयोग के शीर्ष अधिकारियों पर राजनीतिक पक्षधरता के आरोप, मणिपुर में हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघन, बुलडोज़र न्याय, आरएसएस कार्यालयों का तेजी से बढ़ता नेटवर्क, भारत की विदेश नीति पर उठे गंभीर प्रश्न, IMF द्वारा भारत की GDP रिपोर्टिंग पर की गई आलोचना, एप्सटीन फाइलों में एक केंद्रीय मंत्री का कथित उल्लेख, मरकडवाड़ी चुनाव का “हाइजैक”, भारतीय शिक्षाविदों और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी, ट्रंप द्वारा प्रधानमंत्री मोदी के दावों का खंडन, भारतीय सशस्त्र बलों का राजनीतिकरण, शिक्षा, बेरोज़गारी, भारतीय मीडिया की हालत, पर्यावरण संकट, प्राकृतिक संसाधनों का कॉर्पोरेट कब्ज़ा, संघवाद पर खतरे, राज्यपाल संस्था के दुरुपयोग, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, ED–CBI की राजनीतिक हथियारबंदी, चीन द्वारा भारतीय भूमि कब्ज़ा, और साध्वी प्रज्ञा–कर्नल पुरोहित की रिहाई में हुई न्यायिक विसंगतियाँ शामिल हैं।
जब देश जूझ रहा है राष्ट्रीय–सुरक्षा और लोकतांत्रिक संकट से, कांग्रेस उलझी है बयानबाज़ी में
राजनीतिक विश्लेषक चेतावनी देते हैं कि भारत के सामने आज बहुआयामी संकट मौजूद है—आंतरिक सुरक्षा से लेकर सीमाई अतिक्रमण तक, बेरोज़गारी से लेकर लोकतांत्रिक संस्थाओं की सेहत तक, और सामाजिक सौहार्द से लेकर प्रेस की आज़ादी तक। यह वे मुद्दे हैं जो किसी भी लोकतंत्र की असली धुरी होते हैं। लेकिन विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, अक्सर सोशल मीडिया की गति में प्रतिक्रियाशील हो जाती है और मुद्दा–प्रेरित राजनीति की जगह प्रतिक्रिया–आधारित राजनीति करने लगती है। इसका परिणाम यह होता है कि जिन विषयों पर सरकार असहज होती है, वे विषय राष्ट्रीय चर्चा में पीछे चले जाते हैं और बहस भावनात्मक टिप्पणियों तक सिमट जाती है।
सत्ता की रणनीति सफल: विपक्ष को मुद्दों से भटकाकर चुनावी कथा को नियंत्रित करना
राजनीतिक रणनीतिकारों का मानना है कि कांग्रेस का बार–बार उकसावे में आकर प्रतिक्रिया देना, दरअसल सत्ता पक्ष की एक दीर्घकालिक रणनीति को मजबूत करता है। जब विपक्ष भावनात्मक बहस में व्यस्त रहता है, तब वास्तविक शासन संबंधी प्रश्न, जवाबदेही, नीतिगत कमियाँ और संवैधानिक मुद्दे सार्वजनिक चर्चा से गायब हो जाते हैं। यही वह सूक्ष्म तंत्र है जो राजनीतिक कथा को नियंत्रित करने में सत्ताधारी दल की मदद करता है और विपक्ष को लगातार मजबूत मुद्दों से दूर रखता है।
विपक्ष को बदलनी होगी रणनीति: मुद्दों की पिच पर लाना होगा मुकाबला
विशेषज्ञों का सुझाव है कि कांग्रेस को हर छोटे–मोटे बयान पर प्रतिक्रिया देने से बचना चाहिए, और राजनीतिक मुकाबला वास्तविक शासन–संबंधी मुद्दों की पिच पर लाना चाहिए। सामाजिक मीडिया पर होने वाली तकरार को SM एक्टिविस्टों और कंटेंट क्रिएटर्स पर छोड़ा जा सकता है, जबकि राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को गंभीर विषयों पर संगठित विमर्श खड़ा करना होगा—चाहे वह बेरोज़गारी हो, सीमाई सुरक्षा हो, शिक्षा और स्वास्थ्य हो, या लोकतांत्रिक संस्थाओं का क्षरण। यही वह स्थान है जहाँ सत्ता पक्ष के उत्तर सबसे कमजोर हैं और जहाँ विपक्ष के पास नैतिक, राजनीतिक और बौद्धिक शक्ति मौजूद है।
कांग्रेस को रिएक्टिव नहीं, प्रॉएक्टिव राजनीति करनी होगी
आज का राजनीतिक परिदृश्य बेहद जटिल, शोर–गुल से भरा और रणनीति–निर्भर है। इस माहौल में विपक्ष को हर उकसावे पर प्रतिक्रिया देना छोड़कर अपने कदम सोच–समझकर बढ़ाने होंगे। देश के सामने मौजूद 28 गंभीर मुद्दे सिर्फ कांग्रेस के लिए नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के लिए चुनौती हैं। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर विपक्ष ने इन मुद्दों पर केंद्रित राष्ट्रीय विमर्श तैयार नहीं किया, तो आने वाले वर्षों में लोकतांत्रिक संस्थाओं, सामाजिक सामंजस्य और संवैधानिक संरचना पर गहरे प्रभाव पड़ सकते हैं। कांग्रेस कब सीखेगी? यह प्रश्न अब सिर्फ पार्टी तक सीमित नहीं—यह पूरे राष्ट्र के भविष्य से जुड़ा हुआ है।




