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14 दिन में 17 मौतें—SIR के खौफ ने ली गरीबों की जान?

कोलकाता / नई दिल्ली 10 नवंबर 2025

TMC का BJP और चुनाव आयोग पर सीधा आरोप: मौतों का बोझ तुम्हारे सिर पर

पश्चिम बंगाल की राजनीति अचानक उबल पड़ी है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर एक गंभीर और हृदयविदारक आरोप लगाया है—कि SIR (State Identification Register) के नाम पर फैलाई जा रही दहशत ने 14 दिनों में 17 गरीब और वंचित नागरिकों की जान ले ली। TMC सांसद डेरेक ओ’ब्रायन और सांसद सागरिका घोष ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर मौतों की सूची जारी करते हुए दावा किया कि यह “प्रशासनिक दहशत का सीधा परिणाम” है। उन्होंने कहा कि गरीब, बुजुर्ग, दलित, अल्पसंख्यक और हाशिए पर खड़े लोग पहचान खोने, मताधिकार छिन जाने और सरकारी लाभ कटने के डर से मानसिक तनाव में टूटते गए—और आखिरकार मौत ने उन्हें घेर लिया।

जारी की गई सूची में 28 अक्टूबर से 7 नवंबर तक की 17 मौतें दर्ज हैं—जिनमें सबसे कम उम्र के मृतक मात्र 28 वर्ष के जहिर माल हैं, जबकि सबसे बुज़ुर्ग 95 वर्ष के क्षितीश मजुमदार हैं। ये मौतें एक-दो जिलों की नहीं, बल्कि उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, मुर्शिदाबाद, जलपाईगुड़ी, हावड़ा, हुगली, पुरबा बर्धमान और बिर्भूम तक फैली हुई हैं। यह व्यापक भौगोलिक फैलाव इस बात का संकेत है कि #SIR से जुड़ी दहशत कोई स्थानीय मुद्दा नहीं, बल्कि राज्यभर में सबसे कमजोर वर्गों के बीच फैले असुरक्षा भाव का परिणाम है।

TMC का आरोप बेहद तीखा है। पार्टी का कहना है कि चुनाव आयोग और बीजेपी मिलकर एक ऐसा माहौल बना रहे हैं जहाँ गरीबों, अल्पसंख्यकों और वंचित समुदायों को यह डर दिखाया जा रहा है कि अगर उनके दस्तावेज़ ‘ठीक’ नहीं हुए, तो उन्हें मतदाता सूची से बाहर कर दिया जाएगा, सरकारी योजनाओं से काट दिया जाएगा या पहचान खो देंगे। डेरेक ओ’ब्रायन ने कहा—“ये मौतें संयोग नहीं हैं, यह प्रशासनिक आतंक का असर है। और जितनी भी जानें गई हैं, उनका बोझ भाजपा और चुनाव आयोग के सिर है।”

TMC सांसद सागरिका घोष ने भी इस मुद्दे पर गुस्सा प्रकट करते हुए कहा कि यह स्थिति लोकतांत्रिक भारत के लिए शर्मनाक है। उन्होंने लिखा—“यह देश सबसे गरीब और सबसे कमजोर नागरिकों की मौतें नहीं देख सकता, वह भी इसलिए क्योंकि सरकार और संस्थाएँ उन्हें धमकाने और डराने में लगी हैं। यह सिर्फ राजनीति नहीं, मानवता का मुद्दा है।” TMC ने साफ कहा कि वे “एक भी नागरिक को disenfranchise नहीं होने देंगे”, चाहे केंद्र से कितना भी दबाव क्यों न आए।

राजनीतिक विश्लेषक इस मामले को बेहद गंभीर मान रहे हैं। उनका कहना है कि पहचान-पंजीकरण जैसे प्रशासनिक कदम का उद्देश्य नागरिकों को सुरक्षा देना होना चाहिए, डर नहीं। लेकिन यदि इसे राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाए और इसका असर मानसिक तनाव और मौतों के रूप में सामने आए, तो यह सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे की विफलता है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है—क्या ये मौतें वास्तव में #SIR के डर से जुड़ी हैं? क्या सरकारी कार्रवाई या संदेश-तंत्र इतना डर फैलाने वाला था कि लोग आत्महत्या, सदमे या तनाव से मौत की कगार पर चले गए? और सबसे गंभीर प्रश्न—क्या राज्य और केंद्र ऐसी मौतों की जवाबदेही लेने को तैयार होंगे? TMC का दावा है कि वे इन मुद्दों को संसद से लेकर सड़कों तक उठाएँगे और “किसी भी नागरिक को राज्यहीन, अधिकार-विहीन या पहचान से वंचित नहीं होने देंगे।”

पश्चिम बंगाल में यह मुद्दा आगे आने वाले दिनों में एक बड़ा राजनीतिक विस्फोट साबित हो सकता है—क्योंकि यहाँ मामला सिर्फ 17 मौतों का नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे में फैलती दहशत, अविश्वास और सत्ता बनाम जनता की लड़ाई का है।

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