[the_ad id="179"]
Home » Blog » 13.37 करोड़ नाम बाहर, वोट के अधिकार पर बड़ा सवाल; SIR को लेकर चुनाव आयोग की जवाबदेही कटघरे में

13.37 करोड़ नाम बाहर, वोट के अधिकार पर बड़ा सवाल; SIR को लेकर चुनाव आयोग की जवाबदेही कटघरे में

राष्ट्रीय/ चुनाव | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 28 सितंबर 2026

देश की Electoral Roll में Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर अब सवाल सिर्फ मतदाता सूची को साफ करने का नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल सीधे नागरिक के वोट देने के अधिकार तक पहुंच गया है। चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया के तहत 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से करीब 13.37 करोड़ नाम बाहर हो चुके हैं। Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक Delhi में करीब 32.8% और Maharashtra में करीब 21.1% नाम मौजूदा सूची की तुलना में ड्राफ्ट सूची में नहीं पहुंचे। इतनी बड़ी संख्या में नामों का ड्राफ्ट Electoral Roll से बाहर होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि सभी 13.37 करोड़ पात्र मतदाताओं को अवैध तरीके से वोट से वंचित कर दिया गया है, क्योंकि इनमें मृत, स्थायी रूप से स्थानांतरित, डुप्लीकेट और अन्य कारणों से चिन्हित नाम भी हो सकते हैं तथा दावे और आपत्तियों के जरिए नाम वापस जोड़ने की प्रक्रिया मौजूद है। लेकिन लोकतंत्र में सवाल यह है कि जब संख्या करोड़ों में हो, तो हर नाम के पीछे कारण क्या है, उस कारण की जांच कैसे हुई और एक पात्र नागरिक को अपना नाम वापस मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ रही है।

मतदाता सूची किसी सामान्य सरकारी रिकॉर्ड का नाम नहीं है। यही वह सूची है जो तय करती है कि चुनाव के दिन कौन व्यक्ति मतदान केंद्र तक जाकर अपने प्रतिनिधि को चुन सकेगा। इसलिए किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हट जाना केवल प्रशासनिक गलती नहीं रह जाता, उसका सीधा असर उसके लोकतांत्रिक अधिकार पर पड़ सकता है। चुनाव आयोग के पास Electoral Roll के पुनरीक्षण का अधिकार है और सुप्रीम कोर्ट ने भी Bihar में SIR की वैधानिकता पर विचार करते हुए आयोग की शक्तियों को Representation of the People Act, 1950 की Section 21(3) और संविधान के Article 324 से जोड़ा था। लेकिन किसी संस्था के पास अधिकार होना और उस अधिकार का इस्तेमाल पारदर्शी, निष्पक्ष और नागरिकों के अधिकारों की पर्याप्त सुरक्षा के साथ होना—दो अलग-अलग बातें हैं। यही वह जगह है जहां SIR को लेकर सबसे गंभीर सार्वजनिक सवाल खड़े हो रहे हैं।

13.37 करोड़ नामों का आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इतनी बड़ी संख्या को केवल “रिकॉर्ड की सफाई” कहकर आगे नहीं बढ़ा जा सकता। आयोग को सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि इन नामों में कितने मृत मतदाता थे, कितने स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके थे, कितने डुप्लीकेट थे, कितने मतदाता घर पर उपलब्ध नहीं मिले और कितने मामलों में “Absent”, “Shifted”, “Dead” या “Duplicate” जैसी श्रेणियां स्थानीय स्तर की जांच के आधार पर लगाई गईं। Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार SIR के दौरान “Absent” और “Shifted” बड़ी श्रेणियों में रहे हैं और इन वर्गीकरणों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। अगर कोई नागरिक दशकों से उसी जगह रह रहा है, मतदान करता रहा है और अचानक उसकी प्रविष्टि ड्राफ्ट सूची में नहीं मिलती, तो उसे केवल यह कह देना कि दावा दाखिल कर दीजिए, पूरे सवाल का जवाब नहीं हो सकता। नागरिक को यह जानने का अधिकार है कि उसका नाम किस आधार पर हटाया गया और उस निर्णय की जांच किस अधिकारी ने की।

Delhi का मामला इस बहस को और गंभीर बनाता है। यहां SIR से पहले करीब 1.45 करोड़ मतदाता थे, जबकि 31 अगस्त को प्रकाशित ड्राफ्ट सूची में करीब 97.5 लाख नाम दिखाई दिए और लगभग 47.7 लाख नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं पहुंचे। बाद में ऐसे लोगों के लिए Form-6 के जरिए नाम शामिल कराने और दस्तावेज देने की व्यवस्था रखी गई। लेकिन जब किसी शहर की लगभग एक-तिहाई मतदाता आबादी ड्राफ्ट सूची में दिखाई न दे, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्रक्रिया की पहुंच और नागरिकों की जानकारी कितनी प्रभावी रही। यही वजह है कि Delhi में SIR की समयसीमा भी कई बार बदली गई और 27 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार अंतिम Electoral Roll प्रकाशित करने की तारीख एक महीने आगे बढ़ाई गई, ताकि लोगों को नए नामांकन और claims तथा objections दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय मिल सके।

SIR को लेकर विवाद का एक और गंभीर पहलू Election Commission के भीतर सामने आए कथित मतभेद हैं। Indian Express की एक जांच के अनुसार Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu और Vivek Joshi ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ कदमों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में मतदाता नाम जोड़ने, नाम हटाने और SIR से जुड़े फैसलों को लेकर उनके मतभेदों का उल्लेख किया गया है। यदि किसी संवैधानिक संस्था के भीतर ही महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं को लेकर औपचारिक असहमति सामने आती है, तो नागरिकों का यह जानना और भी जरूरी हो जाता है कि निर्णय किस आधार पर लिए गए, कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई और आपत्तियों का निपटारा किस तरह हुआ।

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लोकतंत्र में मतदाता को अपने वोट के लिए किसी राजनीतिक दल का एहसान नहीं चाहिए। वोट नागरिक का संवैधानिक और कानूनी चुनावी अधिकार है, जिसे Electoral Roll की प्रक्रिया के जरिए व्यावहारिक रूप मिलता है। किसी भी संस्था को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अपात्र नाम हटाने की कोशिश में पात्र नागरिकों के नाम अनावश्यक रूप से बाहर न रह जाएं। यदि किसी नागरिक का नाम गलती से हट गया है, तो उसे वापस जोड़ने की प्रक्रिया इतनी आसान, स्पष्ट और समयबद्ध होनी चाहिए कि कोई गरीब, बुजुर्ग, मजदूर, महिला, प्रवासी या कम डिजिटल सुविधा वाला नागरिक केवल प्रक्रिया की जटिलता के कारण अपने मतदान अधिकार से बाहर न रह जाए।

इसलिए SIR पर असली सवाल यह नहीं है कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची संशोधित करने का अधिकार है या नहीं। असली सवाल यह है कि 13.37 करोड़ नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर क्यों हुए, उनमें कितने वास्तविक रूप से अपात्र थे, कितने पात्र मतदाताओं के नाम वापस जोड़े गए और कितने नागरिक प्रक्रिया तक पहुंच ही नहीं पाए। यही आंकड़े बताएंगे कि SIR ने मतदाता सूची को कितना सुधारा और कहीं प्रक्रिया ने अनजाने में पात्र नागरिकों को तो नुकसान नहीं पहुंचाया। लोकतंत्र में चुनाव की विश्वसनीयता केवल EVM या मतदान केंद्र से तय नहीं होती; उसकी पहली सीढ़ी एक ऐसी मतदाता सूची है जिसमें पात्र नागरिक का नाम सुरक्षित हो। इसलिए 13.37 करोड़ नामों का सवाल केवल आंकड़ों का सवाल नहीं है—यह मताधिकार, पारदर्शिता और चुनाव आयोग की जवाबदेही का सवाल है। आयोग के पास अधिकार जरूर है, लेकिन उस अधिकार के इस्तेमाल पर जनता सवाल पूछ सकती है और जवाब मांग सकती है। यही लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी शर्त है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *