एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली
JNU फिर निशाने पर: लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार सामूहिक निष्कासन
देश के श्रेष्ठतम उच्च-शिक्षण संस्थानों में शुमार Jawaharlal Nehru University (JNU) एक बार फिर सत्ता और प्रशासनिक दमन का शिकार बनती दिखाई दे रही है। विश्वविद्यालय के इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब JNUSU के सभी निर्वाचित मुख्य पदाधिकारी—अध्यक्ष, सचिव, उपाध्यक्ष और संयुक्त सचिव—के साथ-साथ एक पूर्व अध्यक्ष को भी दो सेमेस्टर के लिए निष्कासित कर दिया गया है। केवल निष्कासन ही नहीं, बल्कि प्रत्येक पर 20,000 रुपये का भारी जुर्माना भी लगाया गया है, जबकि कुछ अन्य छात्रों पर 19,000 रुपये तक का फाइन थोपा गया है। यह फैसला अपने आप में अभूतपूर्व है और इसे छात्र राजनीति नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सीधा हमला माना जा रहा है।
बिना ठोस आधार के कार्रवाई: छात्रों और शिक्षकों में गुस्सा
इस फैसले के बाद पूरे कैंपस में गुस्से और बेचैनी का माहौल है। छात्रों, शिक्षकों और शिक्षाविदों का कहना है कि यह निर्णय न तो किसी ठोस सबूत पर आधारित है और न ही किसी न्यायपूर्ण प्रक्रिया का पालन करता है। आलोचकों के मुताबिक यह कार्रवाई जितनी क्रूरतापूर्ण है, उतनी ही अविवेकपूर्ण भी है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या निर्वाचित छात्र प्रतिनिधियों को इस तरह सामूहिक रूप से दंडित करना विश्वविद्यालय की लोकतांत्रिक परंपरा के अनुरूप है, या फिर यह एक सोची-समझी राजनीतिक सज़ा है।
फेसियल रिकग्निशन का विरोध: निगरानी के ख़िलाफ़ आवाज़
प्रशासन ने इस कठोर कार्रवाई को नवंबर 2025 की एक घटना से जोड़ते हुए उसका औचित्य साबित करने की कोशिश की है। उस दौरान डॉ. बी. आर. अंबेडकर केंद्रीय पुस्तकालय में फेसियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी आधारित उपकरण लगाए जाने का छात्रों ने विरोध किया था। छात्रों का तर्क बिल्कुल स्पष्ट था—जब पहचान पत्र के ज़रिए प्रवेश की पहले से मज़बूत व्यवस्था मौजूद है, तो फिर विश्वविद्यालय परिसर में खुफिया निगरानी जैसे उपकरण लगाने की क्या ज़रूरत है? छात्रों ने इसे अकादमिक आज़ादी और निजता पर हमला बताया।
तोड़फोड़ का आरोप बनाम छात्रों का प्रतिवाद
प्रशासन का दावा है कि विरोध के दौरान तोड़फोड़ हुई, लेकिन छात्रों ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि विरोध पूरी तरह शांतिपूर्ण था और निगरानी-आधारित व्यवस्था के ख़िलाफ़ लोकतांत्रिक असहमति का हिस्सा था। छात्रों के मुताबिक असली समस्या तो यह है कि अब सवाल पूछना और असहमति जताना ही अपराध बना दिया गया है, खासकर तब जब वह सत्ता और प्रशासन की नीतियों के ख़िलाफ़ हो।
छात्रसंघ की वैचारिक सक्रियता: शासन को क्यों चुभी?
नवनिर्वाचित छात्रसंघ के पदाधिकारी केवल इस मुद्दे तक सीमित नहीं रहे। वे कैंपस और कैंपस के बाहर कई अहम सवालों पर सक्रिय नज़र आए। उन्होंने UGC Equity Regulation के तहत SC, ST, OBC, दिव्यांग और महिला छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और इसके प्रभावी क्रियान्वयन की मांग की। इतना ही नहीं, छात्रसंघ ने यह भी कहा कि कैंपसों में संस्थागत भेदभाव को खत्म करने के लिए रोहिता वेमुला (ड्राफ्ट) कानून की तर्ज़ पर एक ठोस और राष्ट्रीय स्तर का कानून बनाया जाना चाहिए।
सत्ता की नाराज़गी और ‘दंडात्मक कार्रवाई’
सूत्रों का कहना है कि छात्रसंघ की यही सामाजिक-वैचारिक सक्रियता और खुली आलोचना शासन और प्रशासन को सबसे ज़्यादा नागवार गुज़री। माना जा रहा है कि फेसियल रिकग्निशन विरोध महज़ एक बहाना है, जबकि असली वजह छात्रसंघ की वह राजनीति है जो सामाजिक न्याय, समानता और लोकतांत्रिक अधिकारों की बात करती है। इसी नाराज़गी का नतीजा अब निष्कासन और आर्थिक दंड के रूप में सामने आया है।
किन छात्रों को बनाया गया निशाना
इस कार्रवाई के तहत JNUSU अध्यक्ष अदिति मिश्रा, सचिव सुनील यादव, उपाध्यक्ष गोपिका बाबू, संयुक्त सचिव दानिश अली और पूर्व अध्यक्ष नीतीश कुमार को दो सेमेस्टर के लिए निष्कासित कर दिया गया है। सभी के परिसर में प्रवेश पर रोक लगा दी गई है और प्रत्येक से 20,000 रुपये का जुर्माना वसूला जा रहा है। छात्र समुदाय का कहना है कि यह सिर्फ़ पाँच नाम नहीं हैं, बल्कि पूरे छात्र आंदोलन को डराने की कोशिश है।
लोकतांत्रिक विश्वविद्यालय पर बड़ा सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बुनियादी और बेहद गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है— क्या सरकार JNU को बर्बाद कर के ही मानेगी? क्या संघी–बीजेपी मानसिकता को आलोचनात्मक सोच, असहमति और बहस से इतनी परेशानी है कि वह देश के सबसे जीवंत विश्वविद्यालय परिसरों को भी अनुशासन के नाम पर कुचल देना चाहती है?
उच्च शिक्षा का भविष्य और डरावनी मिसाल
शिक्षाविदों का कहना है कि विश्वविद्यालयों की असली पहचान सवाल पूछने, सत्ता को चुनौती देने और नए विचार गढ़ने से होती है। यदि निर्वाचित छात्र प्रतिनिधियों को इस तरह दंडित किया जाएगा, तो यह न सिर्फ़ JNU बल्कि पूरे भारतीय उच्च-शिक्षा तंत्र के लिए एक ख़तरनाक मिसाल बनेगा। खासकर तब, जब दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले इस देश का कोई भी विश्वविद्यालय वैश्विक शीर्ष 100 संस्थानों में शामिल नहीं है।
आख़िरकार सवाल यही है— क्या शैक्षणिक उत्कृष्टता आलोचनात्मक सोच को कुचल कर हासिल की जाएगी, या फिर लोकतंत्र और असहमति के सम्मान से?




