एबीसी नेशनल न्यूज | लखनऊ | 13 फरवरी 2026
बड़ा बंगला या बड़ा संदेश? चुनावी मौसम में गरमाई राजधानी की राजनीति
उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव से पहले एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है जिसने सियासी तापमान अचानक बढ़ा दिया है। बहुजन समाज पार्टी (BSP) की राष्ट्रीय अध्यक्ष Mayawati को राजधानी लखनऊ में बड़ा सरकारी बंगला आवंटित किए जाने की खबर ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। विपक्ष इसे महज प्रशासनिक फैसला मानने को तैयार नहीं है। सवाल उठ रहा है कि जब चुनावी बिसात बिछ चुकी है, तब यह फैसला क्या केवल नियमों के तहत हुआ कदम है या इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक रणनीति काम कर रही है? लखनऊ की सियासत में यह चर्चा जोरों पर है कि इस आवंटन के समय और परिस्थितियां खुद में कई संकेत समेटे हुए हैं।
‘दुश्मन नंबर 1’ बयान से तेज हुई टकराहट की राजनीति
इसी बीच BSP सुप्रीमो ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष Akhilesh Yadav पर तीखा हमला बोलते हुए उन्हें अपना “दुश्मन नंबर 1” करार दिया। यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि सीधी रणनीतिक घोषणा माना जा रहा है। यूपी की राजनीति में दलित और पिछड़ा वर्ग का समीकरण हमेशा सत्ता की कुंजी रहा है। ऐसे में मायावती का यह रुख साफ संकेत देता है कि उनका मुख्य मुकाबला बीजेपी से ज्यादा समाजवादी पार्टी से है। राजनीतिक विश्लेषक इसे विपक्षी एकजुटता पर सीधा प्रहार मान रहे हैं, क्योंकि इस बयान ने संभावित गठबंधन की संभावनाओं को लगभग समाप्त कर दिया है।
योगी से मुलाकात के बाद बदली हवा?
कुछ समय पहले मायावती की मुख्यमंत्री Yogi Adityanath से मुलाकात ने भी कई सवाल खड़े किए थे। उस मुलाकात के बाद उनके बयानों की धार में कुछ नरमी देखी गई। अब जब बड़ा बंगला आवंटित हुआ है, तो राजनीतिक हलकों में इन दोनों घटनाओं को जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि सरकार का कहना है कि सब कुछ नियमों के तहत हुआ है, लेकिन विपक्ष इसे “सियासी समीकरण” का हिस्सा बताने से नहीं चूक रहा। बीजेपी की ओर से आधिकारिक तौर पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन अंदरखाने चर्चाएं तेज हैं कि यह घटनाक्रम चुनावी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
क्या दोहराया जाएगा पुराना इतिहास?
यूपी की राजनीति में BSP और बीजेपी का साथ कोई नई बात नहीं है। 1995 और 2002 में दोनों दलों ने मिलकर सरकार बनाई थी और सत्ता का साझा प्रयोग किया था। हालांकि बाद में रास्ते अलग हो गए, लेकिन इतिहास की वह पृष्ठभूमि आज की परिस्थितियों को और रोचक बना देती है। सवाल उठ रहा है कि क्या इस बार भी सीधा या अप्रत्यक्ष सहयोग देखने को मिल सकता है? यदि BSP समाजवादी पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगाती है, तो इसका सीधा लाभ बीजेपी को मिलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
अकेले दम पर चुनाव या रणनीतिक दूरी?
BSP का आधिकारिक रुख स्पष्ट है कि पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी और किसी गठबंधन की कोई संभावना नहीं है। पार्टी नेतृत्व “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” की नीति को आगे बढ़ाने की बात कर रहा है। लेकिन राजनीतिक जानकार मानते हैं कि कई बार दूरी भी रणनीति का हिस्सा होती है। चुनावी गणित में हर दल अपने वोट प्रतिशत और सीटों के समीकरण को ध्यान में रखकर कदम बढ़ाता है। ऐसे में BSP का रुख बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है, भले ही औपचारिक गठबंधन न हो।
आगे क्या? नजरें मायावती की अगली चाल पर
उत्तर प्रदेश की राजनीति में हर फैसला दूरगामी असर डालता है। बड़ा बंगला, तीखे बयान और चुनावी मौसम—इन सबने मिलकर सियासी माहौल को और गरमा दिया है। अभी तक किसी औपचारिक गठबंधन की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन संकेतों की राजनीति अपने चरम पर है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में मायावती किस दिशा में अगला कदम उठाती हैं, क्योंकि यूपी की सत्ता की राह अक्सर छोटे-छोटे संकेतों से होकर गुजरती है।




