Home » Opinion » RSS का वर्चस्व क्यों नहीं टिकेगा

RSS का वर्चस्व क्यों नहीं टिकेगा

ओपिनियन | गुरदीप सिंह सप्पल, सदस्य कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 जुलाई 2026
·

सत्ता हथिया लेने वाले तानाशाह को एक बड़ी सुविधा हासिल हो जाती है: उसे अब किसी मुखौटे की ज़रूरत नहीं रहती। एक बार जब राज-काज की पूरी मशीनरी उसके कब्ज़े में आ जाती है, तो वह नैतिक, लोकतांत्रिक या निष्पक्ष दिखने का दिखावा छोड़ सकता है और बस राज कर सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), अधिनायकवाद में आस्था रखने के बावजूद, इस सुविधा का सुख कभी नहीं भोग पाया, और न ही कभी भोग पाएगा। वह हमेशा के लिए अपने ही अंतर्विरोधों के भीतर जीने को अभिशप्त है।

ये अंतर्विरोध अनगिनत हैं। संघ खुद को एक नैतिक शक्ति के रूप में पेश करता है, मगर हर राजनीतिक अनैतिकता का पालन भी करता है और उसे सही भी ठहराता है। वह भारतीय लोकतंत्र का पैरोकार होने का दावा करता है, मगर अनिर्वाचित लोगों के केंद्रीकृत नियंत्रण में यकीन रखता है। वह एक एकजुट हिंदू समाज की बात करता है, मगर चाहता है कि जाति-व्यवस्था बनी रहे और फले-फूले। वह खुद को हिंदू धर्म का रक्षक और अंतिम निर्णायक मानता है, मगर अपने ही कार्यकर्ताओं द्वारा मंदिरों के चढ़ावे को लुटने देता है। वह उस राष्ट्रीय एकता का वादा बार-बार करता है, जिसे वह अपने नफ़रत और विभाजन के अभियान के ज़रिए लगातार तोड़ता रहता है।

चाल, चरित्र और चेहरा

RSS के उपदेशों और कर्मों के बीच की यह खाई कोई संयोग नहीं है। उसके बुनियादी ढाँचे में एक बेसिक गड़बड़ है, जो अब उसकी कथनी और करनी के फ़र्क़ के कारण साफ़ दिखने लगी है। संघ हमेशा से दोमुँहापन के लिए जाना जाता है। ये दोमुँहापन उसे सत्ता के पायदान तक ले भी आया है। मगर अब यही उसके अंतर्विरोधों को उजागर भी कर रहा है। सत्ता पर आज उसकी पकड़ कितनी भी मज़बूत दिखे, लेकिन विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं।

RSS वह संगठन है जिसने अपनी पूरी पहचान चाल, चरित्र और चेहरे के नारे पर खड़ी की है। इसी के दम पर संघठन की ब्रांडिंग भी बढ़िया हुई और मार्केटिंग भी ज़ोरदार हुई। एक ऐसे संगठन की छवि गढ़ी गई, जो त्याग, ईमानदारी और नैतिक श्रेष्ठता का उपदेश भी देता है और उन पर अमल भी करता है।

संघ का वादा था कि वह राजनीति की अनैतिक सौदेबाज़ियों और राजनीतिक मजबूरियों से ऊपर उठेगा। मगर संघ ने जिस राजनीतिक दल बीजेपी को पाला-पोसा, वह आज भ्रष्टाचारियों को गले लगाने और राजनीतिक अनैतिकता को वैधता देने में सबसे आगे है। “वॉशिंग मशीन” आज बीजेपी की पहचान बन गई है। लेकिन RSS के किसी व्यक्ति को इस राजनैतिक पतन की आलोचना करते कभी नहीं सुना गया। संघ द्वारा इस ज़ुबानी निंदा तक नहीं हुई। नैतिकता के स्वघोषित पैरोकार सत्ता मिलते ही अनैतिकता के चैंपियन बन गए।

भ्रष्टाचार की यह सड़ांध सिर्फ राजनैतिक गलियारों तक नहीं है। ये उन गर्भगृहों तक भी पहुँच गई है, जिनकी रक्षा का दावा संघ करता रहा है। हिंदू मंदिरों के प्रबंधन को लेकर चोरी और वित्तीय अनियमितता के आरोप मँडरा रहे हैं, राम मंदिर के चढ़ावे से लेकर बद्रीनाथ और महाकालेश्वर की मंदिर – अर्थव्यवस्थाओं तक पर सवाल उठ रहे हैं। अपने चुनिंदा लोगों की देख रेख में मंदिरों के खज़ानों की संगठित लूट-खसोट पर RSS के भीतर न कोई नैतिक हिचकिचाहट दिखती है, न ही कोई सच्चा आक्रोश।

नैतिकता का मुखौटा तार-तार है, और उसके पीछे से जो चेहरा उभर रहा है, उसमें से लालच, छल और उसी ईश्वर के साथ धोखे की छवि उभर रही है, जिसमें विश्वास का दावा RSS की राजनीति का केंद्र बिंदु है।

स्वदेशी और सुचिता

यह दोहरापन सिर्फ राजनीति और मंदिरों तक सीमित नहीं है। दशकों तक संघ ने स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का उपदेश दिया, विदेशी और कॉर्पोरेट ताक़तों के मुक़ाबले छोटे भारतीय उत्पादक की सुरक्षा की दुहाई दी। मगर सत्ता में पूंजीवादी यार-दोस्तों गोद में ऐसे सब कुछ डाल दिया है, जैसा भारत ने शायद ही कभी देखा हो। टेंडर की शर्तें अक्सर पहले से तय दोस्तों के पक्ष में गढ़ी जाती हैं। IBC और NCLT कंपनियों को हड़पकर चंद चहेतों को सौंपने के औज़ार बन गए हैं। इनमें ज़्यादातर हिंदुओं की ही कंपनियों होती हैं, जो उनसे छीनी जा रही हैं। इस बीच स्वदेशी को कूड़ेदान में डाल दिया गया है और मैनुफैक्चरिंग को चीन को आउटसोर्स कर दिया गया है, और उसमें भी यार-दोस्त ही आयात के से भारी मुनाफ़ा कमा रहे हैं!

संघ के सबसे वफ़ादार समर्थकों में छोटे दुकानदार और व्यापारी रहे हैं। लेकिन उस तबके के लोगों को भी अब ये विश्वास नहीं रहा है कि वो ईमानदारी से कोई टेंडर पा सकते हैं। जिस आम हिंदू दुकानदार और व्यापारी के नाम पर RSS का पूरा साम्राज्य खड़ा किया गया, उसे छोटे-से-छोटे ठेकों से भी बेदखल कर दिया गया है। भाजपा के सबसे कट्टर समर्थक भी अब यह दावा नहीं करते कि किसी भी टेंडर की प्रक्रिया निष्पक्ष या ईमानदार है। जो संघ सुचिता का दावा करता था, वह अब बेहिचक एक भ्रष्ट तंत्र की सरपरस्ती कर रहा है। नए फ्लाईओवर ढह जाते हैं, नए एक्सप्रेसवे चटक जाते हैं, नए हवाई अड्डे टपकते हैं, नई पानी की टंकियाँ भ्रष्टाचार के बोझ तले भरभरा जाती हैं, और सुचिता के ध्वजवाहक इन सबको जायज़ ठहराने या उन पर पर्दा डालने के लिए नई-नई दलीलें गढ़ने में जुटे हैं।

सेवा परमो धर्म

फिर वह कसौटी है जो संघ ने खुद अपने लिए तय की, और जिस पर वह नाकाम रहा। सेवा परमो धर्म, यानी सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है, उसका मूल ध्येय-वाक्य था। ये उसके प्रचारकों को अविवाहित रह कर, चना-चबेना पर गुज़ारा करते संन्यासियों का सा आभामंडल देता था। एक कठोर सादगी भरा जीवन, जो संघ की पहचान बनाई गई। इन्हीं प्रचारकों के दम पर संघ डेढ़ सौ करोड़ भारतीयों का डीएनए बदलने के मिशन पर था। समाज में कठोर अनुशासन, सेवा, शुचिता भरने का मिशन।

मगर यह मिशन नाकाम रहा। इसलिए नहीं कि प्रचारक नाकाम हुए, बल्कि इसलिए कि संघ खुद इन तीन-एक हज़ार प्रचारकों तक का डीएनए नहीं बदल पाया। सादगी भरे जीवन की दशकों की ट्रेनिंग को सत्ता के कुछ ही सालों ने मटियामेट कर दिया। वे ऐशो-आराम और सत्ता की नज़दीकी के आदी हो गए हैं, और ईमानदारी के उनके कथित संकल्प चुपचाप हवा हो गए हैं। आज संघ का एक भी सचमुच गरीब, सादगी से जीने वाला कार्यकर्ता ढूँढना मुश्किल है। अगर संगठन अपने मुट्ठी भर चुने हुए प्रचारकों को गढ़े गए उस चरित्र पर क़ायम नहीं रख सका, जिसका वह उपदेश वो सबको देता है, तो एक पूरी सभ्यता नए सिरे से गढ़ने का उसका दावा निरर्थक है।

क़ानून का राज

RSS वाले “Iron Hand of Rule” के बड़े पैरोकार हैं। संघ हमेशा समाज को अनुशासित करने के लिए कठोर नियमों की माँग करता रहा; मगर सत्ता में आकर उसने ऐसा तंत्र खड़ा कर दिया है, जिसमें क़ानून के राज को ताक पर रख दिया है। संस्थाएँ मनमर्ज़ी की मालिक हैं। शर्त सिर्फ़ एक है। बीजेपी के आकाओं के इशारों पर बिना सवाल अमल करो, फिर बाक़ी जो चाहे वो करो। क़ानून अब अपने चहेतों के लिए हैं। हर नई संस्था शासन चलाने के बजाय नए नए ठेके पैदा करने के लिए गढ़ी जाती है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) इसकी मिसाल है: इसे संसद के प्रति जवाबदेह एक वैधानिक निकाय के रूप में नहीं, बल्कि एक “सोसाइटी” के रूप में बनाया गया। इसे सार्वजनिक ऑडिट से बाहर रखा गया, और इस तरह गढ़ा गया कि उसका हर अहम काम, चाहे पेपर बनाना हो, ट्रांसपोर्ट हो, एग्जाम सेंटर का आवंटन हो, पेपर की जांच हो या डेटा प्रबंधन हो, हर काम में निजी ठेके की गुंजाइश रहे। इतने संवेदनशील काम को ठेके पर देने का ही स्वाभाविक नतीजा है पेपर लीक! यही सिस्टम एथेनॉल-ब्लेंडिंग के नियमों, फास्टैग व्यवस्था, ई-रिक्शा योजनाओं, FCI के गोदामों के निजीकरण और हवाई अड्डों के विनिवेश तक, हर जगह दोहराया जाता है। हर नई नीति ठेकों की एक नई लाइन खोल देती है।

बौद्धिकता

बौद्धिकता एक और शब्द है जिसे संघ अपने विमर्श में बड़े चाव से उठाता है, और यहीं उसका विरोधाभास सबसे तीखा है। हक़ीक़त में RSS ने ज्ञान के ख़िलाफ़ जंग छेड़ रखी है। आम लिबरल समझ के विपरीत उसके नेता फ़ासीवादी नहीं हैं; हो ही नहीं सकते। बीसवीं सदी के फ़ासीवादी राज्यों ने ज़बरदस्त वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति को आगे बढ़ाया था, और उनकी ताक़त का बड़ा हिस्सा ज्ञान की देन था।

RSS ने भारत को ठीक उलटी दिशा में मोड़ा है, एक ऐसे अवैज्ञानिक समाज की ओर जो कल्पनाओं और अतीत के गौरव के सहारे जीता है। वह बौद्धिकता का गुणगान करता है, लेकिन असल में “हार्वर्ड बनाम हार्ड वर्क” वाले ताने के ज़रिए ज्ञान का उपहास उड़ाता है। बौद्धिकता – विरोधी यह माहौल अब विश्वविद्यालयों और संस्थानों, दोनों में पसरता जा रहा है।

संघ द्वारा स्वर्णिम अतीत का गुणगान भी एक विडंबना लिए हुए है: उसने प्राचीन भारत की असली वैज्ञानिक उपलब्धियों को कभी लोकप्रिय नहीं बनाया। आर्यभट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, भास्कर और उनके समकालीन, यानी वे असली गणितज्ञ-खगोलशास्त्री, जो भारतीय वैज्ञानिक विरासत के सबसे मज़बूत दावे हैं, संघ के लोक विमर्श में कहीं जगह नहीं पाते हैं। उन महान भारतीयों की उपलब्धियाँ तार्किक थी, इसीलिए उन्हें संघ के मनमाफिक मिथकों में नहीं ढाला जा सकता। जो संघठन अतीत की असली उपलब्धियों से आँख चुराता है, और भविष्य के लिए ज्ञान नहीं रचता, वह लंबे समय तक वर्चस्व नहीं बनाए रख सकता।

विश्वगुरु

और फिर है सबसे बड़ा दिखावा: भारत को विश्वगुरु, यानी एक वैश्विक महाशक्ति बनाने का दावा। हक़ीक़त यह है कि मोदी की मौजूदा विदेश नीति पब्लिक में शेखी बघारने में और असल व्यवहार में समर्पण की है। इतनी छाती ठोकने के बावजूद, RSS समर्थित सरकार में न तो ट्रंप – अमरीका के सामने तनकर खड़े होने की रीढ़ है, न ही चीन के सामने खड़े होने की। यह सरकार टैरिफ़, तानों और भारतीय बॉर्डर पर बेइज़्ज़ती को चुपचाप सहन करती रही, दावा करती रही कि न कोई आया, न गया! वॉशिंगटन के आँख दिखाते ही उसने ईरान और रूस जैसे पुराने दोस्तों को छोड़ दिया, और फिर दबे पाँव उन्हीं के पास लौट आई। संघ की जो विचारधारा दुनिया को राह दिखाने और उसका नेतृत्व करने का दावा करती थी, वह आख़िरकार इज़राइल को ही अपना राजनीतिक-रणनीतिक और दार्शनिक गुरु मानकर लगभग उसकी पूजा करने तक झुक गई है।

असली समस्या

संघ फँसा हुआ है। नैरेटिव पर लगभग पूर्ण नियंत्रण और नफ़रत के अनवरत प्रचार के बावजूद, अधिकांश भारतीय आज भी उसके एजेंडे को नकारते हैं। अल्पसंख्यकों को, जो देश के लगभग 20% हैं, एक तरफ़ रख दें, तब भी हर दूसरा हिंदू उसे वोट नहीं देता। जिस भारतीय को बारह साल से चल रहा नफ़रती प्रोपेगंडा ध्रुवीकृत नहीं कर सका है, उसके भविष्य में ध्रुवीकृत होने की संभावना कम ही है। साथ ही, जो भाजपा को वोट देते हैं, उनमें भी हर कोई उसके विभाजनकारी नज़रिए में यक़ीन नहीं रखता; लोग कई वजहों से वोट देते हैं।

यही RSS की असली समस्या है: वह अपना असली रंग कभी नहीं दिखा सकता, क्योंकि भारतीय जनमानस भी लोकतांत्रिक बना हुआ है, एक सहिष्णु, बहु-सांस्कृतिक, बहु-धार्मिक ताना-बाना, जिसका बहुमत आज भी एक राष्ट्र, एक भाषा, एक संस्कृति वाले उस तंग नज़रिए को ठुकरा रहा है।
इसलिए जहाँ एक तानाशाह बिना मुखौटे के राज कर सकता है, वहीं RSS को मुखौटा पहने रहना पड़ता है। लेकिन अब ये मुखौटा उसके चेहरे पर फ़िट नहीं बैठ रहा है। हर वॉशिंग-मशीन, हर भर्ती घोटाला, धाँधली वाला हर टेंडर, हर लीक हुआ पेपर, हर प्रचारक का नया ऐशो-आराम हर काटा गया जंगल, हर अनुत्तरित सवाल, संघ की कथनी और करनी के फ़र्क़ को और उजागर करता जा रहा है।

एक आख़िरी बात

RSS ने अपना लगभग पूरा साम्राज्य प्रभु राम के नाम पर खड़ा किया है।
सच है कि कांग्रेस ने भी, महात्मा गांधी के नेतृत्व में, राम राज्य की बात की थी; राम धुन गांधी की प्रार्थना सभाओं में गायी जाती थी; और भारत का संविधान में मूल अधिकारों के पृष्ठ पर राम और सीता का चित्र मौजूद है, जहाँ सबके लिए समान अधिकार, यानी सबके लिए राम राज्य की बात दर्ज है। मगर गांधी और कांग्रेस के लिए राम प्रभु की एक नैतिक मूरत थे, मर्यादा पुरुषोत्तम थे। गांधी-नेहरू युग की नैतिक राजनीति के आदर्श थे। प्रभु राम युद्ध-घोष नहीं थे, बदले का प्रतीक नहीं थे, जैसा संघ ने उन्हें बना दिया है।
संघ ने राम के नाम पर खूब जुनून भड़काया है। मगर उसकी नीयत राम नाम के दोहन की रही है। इसलिए जब राम मंदिर से वित्तीय लूट की कहानियाँ सामने आ रही हैं, तो मुखौटा उतर रहा है। जो लोग सचमुच प्रभु राम की आराधना करते हैं, वे स्तब्ध हैं।

संघ की नैतिकता का यह धीमा क्षरण है। इससे न तो सत्ता की ताक़त रोक सकती है, न ही प्रोपेगंडा। संघ का गढ़ अब भी खड़ा है, मगर भीतर से खोखला होता जा रहा है। अपनी ही कथनी और करनी के बीच की खाई से क्षरित हो रहा है, जिसे पाटा नहीं जा सकता। आख़िरकार, आरएसएस को सिर्फ़ वही लोग नहीं ढहायेंगे, जो उसका विरोध करते हैं, जो उसकी विचारधारा के ख़िलाफ़ हैं। उसे वह सच भी ढहाएगा, जो मुखौटे के पीछे छुपा है।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted