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ग्लोबल रैंकिंग से मोहभंग क्यों? दुनिया की शीर्ष यूनिवर्सिटियाँ अब कह रही हैं—हम नहीं खेलेंगे यह खेल

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मोहम्मद अखलाक  | नई दिल्ली 17 नवंबर 2025

वैश्विक उच्च शिक्षा में एक गहरी हलचल है, जो पहले धीमे सुर में शुरू हुई थी, लेकिन अब एक तेज़, आत्मविश्वासी और निर्णायक विरोध में बदल गई है। दुनिया की कई प्रमुख विश्वविद्यालय—फ्रांस की Sorbonne University से लेकर भारत के IITs तक—अब अंतरराष्ट्रीय शिक्षा रैंकिंग सिस्टम से बाहर निकलने का फैसला ले रही हैं। इन रैंकिंग्स को अक्सर “विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता का पैमाना” कहा जाता रहा है, लेकिन अब सवाल पूछे जा रहे हैं कि यह पैमाना कितना सही है? कितनी सटीकता से यह संस्थानों के सामाजिक योगदान, शोध-क्षमता और शैक्षणिक विविधता को पकड़ता है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या ये रैंकिंग्स शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य को कमजोर तो नहीं कर रही? यही वह विवाद है जिसने ‘ग्लोबल रैंकिंग्स’ को शिक्षाजगत की सबसे विवादित बहसों में बदल दिया है।

कहानी की शुरुआत वहाँ से होती है जहाँ ये रैंकिंग्स प्रतिष्ठा का सबसे बड़ा पैमाना मानी जाती थीं। Times Higher Education (THE), QS Rankings, ARWU—इन संस्थाओं द्वारा जारी तालिकाएँ न सिर्फ छात्रों की पसंद तय करती हैं, बल्कि सरकारों की नीति, विश्वविद्यालयों के बजट और शोध फंडिंग तक को प्रभावित करती हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इन रैंकिंग्स पर अविश्वास बढ़ा है। Sorbonne University ने सितंबर में THE World University Rankings से पूर्ण रूप से हटकर यह स्पष्ट कर दिया कि वे अब एक ऐसी वैश्विक प्रणाली का हिस्सा नहीं बनना चाहते जिसकी कार्यप्रणाली “अस्पष्ट, पक्षपाती और आंशिक” है। भारत के IIT-Delhi, IIT-Bombay, IIT-Madras, IIT-Kharagpur और IIT-Kanpur पहले ही 2020 में THE रैंकिंग्स से दूरी बना चुके हैं। उनका आरोप था कि रैंकिंग संस्था डेटा की पारदर्शिता नहीं देती—कौन सा मानक कैसे वज़न रखता है, किस डेटा का स्रोत क्या है, और किन आधारों पर विश्वविद्यालयों की तुलना की जाती है, यह सब पर्दे के पीछे छिपा रहता है।

यह विरोध सिर्फ प्रक्रिया की खामियों तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षा के दर्शन से जुड़ा है। दुनिया भर के कई शीर्ष अकादमिक वर्षों से यह कहते रहे हैं कि अनुसंधान का प्रभाव, समाज पर विश्वविद्यालयों का योगदान, सामाजिक विविधता, नवाचार की क्षमता और राष्ट्र निर्माण में भूमिका—ये सारी बातें एक ‘एकल स्कोर’ या ‘एकल रैंक’ में समा नहीं सकतीं। रैंकिंग सिस्टम संस्थानों को उन क्षेत्रों पर फोकस करने के लिए मजबूर कर देता है जहाँ स्कोर बढ़ेगा, न कि वहाँ जहाँ समाज को वास्तविक लाभ मिलेगा। कई बार विश्वविद्यालय “फंडिंग एट्रैक्शन”, “अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या”, “इंग्लिश में प्रकाशित शोध” जैसी पैरामीटरों पर रेटिंग सुधारने में सारी ऊर्जा लगा देते हैं, जबकि स्थानीय अनुसंधान, क्षेत्रीय नवाचार, सामाजिक मिशन और छात्र-पहुँच जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को कम प्राथमिकता दी जाती है। परिणाम—रैंकिंग तो बढ़ती है, लेकिन संस्थान अपने मूल उद्देश्यों से दूर होते जाते हैं।

एक और बड़ा आरोप इन वैश्विक रैंकिंग प्लेटफॉर्मों पर ‘बायस’ का है। कई एशियाई, लैटिन अमेरिकी और अफ्रीकी संस्थानों का कहना है कि ये उपाय पश्चिमी दुनिया की संवेदनाओं और पैमानों को प्राथमिकता देते हैं, जिससे विकसित देशों की विश्वविद्यालयों को हमेशा बढ़त मिलती है। वहीं कुछ रिपोर्ट्स बताती हैं कि रैंकिंग सुधारने के लिए कई विश्वविद्यालय डेटा में हेरफेर करते हैं, ‘फैकल्टी-स्टूडेंट रेशियो’ को कृत्रिम रूप से दर्शाते हैं, या शोध का उत्पादन बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हैं। इन आरोपों ने रैंकिंग्स की विश्वसनीयता को गहरे संकट में डाल दिया है। इसी वजह से दुनिया की कुछ प्रमुख यूनिवर्सिटियाँ कह रही हैं—अब बस! विज्ञान, समाज और शिक्षा को उस विधि से मापना गलत है जो मूल उद्देश्य से अधिक बाज़ार और ग्लैमर का खेल बन चुकी है।

भारत के संदर्भ में यह चर्चा और अधिक तीखी हो जाती है। भारतीय संस्थानों ने अपने अनुभव में पाया कि वैश्विक रैंकिंग प्रणाली भारतीय शैक्षिक संरचना, विविधता, भाषाई संदर्भ, ग्रामीण-शहरी असमानता और शोध क्षेत्र की जटिलता को समझे बिना स्कोर देती है। IITs का यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये वे संस्थान हैं जिनकी वैश्विक प्रतिष्ठा स्वयं इतनी मजबूत है कि उन्हें किसी रैंक की मोहर की आवश्यकता नहीं। उनकी यह दूरी दुनिया भर में संदेश भेजती है कि किसी भी विश्वविद्यालय की पहचान सिर्फ एक तालिका नहीं, बल्कि उसके छात्रों, उसकी शोध क्षमता और समाज में किए गए योगदान से तय होनी चाहिए।

इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल उठता है—क्या उच्च शिक्षा को मापने के बेहतर, अधिक मानवीय और अधिक वैज्ञानिक तरीके विकसित किए जा सकते हैं? रैंकिंग सिस्टम के समर्थक कहते हैं कि बिना रैंकिंग दुनिया की तुलना मुश्किल हो जाएगी। लेकिन इसके आलोचक मानते हैं कि शिक्षा को ‘नंबर’ में बांधना गलत है; और वैश्विक शैक्षिक संरचना की दिशा तभी सुधरेगी जब विश्वविद्यालय अपने मूल दर्शन—समाज की सेवा, जिज्ञासा आधारित अनुसंधान और ज्ञान का लोकतंत्रीकरण—की ओर लौटेंगे। इसी संघर्ष के बीच दुनिया की कई यूनिवर्सिटियाँ अब कह रही हैं कि वे ‘रैंकिंग रेस’ का हिस्सा नहीं बनेंगी, और यह दुनिया भर में शिक्षा नीति के लिए एक निर्णायक क्षण हो सकता है।

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