संजीव कुमार | नई दिल्ली 17 नवंबर 2025
भारतीय टेस्ट क्रिकेट अपनी सबसे खतरनाक गिरावट के दौर से गुजर रहा है, और इसके लिए जितनी जिम्मेदारी गलत चयन, बिखरी रणनीति और अहंकारी फैसलों की है, उतनी ही जिम्मेदारी उस टीम मैनेजमेंट की है जिसने विराट कोहली और रोहित शर्मा जैसे दिग्गजों पर दबाव बनाकर उन्हें समय से पहले संन्यास लेने पर मजबूर कर दिया। यह वही विराट कोहली हैं, जिनके नेतृत्व में भारत ने आठ वर्षों में सिर्फ दो टेस्ट घरेलू सरजमीं पर हारे थे। और यह वही रोहित शर्मा हैं, जिनकी कप्तानी में टीम ने अपने लिए एक भरोसेमंद, स्थिर और आक्रामक टेस्ट मॉडल बनाया था। लेकिन जैसे ही कोहली-रोहित युग को किनारे किया गया, भारतीय टीम सीधे अराजकता के अंधकार में गिर गई—और इसे अराजकता में धकेलने वाले दो नाम हैं: गौतम गंभीर और अजित आगरकर।
यह गिरावट इसलिए और खतरनाक हो जाती है क्योंकि इस मैनेजमेंट ने “फ्लेक्सिबिलिटी” का नाम लेकर पूरी टीम को एक अजीबोगरीब प्रयोगशाला बना दिया है। रोहित शर्मा ने खुद एक समय कहा था कि क्रिकेट में फ्लेक्सिबिलिटी ज़रूरी है, पर साथ ही उन्होंने यह भी साफ कहा था कि फ्लेक्सिबिलिटी का मतलब पागलपन नहीं होता। रोहित ने उदाहरण देते हुए बताया था कि सात–आठ साल तक शिखर धवन और उन्होंने ओपनिंग की। नंबर तीन पर विराट कोहली, पांच पर केएल राहुल बैटिंग करने आते थे। छठे पर हार्दिक पंड्या और सात पर रवींद्र जडेजा आते थे। उनका तर्क साफ था कि टीम में कुछ स्लॉट ऊपर नीचे हो सकते हैं, लेकिन ऐसा कभी नहीं होगा कि हार्दिक को ओपनिंग करने भेज दें या ओपनर को नंबर आठ पर भेज दिया जाए। रोहित ने खुद कहा था—”बाकी पूरी तरह उथल-पुथल कर देना पागलपन है, मैं ऐसा नहीं करता हूं।”
आज वही पागलपन गंभीर और आगरकर की रणनीति बन चुका है।
इस मैनेजमेंट की चयन-रणनीति किसी पेशेवर सेटअप जैसी नहीं लगती; यह अधिकतर इरादतन किए गए प्रायोगिक तजुर्बों, अनाड़ी निर्णयों और अहंकार की परिणति लगती है। एक मैच में वाशिंगटन सुंदर को नंबर 8 पर भेजना और अगले मैच में उन्हें नंबर 3 पर धकेल देना इस अस्थिर सोच का सबसे बड़ा प्रमाण है। यही कहानी ध्रुव जुरेल के साथ भी दोहराई गई—कभी नंबर 7, कभी नंबर 4। टीम मैनेजमेंट की यह सोच साफ करती है कि भारतीय टेस्ट टीम पूरी तरह दिशाहीन नेतृत्व के चंगुल में फंस चुकी है—जहाँ न स्थिरता है, न योजना, न समझ।
दूसरी तरफ, प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों के साथ जो किया जा रहा है, वह भारतीय क्रिकेट इतिहास का सबसे शर्मनाक अध्याय है। साई सुदर्शन को 87 और 39 रन बनाने के बाद ड्रॉप करना, सरफराज खान को 150+ रन बनाने के तुरंत बाद टेस्ट सेटअप से बाहर करना, अभिमन्यु ईश्वरन को बिना डेब्यू कराए निकाल देना, और देवदत्त पडिक्कल को एक अर्धशतक के बाद बेंच पर मार देना—यह सब निर्णय किसी भी “मेरिट” आधारित चयन प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हो सकते। ये फैसले क्रिकेट की समझ से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत पसंद-नापसंद, अहंकार, और गुटबाज़ी से प्रेरित लगते हैं।
सबसे बड़ा पाखंड यह है कि टीम मैनेजमेंट अब टेस्ट टीम का चयन T20 क्रिकेट के आधार पर कर रहा है। यह किसी भी क्रिकेटिंग समझ वाले व्यक्ति के लिए सबसे हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण रणनीति है। टेस्ट क्रिकेट धैर्य, तकनीक, निरंतरता और मानसिक मजबूती का खेल है; T20 तीन घंटे का बिजली-कड़ाका। इन दोनों मॉडलों को मिलाकर चयन करना भारतीय टेस्ट क्रिकेट के साथ सबसे बड़ा धोखा है। इसी मूर्खता के कारण यह मैनेजमेंट तीन-तीन ऑलराउंडरों के साथ टेस्ट मैच खेल रहा है—जहाँ न बल्लेबाजी भरोसेमंद दिखती है, न गेंदबाज़ी। यह “सबको खुश करने वाली” टीम नहीं हो सकती; टेस्ट क्रिकेट में एक-एक चयन राष्ट्र की प्रतिष्ठा तय करता है।
अपने गलत फैसलों को छुपाने के लिए अब PR गेम शुरू हो चुका है—गौतम गंभीर की पूरी मशीनरी क्यूरेटरों और बोर्ड अधिकारियों पर आरोप मढ रही है। लेकिन असली सच सौरव गांगुली ने सामने ला दिया—टीम मैनेजमेंट ने खुद चार दिनों तक पिच को पानी न देने का निर्देश दिया था। जब पिच माइनफील्ड बनती है, तो गेंदबाज़ी बराबरी की हो जाती है, लेकिन बल्लेबाज़ी कमजोर चयन से ढह जाती है। यह हार किसी क्यूरेटर या पिच की नहीं; यह हार गंभीर और आगरकर की रणनीति की है।
गंभीर के नेतृत्व में भारत ने टेस्ट क्रिकेट में वह सब खो दिया, जिसे विराट कोहली ने एक दशक की समर्पित मेहनत से बनाया था। विराट की कप्तानी में भारत ने आठ वर्षों में घर में सिर्फ दो टेस्ट हारे थे। लेकिन गंभीर–आगरकर के दौर में पिछले 3 वर्षों में ही भारत घर में 5 टेस्ट हार चुका है। SENA टीमों के खिलाफ घर में लगातार चार हार, बॉर्डर–गावास्कर ट्रॉफी 10 साल बाद गंवा दी, न्यूज़ीलैंड C टीम से 0–3 की शर्मनाक हार, और अब दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ पराजय—ये सब किसी सामान्य गिरावट के संकेत नहीं हैं; यह नेतृत्व की संपूर्ण विफलता है।
रुतुराज गायकवाड़ जैसे खिलाड़ी दक्षिण अफ्रीका A के खिलाफ 117 और 68* रन बनाकर दो बार मैन ऑफ द मैच बने—फिर भी यदि ऐसे खिलाड़ी को अगली ODI टीम में नजरअंदाज किया जाता है, तो यह सिर्फ शर्म की बात नहीं बल्कि चयनकर्ताओं की फेवरिटिज़्म से भरी राजनीति का खुला प्रमाण होगा।
आज भारतीय टेस्ट क्रिकेट ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ समाधान सिर्फ एक है— गौतम गंभीर और अजित आगरकर को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त किया जाए। और टीम को विराट कोहली की विरासत वाली अनुशासित, तकनीकी और मजबूत राह पर वापस लाने के लिए वीवीएस लक्ष्मण को टेस्ट कोच बनाया जाए। लक्ष्मण के पास अनुभव है, समझ है, धैर्य है—और सबसे अहम, अहंकार नहीं है।
विराट कोहली ने टेस्ट क्रिकेट को नए युग में जीवित रखा। 140 करोड़ T20-प्रेमियों के देश में उन्होंने टेस्ट क्रिकेट को फिर से प्रतिष्ठित बनाया। उन्होंने हमें यह अहसास कराया कि भारत घर में अपराजेय है। आज उसी टीम की हालत यह है कि 124 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए हाथ-पैर फूल रहे हैं। अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई तो भारतीय टेस्ट क्रिकेट अपनी सबसे गौरवशाली पहचान खो देगा। गौतम गंभीर और अजित आगरकर को बर्खास्त करो—यही भारतीय टेस्ट क्रिकेट को बचाने का एकमात्र रास्ता है।




