एबीसी डेस्क 12 दिसंबर 2025
देश की एक प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक सरकारी जैव-फार्मा कंपनी Bharat Immunologicals and Biologicals Corporation Limited (BIBCOL) के कर्मचारियों का दर्द आज आखिरकार संसद परिसर तक पहुंचा, जब नेता विपक्ष राहुल गांधी ने उनके प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की और उनकी समस्याओं को विस्तार से सुना। बैठक के दौरान कर्मचारियों की आंखों में कई सालों से रुके वेतन का दर्द, परिवार चलाने की मजबूरी, कर्ज और आर्थिक तंगी की मार साफ झलक रही थी। वेतन न मिलने के कारण BIBCOL के कर्मचारी अपने बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और रोजमर्रा की जरूरतें पूरा करने में असमर्थ होते जा रहे हैं। कई कर्मचारी मजबूरी में कर्ज लेकर जीवित हैं, जबकि कुछ पर बैंक और साहूकारों के नोटिस तक पहुंच चुके हैं—एक ऐसी स्थिति, जिसकी कल्पना किसी सरकारी कर्मचारी के लिए भी असहनीय है।
राहुल गांधी ने कर्मचारियों को आश्वस्त करते हुए कहा कि यह केवल वेतन का सवाल नहीं, बल्कि कामगारों की इंसानियत, सम्मान और अधिकारों का मुद्दा है। उन्होंने बताया कि BIBCOL कोई साधारण कंपनी नहीं, बल्कि वह संस्थान है जिसने भारत में पोलियो उन्मूलन जैसे ऐतिहासिक जनस्वास्थ्य अभियान में निर्णायक भूमिका निभाई। जिस कंपनी ने करोड़ों बच्चों को सुरक्षित भविष्य दिया, उसी कंपनी के कर्मचारियों को आज अपने बच्चों का भविष्य बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है—यह स्थिति न केवल शर्मनाक है बल्कि सरकारी उदासीनता और आर्थिक कुप्रबंधन का घोर उदाहरण भी है।
कर्मचारियों ने बैठक में बताया कि BIBCOL कभी लाभ कमाने वाली और स्थिर सरकारी कंपनी थी, लेकिन राजनीतिक निर्णयों, प्रबंधन में दखल, निवेश न होने और कथित साजिशन नीतिगत बदलावों ने इस कंपनी को धीरे-धीरे घाटे में धकेल दिया। कर्मचारियों ने कहा कि मशीनें पुरानी कर दी गईं, संसाधन रोके गए, उत्पादन धीमा कर दिया गया और नई तकनीक का विकास जानबूझकर अवरुद्ध किया गया—मानो कंपनी को बंद करने या निजी हाथों में सौंपने की तैयारी की जा रही हो। उनका आरोप था कि “मुनाफे में चल रही कंपनी को साजिशन घाटे में बदल दिया गया।”
राहुल गांधी ने इस स्थिति को बेहद चिंताजनक बताते हुए कहा कि यह केवल BIBCOL की लड़ाई नहीं, बल्कि पूरे देश के उन सरकारी संस्थानों की लड़ाई है जिन्हें जानबूझकर कमजोर बनाकर बाद में बेचने या बंद करने की कोशिश की जाती है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह कर्मचारियों के अधिकारों के लिए संसद से लेकर सड़क तक आवाज उठाएंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि न केवल रुका हुआ वेतन मिले, बल्कि कंपनी को पुनर्जीवित करने के लिए एक ठोस कार्ययोजना तैयार की जाए। उन्होंने प्रतिनिधिमंडल को भरोसा दिलाया कि चाहे जितना समय लगे, न्याय दिलाना उनकी प्राथमिकता रहेगी।
बैठक के बाद कर्मचारियों में राहत और आशा दोनों की भावना दिखी। वर्षों से उपेक्षा झेल रहे इन कर्मचारियों को अब उम्मीद है कि उनकी आवाज देशभर में सुनी जाएगी और BIBCOL को उसके गौरवपूर्ण इतिहास और वैज्ञानिक योगदान के अनुरूप सम्मान भी वापस मिलेगा। इस मुलाकात ने न केवल एक महत्वपूर्ण संस्थान के संकट पर रोशनी डाली है, बल्कि यह भी उजागर किया है कि सरकारी उद्यमों और कर्मचारियों की सुरक्षा, भविष्य और सम्मान को लेकर राजनीतिक नेतृत्व को कितनी गंभीरता दिखाने की आवश्यकता है।




