एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 16 फरवरी 2026
भारतीय राजनीति में दल-बदल कोई नई बात नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में कई बड़े नेताओं के पार्टी बदलने से निष्ठा बनाम महत्वाकांक्षा की बहस फिर तेज हो गई है। कांग्रेस से जुड़े रहे कई प्रमुख चेहरे—भूपेन बोरा, जितिन प्रसादा, आरपीएन सिंह, मिलिंद देवड़ा और ज्योतिरादित्य सिंधिया—विभिन्न समय पर पार्टी छोड़कर अलग राजनीतिक रास्तों पर चले गए। सत्ता परिवर्तन और केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता के दौर में इन फैसलों को लेकर राजनीतिक हलकों में अलग-अलग व्याख्याएं की गईं।
विपक्षी खेमे में यह आरोप लगाया गया कि जब राजनीतिक दबाव बढ़ा और सीबीआई या ईडी जैसी एजेंसियों की जांच तेज हुई, तब कुछ नेताओं ने “विचारधारा” से अधिक “राजनीतिक भविष्य” को प्राथमिकता दी। हालांकि संबंधित नेताओं ने हमेशा अपने फैसलों को वैचारिक मतभेद और बेहतर अवसरों की तलाश बताया है। उनका कहना रहा कि उन्होंने जनता और अपने क्षेत्र के हित में निर्णय लिया।
इसी संदर्भ में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सचिन पायलट का नाम भी चर्चा में है। पार्टी के भीतर मतभेदों और राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद उन्होंने कांग्रेस में बने रहने का निर्णय लिया। उनके समर्थकों का कहना है कि पायलट ने अनिश्चित राजनीतिक परिस्थितियों के बावजूद संगठन और नेतृत्व के साथ खड़े रहने का रास्ता चुना। आलोचकों का तर्क है कि राजनीति में हर फैसला रणनीतिक होता है और समय के साथ समीकरण बदलते रहते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय राजनीति में दल-बदल की घटनाएं अक्सर वैचारिक प्रतिबद्धता, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और सत्ता की राजनीति के जटिल मिश्रण से प्रभावित होती हैं। लोकतंत्र में नेताओं का पाला बदलना कानूनी रूप से संभव है, लेकिन जनता के बीच उनकी छवि और विरासत इस बात पर निर्भर करती है कि लोग उनके फैसलों को किस नजर से देखते हैं।
सोशल मीडिया पर इन घटनाओं को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग “निष्ठा” को सर्वोच्च मानते हैं, तो कुछ इसे बदलते राजनीतिक हालात में व्यावहारिक निर्णय बताते हैं। अंततः इतिहास किसे किस रूप में याद रखेगा, यह समय ही तय करेगा—लेकिन इतना तय है कि वफादारी और अवसरवाद की यह बहस आने वाले चुनावों तक जारी रहने वाली है।




