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तेल चाहे रूस से आये या वेनेजुएला से, लाएगा तो अंबानी ही!!!

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एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 13 फरवरी 2026

नई दिल्ली | वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम ने सियासी और कारोबारी हलकों में हलचल मचा दी है। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, भारत की दिग्गज कंपनी Reliance Industries को अमेरिका की ओर से वेनेजुएला से कच्चा तेल खरीदने के लिए “जनरल ऑथराइजेशन” यानी सामान्य अनुमति प्रदान की गई है। यह अनुमति ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिका द्वारा Venezuela पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण वहां से तेल निर्यात लंबे समय से सीमित रहा है। सूत्रों के मुताबिक, यह छूट विशेष शर्तों और निगरानी के तहत दी गई है, हालांकि आधिकारिक दस्तावेजों और विस्तृत नियमों को अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है।

भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में से एक है और उसकी ऊर्जा सुरक्षा रणनीति हमेशा से विविध स्रोतों पर आधारित रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रियायती दरों पर रूसी तेल का आयात बढ़ाया था, जिससे घरेलू रिफाइनिंग कंपनियों को लागत में उल्लेखनीय लाभ मिला। अब यदि वेनेजुएला से तेल आयात की राह खुलती है, तो यह भारत के लिए एक और सस्ता और भारी क्रूड का स्रोत साबित हो सकता है। जामनगर स्थित दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनिंग परिसंपत्तियों में से एक होने के कारण रिलायंस जैसी कंपनी भारी और जटिल क्रूड को प्रोसेस करने की क्षमता रखती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत की वैश्विक ऊर्जा बाजार में सौदेबाजी की स्थिति और मजबूत होगी, क्योंकि वह अलग-अलग देशों से प्रतिस्पर्धी दरों पर तेल खरीदने की स्थिति में रहेगा।

हालांकि इस घटनाक्रम के राजनीतिक आयाम भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। सोशल मीडिया और विपक्षी हलकों में यह चर्चा तेज है कि क्या इस फैसले के पीछे बड़े कारोबारी और कूटनीतिक समीकरण काम कर रहे हैं। मुकेश अंबानी और उनके परिवार की अमेरिकी राजनीतिक कार्यक्रमों में मौजूदगी तथा अमेरिकी नेतृत्व से हालिया मुलाकातों को लेकर कई तरह की अटकलें सामने आई हैं। कुछ विश्लेषक इसे वैश्विक कॉरपोरेट कूटनीति का हिस्सा मानते हैं, तो कुछ इसे नीति और व्यवसाय के बीच बढ़ती नजदीकियों के संकेत के रूप में देखते हैं। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और न ही रिलायंस या अमेरिकी प्रशासन ने किसी प्रत्यक्ष संबंध को स्वीकार किया है।

अमेरिकी राजनीति के संदर्भ में भी यह निर्णय अहम माना जा रहा है। पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump के कार्यकाल में वेनेजुएला पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए थे, जिनका उद्देश्य वहां की सरकार पर दबाव बनाना था। बाद के वर्षों में कुछ शर्तों के साथ सीमित छूट की नीतियां भी सामने आईं। यदि अब भारतीय कंपनी को विशेष अनुमति दी गई है, तो इसे अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकताओं और सहयोगी देशों के साथ ऊर्जा संबंधों को संतुलित करने की नीति के रूप में देखा जा सकता है। भारत-अमेरिका संबंधों की बढ़ती निकटता, रक्षा और ऊर्जा सहयोग के विस्तार, और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में साझा रणनीतिक हित—इन सभी कारकों को इस फैसले की पृष्ठभूमि में समझा जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों को विविध बनाने पर जोर दिया है। समर्थक इसे व्यावहारिक कूटनीति और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने वाली नीति बताते हैं, जबकि आलोचक बड़े कॉरपोरेट घरानों को मिल रहे अवसरों पर सवाल उठाते हैं। “मोदी है तो मुमकिन है” जैसे राजनीतिक नारों के बीच यह घटनाक्रम एक नई बहस को जन्म दे रहा है कि क्या भारत की ऊर्जा रणनीति में निजी कंपनियां केंद्रीय भूमिका निभा रही हैं और क्या यह मॉडल दीर्घकालिक रूप से देश के हित में संतुलित है।

आर्थिक दृष्टि से यह अनुमति रिलायंस जैसी निजी रिफाइनिंग कंपनियों के लिए लाभकारी साबित हो सकती है, क्योंकि वे भारी और डिस्काउंटेड क्रूड को प्रोसेस कर वैश्विक बाजार में परिष्कृत उत्पादों का निर्यात करती हैं। इससे उनके निर्यात मार्जिन और मुनाफे पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। साथ ही, भारत के लिए यह कदम ऊर्जा आपूर्ति के विविधीकरण की दिशा में एक और रणनीतिक विकल्प खोल सकता है। हालांकि, यह भी देखना होगा कि अमेरिकी प्रतिबंधों की शर्तें क्या हैं, भुगतान और बीमा की प्रक्रिया कैसे संचालित होगी, और क्या भविष्य में राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने से यह अनुमति प्रभावित हो सकती है।

फिलहाल, केंद्र सरकार या संबंधित कंपनियों की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि रूस से लेकर वेनेजुएला तक फैले इस ऊर्जा समीकरण में भारत की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। वैश्विक तेल बाजार में बदलते गठजोड़, प्रतिबंधों की राजनीति और कॉरपोरेट हित—इन तीनों के बीच संतुलन साधते हुए भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित करने की कोशिश कर रहा है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि वेनेजुएला से तेल आयात वास्तव में कितनी मात्रा में शुरू होता है और उसका भारतीय अर्थव्यवस्था तथा अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर क्या दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है।

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