Home » Opinion » जब सवाल सत्ता से हटकर विपक्ष पर आ जाएं: लोकतंत्र के लिए चेतावनी है हंगरी का अनुभव

जब सवाल सत्ता से हटकर विपक्ष पर आ जाएं: लोकतंत्र के लिए चेतावनी है हंगरी का अनुभव

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | 14 अप्रैल 2026

यूरोप के देश Hungary में हालिया चुनाव परिणाम सिर्फ एक सरकार की हार नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र के भीतर चल रही एक गहरी प्रक्रिया का परिणाम हैं। करीब डेढ़ दशक तक सत्ता में रहे Viktor Orbán को जनता ने आखिरकार नकार दिया। यह नकार अचानक नहीं था। यह लंबे समय से जमा हो रही असंतुष्टि का विस्फोट था। हंगरी में पिछले 15 वर्षों के दौरान एक खास राजनीतिक माहौल बना—जहां सरकार से ज्यादा सवाल विपक्ष से पूछे जाने लगे। सत्ता में बैठे लोग जवाबदेही से धीरे-धीरे दूर होते गए, जबकि विपक्ष को लगातार कठघरे में खड़ा किया जाता रहा। नतीजा यह हुआ कि लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ने लगा।

कुछ इसी तरह की बहस आज भारत में भी सुनाई देती है। पिछले 12 वर्षों में अक्सर यह देखने को मिला है कि राष्ट्रीय विमर्श में सवाल सरकार से नहीं, विपक्ष से ही पूछे जा रहे हैं। जबकि लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत साफ है—जवाबदेही उस पर होती है, जिसके हाथ में सत्ता और संसाधन होते हैं। विपक्ष की भूमिका सवाल उठाने की होती है, जवाब देने की नहीं।

जब यह समीकरण उलट जाता है, तो लोकतंत्र की आत्मा प्रभावित होती है। सरकार से जवाब मांगने की बजाय अगर विपक्ष की कमियों पर ही पूरा विमर्श केंद्रित हो जाए, तो सत्ता के निर्णयों, नीतियों और उनकी जवाबदेही पर पर्दा पड़ने लगता है। यही वह स्थिति होती है, जहां धीरे-धीरे संस्थाएं कमजोर होने लगती हैं और सत्ता के केंद्रीकरण का रास्ता खुलता है।

हंगरी का अनुभव बताता है कि यह प्रक्रिया लंबे समय तक चल सकती है, लेकिन अंततः जनता सब देखती है। जब लोगों को यह महसूस होता है कि उनकी आवाज सुनी नहीं जा रही, सवालों के जवाब नहीं मिल रहे और विमर्श का फोकस भटक गया है, तब वे चुनाव के जरिए अपना निर्णय सुनाते हैं।

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि सवालों का केंद्र सही दिशा में रहे। सरकार से सवाल पूछना लोकतंत्र को कमजोर नहीं करता, बल्कि उसे मजबूत बनाता है। वहीं, विपक्ष को पूरी तरह अप्रासंगिक साबित करने की कोशिश अंततः लोकतांत्रिक संतुलन को नुकसान पहुंचाती है।

हंगरी ने अपने ताजा जनादेश के जरिए एक स्पष्ट संदेश दिया है—लोकतंत्र में जनता अंतिम निर्णायक होती है और वह लंबे समय तक असंतुलन को स्वीकार नहीं करती। यह संदेश हर उस देश के लिए महत्वपूर्ण है, जहां सत्ता और जवाबदेही के बीच दूरी बढ़ने लगती है।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments