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हौथी हमलों से बढ़ा पश्चिम एशिया संकट, मक्का समझौते पर भारत की पैनी नजर

अंतरराष्ट्रीय/ पश्चिम एशिया | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 21 सितंबर 2026

पश्चिम एशिया में हौथी हमलों के बढ़ते दायरे ने पहले से तनावपूर्ण क्षेत्रीय हालात को और जटिल बना दिया है। यमन से शुरू हुआ संघर्ष अब सऊदी अरब की सुरक्षा, लाल सागर में समुद्री यातायात, तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन से जुड़ता जा रहा है। इसी बीच सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान से जुड़े मक्का समझौते की चर्चा ने भी नई दिल्ली का ध्यान खींचा है। भारत के लिए यह पूरा घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका सीधा संबंध ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय कूटनीति से है।

हौथी संगठन ईरान समर्थित समूह के रूप में जाना जाता है और यमन के लंबे संघर्ष में इसकी महत्वपूर्ण सैन्य भूमिका रही है। सऊदी क्षेत्र और वहां के ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाए जाने की खबरों ने यह दिखाया है कि हौथियों की सैन्य क्षमता केवल यमन की सीमाओं तक सीमित नहीं है। मिसाइल और ड्रोन जैसी तकनीकों के इस्तेमाल के कारण उनके हमले क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती बन रहे हैं।

इस संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसकी भौगोलिक स्थिति है। यमन के पास स्थित बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और आगे यही समुद्री रास्ता स्वेज नहर तक पहुंचता है। एशिया और यूरोप के बीच माल ढुलाई के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है। यदि इस रास्ते पर लगातार हमले या असुरक्षा बनी रहती है तो जहाजों को वैकल्पिक रास्ते अपनाने पड़ सकते हैं, जिससे यात्रा का समय, बीमा लागत और परिवहन खर्च बढ़ सकता है।

पश्चिम एशिया की स्थिति को और गंभीर बनाता है होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ा तनाव। एक तरफ लाल सागर और स्वेज मार्ग पर दबाव है तो दूसरी तरफ होर्मुज के आसपास जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने की स्थिति सामने आ रही है। ये दोनों समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा और व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। यदि दोनों क्षेत्रों में लंबे समय तक अस्थिरता रहती है तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा।

भारत के लिए इसका सीधा संबंध कच्चे तेल से है। भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इसलिए पश्चिम एशिया में समुद्री मार्गों पर किसी भी लंबे व्यवधान का असर भारत के तेल आयात बिल, ईंधन की कीमतों और महंगाई पर पड़ सकता है। वैश्विक तेल कीमतों में तेज बढ़ोतरी होने पर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बढ़ सकता है।

इसी बीच सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान से जुड़े मक्का समझौते को लेकर भी क्षेत्रीय स्तर पर चर्चा हो रही है। इस व्यवस्था को लेकर अलग-अलग आकलन हैं। कुछ विश्लेषक इसे अभी शुरुआती और सीमित पहल मानते हैं, जबकि कुछ इसे भविष्य में व्यापक सुरक्षा सहयोग के आधार के रूप में देखते हैं। इसके वास्तविक स्वरूप और उद्देश्यों को लेकर अभी कई बातें स्पष्ट होना बाकी हैं।

इन तीनों देशों की अपनी-अपनी रणनीतिक प्राथमिकताएं हैं। सऊदी अरब के लिए ईरान और उससे जुड़े क्षेत्रीय समूह महत्वपूर्ण सुरक्षा चुनौती हैं। तुर्की की अपनी क्षेत्रीय प्राथमिकताएं और सैन्य भूमिका है, जबकि पाकिस्तान की प्रमुख सुरक्षा चुनौती भारत के साथ उसका संबंध है। इसलिए तीनों देशों के हित पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं। यही अंतर किसी भी संभावित व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की दिशा और उसकी एकजुटता को प्रभावित कर सकता है।

भारत के लिए चिंता का एक पहलू भारत-पाकिस्तान संबंधों से भी जुड़ा है। यदि भविष्य में सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच सैन्य सहयोग का दायरा बढ़ता है, तो नई दिल्ली को उसके संभावित सुरक्षा प्रभावों पर नजर रखनी होगी। तुर्की के पाकिस्तान के साथ रक्षा संबंध पहले से मौजूद हैं और सऊदी अरब के पास आधुनिक सैन्य संसाधन हैं। हालांकि किसी भी भविष्य की स्थिति के बारे में अभी निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।

दूसरी बड़ी चिंता कूटनीतिक है। यदि यह व्यवस्था आगे चलकर अधिक संगठित राजनीतिक मंच का रूप लेती है तो पश्चिम एशिया और मुस्लिम-बहुल देशों के बीच नए राजनयिक समीकरण बन सकते हैं। ऐसे किसी भी बदलाव का असर बहुपक्षीय मंचों पर विभिन्न मुद्दों को लेकर बनने वाले समर्थन पर पड़ सकता है। भारत इसलिए क्षेत्रीय देशों के साथ अपने संवाद को बनाए रखने और बदलते समीकरणों को करीब से देखने में रुचि रखता है।

ऊर्जा के मोर्चे पर भारत की स्थिति पहले से जटिल है। रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिका के साथ व्यापारिक और कूटनीतिक तनाव बढ़ रहा है, जबकि ईरान से तेल खरीद पर अमेरिकी प्रतिबंध भारत के विकल्प सीमित करते हैं। ऐसे में पश्चिम एशिया के समुद्री रास्तों में किसी बड़े व्यवधान से भारत के लिए वैकल्पिक आपूर्ति हासिल करना और महंगा हो सकता है।

यही वजह है कि पश्चिम एशिया का मौजूदा संकट भारत के लिए केवल विदेश नीति का मुद्दा नहीं है। यह तेल, व्यापार, समुद्री सुरक्षा, महंगाई और राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ है। लाल सागर और होर्मुज दोनों महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर दबाव की स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ भारत पर भी पड़ सकता है।

पश्चिम एशिया में मौजूदा घटनाक्रम यह दिखाता है कि एक क्षेत्रीय संघर्ष कितनी तेजी से वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा बन सकता है। हौथी हमले, लाल सागर की सुरक्षा, होर्मुज में तनाव, मक्का समझौते की संभावित दिशा और रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी दबाव—इन सभी घटनाओं के बीच भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय कूटनीतिक हितों के बीच संतुलन बनाए रखना होगी।

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