एबीसी नेशनल न्यूज | 4 फरवरी 2026
नई दिल्ली, 4 फरवरी | राष्ट्रीय
संसद के भीतर आज जिस तरह से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवालों पर टकराव देखने को मिला, उसने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के उस आरोप को और धार दे दी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सच्चाई का सामना करने से बच रहे हैं। राहुल गांधी ने कहा कि अगर प्रधानमंत्री संसद में आते, तो उन्हें एक ऐसी किताब भेंट की जाती जो न तो किसी विपक्षी नेता ने लिखी है और न ही किसी विदेशी लेखक ने। यह किताब भारत के पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल मनोज नरवणे की है, और इसी कारण, राहुल गांधी के मुताबिक, उसमें लिखे तथ्यों को नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं है।
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार इस किताब के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर रही है, क्योंकि उसमें दर्ज घटनाक्रम सत्ता के लिए असहज हैं। किताब में उस दौर का ज़िक्र है जब चीन की सेना भारतीय क्षेत्र में दाख़िल हो चुकी थी और सीमा पर हालात बेहद संवेदनशील थे। ऐसे समय में सेना को स्पष्ट और तेज़ राजनीतिक फैसलों की ज़रूरत थी, लेकिन राहुल गांधी के अनुसार, सेना प्रमुख को प्रधानमंत्री से मिलने के लिए इंतज़ार करना पड़ा। उनके मुताबिक, संकट की घड़ी में यह देरी दिखाती है कि नेतृत्व उस समय कितनी तत्परता से हालात को संभाल रहा था।
राहुल गांधी ने कहा कि किताब के अनुसार, जब अंततः निर्णय का क्षण आया, तो प्रधानमंत्री की ओर से कोई ठोस राजनीतिक दिशा नहीं दी गई। कथित तौर पर केवल इतना कहा गया—“जो उचित लगे, वो करो।” राहुल गांधी ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के सबसे गंभीर क्षण में राजनीतिक जिम्मेदारी से पीछे हटने जैसा बताया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सेना को कार्रवाई की स्वतंत्रता के साथ-साथ स्पष्ट राजनीतिक संरक्षण और दिशा देना चुनी हुई सरकार का कर्तव्य होता है, न कि संकट की पूरी ज़िम्मेदारी सैन्य नेतृत्व पर छोड़ देना।
अपने बयान को और मज़बूत करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि जनरल नरवणे ने खुद यह दर्ज किया है कि उस समय उन्हें महसूस हुआ कि राजनीतिक नेतृत्व ने सेना को अकेला छोड़ दिया है। राहुल गांधी के अनुसार, जब सीमाओं पर तनाव चरम पर हो, तब सेना का मनोबल राजनीतिक नेतृत्व के स्पष्ट समर्थन से ही मज़बूत रहता है। यदि सेना प्रमुख को यह एहसास हो कि वे अकेले खड़े हैं, तो यह केवल एक अनुभव नहीं, बल्कि पूरे शासन तंत्र पर सवाल खड़े करता है।
राहुल गांधी ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें संसद में इन तथ्यों को पूरी तरह रखने से रोका जा रहा है। उनका कहना था कि लोकतंत्र के सर्वोच्च मंच पर राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अहम मुद्दे पर खुली चर्चा से इसलिए बचा जा रहा है, क्योंकि इससे सरकार की जवाबदेही तय हो सकती है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री संसद में इसलिए नहीं आए, क्योंकि वे सच्चाई का सामना नहीं करना चाहते। राहुल गांधी ने इसे सवालों से भागने और जवाबदेही से बचने की राजनीति करार दिया।
कांग्रेस नेता ने स्पष्ट किया कि यह मामला किसी दल विशेष का नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों का है। उन्होंने कहा कि जब सवाल देश के पूर्व सेना प्रमुख की किताब में दर्ज तथ्यों का हो, तब सरकार का यह कहना कि किताब मौजूद ही नहीं है, अपने आप में चिंता पैदा करता है। राहुल गांधी के मुताबिक, देश जानना चाहता है कि सीमा पर संकट के समय अंतिम राजनीतिक फैसले कौन ले रहा था और क्या उस दौर में राजनीतिक नेतृत्व ने अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाई।
राहुल गांधी के इन आरोपों के बाद संसद और देश की राजनीति में हलचल तेज़ हो गई है। विपक्ष का कहना है कि सरकार को चुप्पी साधने के बजाय संसद में आकर साफ़, तथ्यात्मक और जवाबदेह स्पष्टीकरण देना चाहिए। विपक्ष का तर्क है कि यदि सब कुछ सही ढंग से हुआ, तो फिर जनरल नरवणे की किताब में दर्ज तथ्यों पर खुली बहस से डरने की कोई वजह नहीं होनी चाहिए। फिल




