एबीसी डेस्क 11 दिसंबर 2025
लोकसभा में अमर्यादित भाषा को लेकर उठा विवाद अब और गहराता जा रहा है। सदन में गृहमंत्री अमित शाह द्वारा बोले गए ‘साला’ शब्द पर जारी लोकसभा परिपत्र ने इस मामले को शांत करने की बजाय नई आग दे दी है। परिपत्र में यह स्पष्ट हो गया कि यह शब्द वास्तव में बोला गया था—यही वह तथ्य है जिसने सत्ता पक्ष को असहज और विपक्ष को हमलावर बना दिया।
सबसे पहले तो यह स्थापित हो गया कि भारी हंगामे और व्यवधान के बीच केंद्रीय गृहमंत्री के मुंह से ‘साला’ शब्द निकला। उस समय शोर इतना था कि यह समझना मुश्किल था कि शब्द किस संदर्भ में आया, लेकिन परिपत्र ने यह संदेह दूर कर दिया। यह भी दर्ज हो गया कि जैसे ही यह शब्द बोला गया, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने तुरंत आपत्ति उठाई और इसे असंसदीय करार दिया।
लेकिन विवाद की जड़ परिपत्र की वह लाइन बनी जिसमें कहा गया—यह शब्द “नॉट रिकार्डेड” है। सामान्य नियमों के मुताबिक किसी भी अनुचित शब्द को ‘एक्स्पंज’ किया जाता है, यानी उसे आधिकारिक रिकॉर्ड से हटाया जाता है। मगर यहां हटाने की जगह यह घोषित करना कि “रिकॉर्ड नहीं किया गया”, सवालों को और तीखा कर गया। विपक्ष पूछ रहा है—अगर रिकॉर्ड नहीं हुआ तो परिपत्र में इसका उल्लेख क्यों किया गया? एक गैर-रिकार्डेड शब्द को बताने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या यह स्वीकारोक्ति नहीं कि शब्द कहा गया, सुना गया और नोट भी किया गया?
इसी विरोधाभास ने पूरे विवाद को और गंभीर बना दिया है। संसद में बोली गई हर बात को दर्ज करने की संवैधानिक प्रक्रिया होती है। ऐसे में देश के गृहमंत्री के बयान को “नॉट रिकार्डेड” बताना पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर इसे एक्स्पंज किया जाता तो मामला सामान्य संसदीय प्रक्रिया के दायरे में रहता, लेकिन “रिकॉर्ड नहीं किया गया” कहकर इसे तकनीकी के बजाय राजनीतिक विवाद बना दिया गया।
परिपत्र में संवादों का क्रम बताने से यह भी साफ हुआ कि यह महज एक क्षणिक चूक नहीं थी, बल्कि एक दर्ज की गई संसदीय घटना थी। शाह ने शब्द कहा, राहुल गांधी ने विरोध किया, और अध्यक्ष ने हस्तक्षेप किया—यह सब दस्तावेज़ में दर्ज है। विपक्ष इसे गृहमंत्री की गरिमा के खिलाफ मान रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे सामान्य बोलचाल का हिस्सा बताकर बचाव कर रहा है।
कुल मिलाकर, एक शब्द से शुरू हुआ मामला अब संसद की परंपराओं, प्रक्रियाओं और पारदर्शिता पर गहरे सवाल उठा रहा है। परिपत्र ने विवाद शांत करने के बजाय और बड़ी राजनीतिक हलचल पैदा कर दी है—और अब यह मुद्दा जल्द ठंडा पड़ने वाला नहीं दिखता।





